अमर बलिदानी श्रीदेव सुमन जिनकी 209 दिन की जेल यातना तथा 84 दिन की भूख हड़ताल के बाद मृत्यु हुई थी उनके शव को बोरी में बांधकर बिलंगना नदी में फिंकवाने वाले पंवार वंश के राजा जिन्हें मुग़लों के प्रति वफादारी करने के एवज में मुग़ल बादशाह द्वारा शाह की उपाधि से नवाजने वाला राजघराना तथा टिहरी संसदीय सीट से सांसद रहे राजा, महारानी टिहरी का इतिहास बड़ा निर्दयी रहा।
गढ़वाल 52 अलग–अलग गढ़ों का एक देश था जिनमे छोटे–छोटे 52 राजा हुआ करते थे। सन 888 के आसपास मालवा के राजा कनकपाल हरिद्वार आये और फिर कई कहानियां प्रचलित हुई। टिहरी के सबसे सशक्त राजा भानुप्रताप ने अपनी पुत्री से कनकपाल का विवाह करवाया और टिहरी में पंवार वंश की नीवं पड़ी। कनकपाल ने धीरे धीरे सभी 52 गढ़ों को हराकर टिहरी में मिला दिया और वहां की प्रजा पर राज करने लगे।
पीढ़ी दर पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहा फिर दौर आया जब दिल्ली सल्तनत पर मुगल सम्राट अकबर गद्दी पर बैठे। कहते हैं कि एकबार अकबर गढ़वाल भृमण पर आए थे वहां किसी ने अकबर पर हमला कर दिया लेकिन टिहरी टियासत के ताजा बलभद्र पाल ने अकबर को बचा लिया। कहा यह भी जाता है कि गढ़वाल से कई सैनिक अकबर को मारने के लिए आये लेकिन बलभद्र पाल ने अपनी सेना खड़ी करके उनसे बदला लिया और अकबर को सुरक्षित दिल्ली पहुंचाया।
अकबर इस बात से प्रभावित हुए और मुगल सल्तनत की सबसे बड़ी उपाधि “शाह” की उपाधि बलभद्र को दी गई तब से बलभद्र पाल का नाम बलभद्र शाह हुआ। टिहरी रियासत जिसे पंवार वंश कहा जाता है और जिनकी मूल पहचान पाल थी जो कि मूल रूप से गुजरात के थे वह आज भी शाह के ही नाम से जानी जाती है जो अकबर द्वारा दी गई उपाधि थी। पंवार वंश के कुल 60 राजाओं ने टिहरी पर राज किया। हालांकि पहले इनकी राजधानी बदलती रही।
आजादी की लड़ाई के समय जब पूरा देश भारत के साथ विलय करने पर सहमत था टिहरी, हैदराबाद और कश्मीर जैसी कुछ रियासतें भारत के साथ नही आना चाहती थी। 15 अगस्त 1947 को देश जरूर आजाद हो गया था लेकिन टिहरी में जिन्होंने 15 अगस्त 1947 से लेकर 1949 तक जिन लोगों ने तिरंगा फहराया उन्हें टिहरी रियासत के दस्तावेजों में आज भी देशद्रोही अंकित किया हुआ है। 1949 में कुछ टिहरी प्रजातंत्र पार्टी की वजह से टिहरी का भारत मे विलय हो गया।
वामपंथ के प्रति वर्तमान में जिसका जो भी नजरिया रहा हो लेकिन एक हकीकत यह है कि उत्तराखण्ड के इस हिस्से में अबतक जितने भी परिवर्तन संभव हो सके, उनमें वामपंथी नेताओं की बड़ी भूमिका रही। राजशाही, छद्म राष्ट्रवाद तथा जातिवाद एवम पार्टीवाद ने इसे बर्बाद किया और कांग्रेस तथा भाजपा ने इसी राजशाही को पोषित, संरक्षित करने का काम किया। इतिहास से लेकर वर्तमान तक सबकुछ आपके समक्ष है।
