Friday, September 11, 2026
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उद्यमीय विरासत को आगे बढ़ाते : मनीष-हेमा

उद्यमीय विरासत को आगे बढ़ाते : मनीष-हेमा

By – Arun kuksal

‘मेरे पिता कहा करते थे कि ‘जब मेरा पुत्र मेरे साथ है तो मुझे कोई नहीं हरा सकता और मैं सोचता था कि जब मेरे साथ मेरे पिता हैं तो फिर जीवनीय भविष्य के बारे में क्यों चिन्ता करनी है?’
मेरा मानना है कि, अपने गाॅंव-इलाके से पलायन पेट के लिए नहीं अपनी प्रतिभा को परिष्कृत करने और उसके सर्वोत्तम उपयोग के लिए होना चाहिए। गाॅंव-इलाके में जीवकोपार्जन की समस्यायें हैं तो समाधान भी वहीं होंगे। जाहिर है कि, हमें भी वहीं रहकर समाधानों तक पहुंचना होगा।

इसी विचार के तहत समस्याओं से जूझते हुये समाधानों की ओर मेरी यह उद्यमीय जीवन-यात्रा ज़ारी है। मेरे माता-पिता ने यह प्रेरणा दी, अब हम पति-पत्नी का मक़सद है कि हमारे बच्चे हमसे प्रेरित होकर इस उद्यमीय विचार और कार्य को आगे बढ़ायें’।

मनीष सुन्दरियाल जब ये कह रहे हैं, तो मेरी नज़र उनके दोनों सुपुत्रों विजय आर्दश (8 वर्ष) और विजय कीर्ति (7 वर्ष) पर गई है। हमारे आस-पास तमाम तरह का सामान जिनका कोई क्रम नहीं पर अपनी निश्चित उपयोगिता है, के बीच संकरी सी जगह बनाते हुए ये दोनों बच्चे अभ्यस्त हाथों से अचार के पैकिटों को करीने से एक पेटी में रख रहे हैं। उनका ध्यान हमारी बातचीत की ओर भी है। पिता की उक्त बात सुनकर हल्की सी मुस्कराहट उनके चेहरों आई।

और, अब वे दोनों भाई कनखियों से एक-दूसरे को देखकर शर्माते हुए हंस रहे हैं।

डुंगरी गांव की सड़क के ऊपरी छोर का यह पुश्तैनी भवन है। खेतों और पेडों से आई उपजों, बड़े-बड़े ड्रमों में प्रोसेस हो रहे कच्चेमाल और शीशियों एवं पैकिटों में तैयार विविध उत्पादों से यह हाल भरा हुआ है। सुबह का यह समय आज के काम की शुरूआत का है। धीरे-धीरे हाल में आते ही बिखरे सामानों के आस-पास महिलायें और पुरुष अपने नियमित कामों को करने में लग गये हैं।

डुंगरी गांव, पट्टी-गुजडू, विकासखण्ड-नैनीडांडा, तहसील-धूमाकोट, जनपद- पौड़ी (गढ़वाल) में स्थित है। नैनीडांडा और धूमाकोट दोसान्त क्षेत्र है (गढ़वाल-कुमाऊं का सीमावर्ती इलाका)। मेरी जानकारी में इस क्षेत्र के प्रमुख व्यक्तित्वों में स्वतत्रंता संग्राम सेनानी थानसिंह रावत और शीशराम पोखरियाल, राजनीतिज्ञ आनन्दप्रकाश जुयाल, टीपीएस रावत और धीरेन्द्र प्रताप, वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल, उद्यमी विजय सुन्दरियाल, लेखक विष्णुदत्त जुयाल ‘मनुज’ और डा. नरेन्द्र गोनियाल तथा चर्चित प्रशासनिक अधिकारी मंगेश घिल्डियाल इसी इलाके से आते हैं।

यह दोसान्त इलाका (बीरोंखाल, नैनीडाॅंडा, सल्ट, रिखणीखाल, दुगड्डा, जहरीखाल और द्वारीखाल) कृषि उपजों यथा- अनाजों के साथ मिर्च, अदरक, हल्दी, लहसुन, इलाइची, धनिया, तिल, सरसों और फलों के भरपूर उत्पादन तथा सृमद्ध पशुपालन व्यवसाय के लिए जाना जाता है।

यहां ‘तिख़्खी मिर्च अर तगड़ बल्द’ की कहावत मशहूर है।

पशुपालन यहां प्रमुख व्यवसाय रहा है। उत्तराखण्ड राज्य बनने से पहले यहां बैलों का व्यापार खूब होता था। रामनगर का पशु मेला उत्तर-भारत का प्रमुख मेला माना जाता था। चिन्ताजनक यह है कि, राज्य बनने के बाद इस क्षेत्र में खेती बंजर और पशुपालन वीरान होने लगा है।

रामनगर-बीरोंखाल सड़क मार्ग पर स्थित डुंगरी गांव से युवा उद्यमी मनीष सुन्दरियाल और उनकी धर्मपत्नी हेमा सुन्दरियाल द्वारा ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन’ का संचालन होता है। उल्लेखनीय है कि, ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन’ ने पहाड़ के स्थानीय उपजों का प्रसंस्करण और परिष्करण करके विविध उत्पादों के एक व्यापक बाजार को स्थापित करने में सफलता हासिल की है।

