Monday, July 13, 2026
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जब लिंगुड़ा देखा, जब याद आया पहाड़।

आए याद पहाड़

By – Diwan mewadi

आज लिंगुड़ क्या आए कि इन्होंने बचपन से मन में बसी पहाड़ की यादें ताज़ा कर दीं।
थाली में रखे लिंगुड़ों को एकटक देख रहा हूं और मन गुनगुना रहा है- यहां भावनाएं उगती हैं, उगते हैं यादों के अंकुर!
यादों के अंकुर उग गए हैं..

वह अपनी गाय-भैंसों के साथ जंगल को जाते हुए उनकी ‘अमाssह’ की आवाज़ सुनना, गले में बंधी घंटी की टिन..टिन..टिन..टिन ! वे घास चरतीं और हम बगल में कल-कल, छल-छल बहते साफ पानी के गधेरे के किनारों पर लिंगुड़ खोजते। लंबे, सिरे की ओर कुंडली की तरह मुड़े हुए ताजा लिंगुड़। शाम को घर पर उनकी स्वादिष्ट सब्जी बनती। लिंगुड़ हंटिंग बचपन में हमारा पसंदीदा शगल हुआ करता था।

लिंगुड़ भी ‘निराला’ के कुकुरमुत्ता की तरह :
‘अपने से उगा मैं
बिना दाने का चुगा मैं
क़लम मेरा नहीं लगता
मेरा जीवन आप जगता!’

पहाड़ के बाशिंदों को कुदरत की बेशकीमती सौगात है लिंगुड़। बाकी सभी साग-सब्जियों से बिल्कुल अलग। अपने प्रकार की बिल्कुल अलग, एक अनोखी स्वादिष्ट सब्जी है यह।

उत्तराखंड में साफ जल की सरिताओं यानी गधेरों के किनारे प्राकृतिक रूप से उगने वाले इस खास पौधे को वनस्पति विज्ञानी डिप्लाज़ियम इस्कुलेंटम कहते हैं। भला डिप्लाज़ियम क्यों? इसलिए कि इसकी बड़ी पत्तियों के पीछे शिरा के दोनों ओर देखें तो आपको बिंदियों जैसी बीजाणुओं की दुहरी कतार दिखाई देगी। ग्रीक भाषा में ‘डिप्लाज़ीईन’ का अर्थ होता है – दुहरी। तो, बीजाणुओं की इस दुहरी कतार की विशेषता के कारण वनस्पति विज्ञानियों ने फर्न के इस वंश का नाम रखा – डिप्लाज़ियम। और, इस्कुलेंटम? प्राचीन लैटिन भाषा में ‘इस्कुलेंटस’ का मतलब है ‘खाने योग्य’ यानी इडिबल। इसलिए इस खाने योग्य फर्न की जाति का नाम रख दिया- इस्कुलेंटम।

लेकिन, लोक की अपनी भाषा होती है जो लोक में ही जन्म लेती है। इसलिए भारत में लोग इसे लिंगुड़, लिंगड़ा, कोथीरा, कसरौत, ढेकी शाक, नेपाल में ढेकिया, निंग्रो, नियुरो, मलेशिया में पाकू, इंडोनेशिया में पाकू-सायुर कहते हैं।

यह औषधीय जंगली बूटी है। इसमें भरपूर कैल्सियम, पोटैशियम तथा लौह तत्व पाया जाता है। विटामिन-सी तथा फाइबर का भी यह अच्छा स्रोत है। यह एंटी ऑक्सीडेंट भी है।

इतना स्वादिष्ट और पौष्टिक, लेकिन एक चेतावनी भी। यह कि मशरूम की तरह जंगल में मिलने वाला हर लिंगुड़ खाने योग्य नहीं होता। इसकी कई जातियां बहुत विषैली होती हैं। बचपन में खूब लिंगुड़ हंटिंग की है इसलिए आदमी को पहचानने में भले ही गलती कर जाएं, लिंगुड़ों को बखूबी पहचान लेते हैं!
वसंत और चौमास के मौसम में कभी पहाड़ जाएं तो खाने योग्य स्वादिष्ट लिंगुड़ों की सब्जी का स्वाद ज़रूर लें।

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