सन् 1951 में प्रथम लोकसभा के लिए चुनाव हुए और राजाओं का खौफ क्या होता है यह समझीये। पहले ही चुनाव में टिहरी की महारानी कमलेन्दु मति शाह निर्विरोध प्रत्याशी के रूप में लोकसभा पहुंची। उसके बाद कुल 8 बार टिहरी के अंतिम राजा मानवेंद्र शाह जी लोक सभा के लिए चुने गए जिनमे शुरू का आधा समय कांग्रेस में थे उसके बाद बीजेपी से जीतते गए। राजा की मृत्यु के बाद उनकी जगह ली उनके पुत्र फिर उनकी पुत्रवधु वर्तमान सांसद महारानी राजलक्ष्मी शाह ने जो दो बार बीजेपी से लगातार सांसद है।
आज टिहरी संसदीय सीट का कुल क्षेत्र 13099 वर्ग किमी कुल मतदाता 1285071 है। जिसके कुल सांसद वर्ष 1951 में कमलेन्दु मति शाह (निर्दलीय )1957टिहरी गढ़वाल, महाराजा मामवेन्द्र शाह (कंग्रेस), 1962महाराजा मामवेन्द्र शाह (कंग्रेस),1967 महाराजा मामवेन्द्र शाह (कंग्रेस)1971 परिपूर्णानंद पेन्यूली (कांग्रेस), 1977 त्रिपिन सिह नेगी (भारतीय लोकदल), 1980 त्रिपिन सिह नेगी (कांग्रेस आइ),1984 बृह्म दत्त (कांग्रेस),1989 बृह्म दत्त (कांग्रेस)1991 मानवेन्द्र शाह (भाजपा), त्रिपिन सिह नेगी(कांग्रेस आई ),1996 टिहरी गढ़वाल मानवेन्द्र शाह (भाजपा), हरपल सिह साथी (भाजपा ),1998 टिहरी गढ़वाल मानवेन्द्र शाह (भाजपा) हरपल सिह साथी (भाजपा), 1999 टिहरी गढ़वाल मानवेन्द्र शाह (भाजपा), 2004 टिहरी गढ़वाल मानवेन्द्र शाह (भाजपा), 2009 विजय बहुगुणा (कांग्रेस), 2012, 2014 से अबतक राजलक्ष्मी शाह (भाजपा) से हैं।
पार्टी किसी की भी रही हो राज केवल राजाओं का ही चला है क्यूंकि यहां के लोगों में एक डर है जो कि कहानियों के रूप में खूब प्रचलित है कि राजा के खिलाफ जाओगे तो देवता का दोष लगता है। इसपर बड़े बड़े पढ़े लिखों की भी मान्यता बरकरार है। बदरीनाथ मन्दिर यदि कोई मानवरूपी प्रतिनिधि समझा जाता है तो वह टिहरी के राजाओं को माना जाता है। जबकि बद्रीनाथ के रावल (पुजारी) उत्तराखण्ड का मूलनिवासी नही हो सकता है वह केवल केरल के एक ब्राह्मण परिवार के पास अधिकार है यह भी इन्ही राजाओं की देन है।
राजाओं ने कुछ अच्छे कार्य भी करवाये हैं, गोरखाओं से युद्ध मे प्रधुम्न शाह वीरगति को प्राप्त हुए हैं फिर ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ मिलकर गोरखाओं को यहां से बाहर खदेड़ा है पर यह तो राजाओं का राजप्रथा के रूप में कर्म था। उनके अधीन कितनी खामियां और अराजकता थी उसके लिए तिलाड़ी कांड से लेकर श्रीदेव सुमन तक के इतिहास को भी पढ़ लेगा तो आसानी से समझ जायेंगे।
आज उत्तराखण्ड से सबसे ज्यादा फौजी और पुलिस में मिलेंगे जिनमे टिहरी और पौड़ी गढ़वाल सबसे आगे हैं, नेताजी की आजाद हिन्द फौज में लगभग 2500 सिपाही गढ़वाली थे। वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली जिन्होंने लाहौर में अंग्रेजों की तरफ से पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था वो भी इसी गढ़वाल से थे। श्रीदेव सुमन जी 209 दिन की जेल यातना, 84 दिन की भूख हड़ताल के बाद श्रीदेव सुमन की आज के ही दिन हुई थी शहादत। 28 साल के जीवन के महत्वपूर्ण दिन, 25 मई 1916 जन्म, जौल गांव चम्बा टिहरी गढवाल, मार्च 1936 – गढदेश सेवा संघ की स्थापना, जून 1937 – ‘सुमन सौरभ’ पुस्तक प्रकाशित की।
जनवरी 1939 – देहरादून में प्रजामण्डल के संस्थापक सचिव चुने गये, मई 1940 – टिहरी रियासत ने भाषण पर प्रतिबन्ध लगाया, मई 1940 – रियासत से निष्कासन, जुलाई 1941 – पहली बार गिरफ्तारी, अगस्त 1942 – दूसरी बार गिरफ्तारी, नवम्बर 1942 – भारत छोडो आन्दोलन के दौरान, आगरा सेन्ट्रल जेल में बन्द, नवम्बर, 1943 – आगरा सेन्ट्रल जेल से रिहाई, दिसम्बर 1943 – तीसरी बार गिरफ्तारी, फरवरी 1944 – टिहरी जेल में सजा, 3 मई 1944 – टिहरी जेल में अनशन शुरू,25 जुलाई 1944 – टिहरी जेल में शहादत हुई।
टिहरी राजशाही की क्रूरता एवं तानाशाही का अंदाजा इस बात लगाइये कि 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ और पूरे देश में तिरँगा फहराया जा रहा था तब गढ़वाल के लोगों को तिरँगा फहराने के जुर्म में राजद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। टिहरी की प्रजा 1 अगस्त 1949 में आजाद हुई जब टिहरी प्रजातंत्र पार्टी के लोगों ने आम चुनाव चुनाव जीतकर दिल्ली का सफर किया और टिहरी का भारत में व लोकतंत्र में विलय हो सका। इस तमाम संघर्ष में वामपंथि विचारधारा और क्रांतिकारियों का सबसे योगदान रहा उसके लिए इतिहास को पढ़ना पड़ेगा।
आज भी वहां की जनता इन राजाओं के प्रति वफादार है। अनजाने में शहीदों का अपमान करती है। बाकी यदि दोष लगना था तो श्रीदेव सुमन का लगना चाहिए? लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजाओं को वरीयता देना यहां की जनता का डर, अज्ञानता, मूर्खता और कायरता से अधिक कुछ नहीं है। इसके लिए शिक्षित लोग ज्यादा जिम्मेदार है क्योंकि वे सच जानकर भी सच को बाहर नही लाते। शायद इसलिए भी कि पहले हम राजाओं के तो अब नेताओं की गुलाम हो गए हैं?
मेरा तो केवल यह मत है कि यदि हम देश मे कांग्रेस के 70 सालों के अवलोकन करके उसे व्यर्थ घोषित कर सकते हैं तो टिहरी के युवा 9वीं सदी से लेकर 21वीं सदी तक का कुल हिसाब इन रजवाड़ों और राजाओं से क्यों नही कर रही है? मीडिया से लेकर बुद्धिजीवी तक इनके वास्तविक वजूद को जनता के समक्ष क्यों नही रखते हैं? जहां तक जनहित या नेक काम की बात हो तो दिल्ली की सल्तनत पर जब औरंगजेब बैठा था तो उसने भी बहुत से अच्छे काम किए हो होंगे। बाकी मेरी ओर से अमर शहीद श्रीदेव सुमन जी को शत–शत नमन।
#आर_पी_विशाल