पिता-विजय सुन्दरियाल और मां-सरोजनी सुन्दरियाल के सुपुत्र मनीष सुन्दरियाल उत्तराखण्ड के अग्रणी सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता और उद्यमी के रूप में जाने जाते हैं। उनके दादाजी स्वः रुद्रीदत्त सुन्दरियाल इसी डुंगरी गांव में शिक्षक और पोस्टमास्टर थे।

मनीष सुन्दरियाल के पिता स्वः विजय सुन्दरियाल की पहचान उत्तराखण्ड हिमालय में एक उद्यमीय अन्वेषक की रही है। वे एक जनूनी व्यक्ति थे। उनका जीवन उद्यमिता की ओर अभिनव प्रयोगों में बीता। उन्होने अपनी जीवन की शुुरुआत बीएचएएल, हरिद्वार में नौकरी से की थी। परन्तु, जीवन में उद्यमीय कार्य करने की चाह में नौकरी को तिलांजलि दे दी थी।

नौकरी छोड़कर उन्होने सन् 1987 में मुनिकीरेती में ग्लास उद्यम की स्थापना की थी। लेकिन, अनुभव और तकनीकी ज्ञान के अभाव में यह उद्यम चल नहीं पाया। और वे, सन् 1990 में अपने गांव डुंगरी आकर ठेकेदारी करने लगे।

ठेकेदारी में मन नहीं लगा तो सन् 1998 में स्यूंसी-बैजरों में फल प्रसंस्करण का काम शुरू कर दिया। कठिन प्रयासों के बाद सन् 2000 में फल प्रसंस्करण कार्य का उन्हें एफपीओ लाइसेंस मिला। यह उद्यम चल निकला और उनके उत्पादों की लोकप्रियता को एक मजबूत बाजार मिलने लगा। बाद में, सन् 2005 से अपने गांव डुंगरी से ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन’ का उद्यम उन्होने संचालित करना शुरू किया।

मनीष सुन्दरियाल ने अपने विद्यार्थी जीवन से ही सामाजिक कार्यों और गतिविधियों में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया था। इसी विचार के तहत सन् 2003 में क्षेत्र पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा। वर्ष-2003 में गुजडू गढ़ी में विभिन्न विकास कार्यों के लिए 16 दिन का उनका आमरण अनशन रहा। उन्होने युवा बेरोजगार संगठन के केन्द्रीय संयोजक के बतौर ‘धूमाकोट से रामपुर तिराहा’ तक की अपने साथियों के साथ पैदल यात्रा पूरी की थी।

सन् 2006 में राजनीति विज्ञान से एम. ए. की उपाधि प्राप्त करने के बाद मनीष ने अपने को सामाजिक सेवा की ओर पूर्णतया समर्पित कर दिया। विभिन्न आन्दोलनों में भागेदारी करते हुए सन् 2007 में पहले आम-चुनाव पुनः उप-चुनाव में धूमाकोट विधानसभा तथा वर्ष- 2012 एवं 2017 में लैंसडोन विधानसभा से विधायक का चुनाव लड़ा।

सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता के साथ जीवकोपार्जन के लिए उन्होने अपने पिता स्वः विजय सुन्दरियाल की उद्यमीय विरासत को आगे बढ़ाने की राह का चयन किया। आज ‘सुन्दरियाल प्रोडक्शन’ का यह उद्यम सरकारी योजनाओं के बल पर नहीं उनकी पूरी टीम के मजबूत हौंसले के साथ उद्यमीय परचम लहरा रहा है। बावजूद इसके कि, सभी औपचारिकताओं को पूर्ण करने बाद भी सरकारी योजनाओं का उन्हें कोई फायदा नहीं मिल पाया है।

वर्तमान में, ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन’, डुंगरी गांव में पहाड़ी उपजों से खाद्य और फल संस्करण पर आधारित 60 से अधिक उत्पाद बनते हैं। जिसमें विविध पकवानों के साथ जूस, अचार, नमक, मसाला, बेकरी आदि शामिल हैं। इस उद्यम में 20 महिलायें और 5 पुरुष विगत कई वर्षों से नियमित काम कर रहे हैं। साथ ही, स्थानीय 500 परिवार ‘सुन्दरियाल प्रोडक्शन’ से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से व्यापारिक लेन-देन के रूप में जुडे़ हैं। प्रमुखतया, स्थानीय पहाड़ी गांवों के खेतों और पेड़ों से मिलने वाले कच्चामाल और उपज की आपूर्ति इन्हीं परिवारों के माध्यम से होती है।

अपने वाहनों के द्वारा उत्तराखण्ड, उत्तर-प्रदेश और दिल्ली राज्य के विभिन्न नगरों/महानगरों में प्रर्दशनी, सचल वाहन और विक्रेताओं तक ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन’ के उत्पादों को विपणन के लिए पहुॅंचाया जाता है। यह सिलसिला देश-दुनिया में बड़ी-बड़ी कम्पनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा लेते हुए ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन ’ के उत्पादों की बड़ती मांग के कारण निरंतर लोकप्रियता की ओर है। वर्तमान में ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन’ का औसतन, वार्षिक टर्न-ओवर 50 लाख के आस-पास है।

मनीष सुन्दरियाल अपने उद्यम के वार्षिक लाभ का 5 प्रतिशत सामाजिक कार्यों में व्यय करते हैं। क्योंकि, वे विचार, चिन्तन और स्वभाव से सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनके लिए उद्यम तो अपने पारिवारिक जीवकोपार्जन और अन्य युवाओं को स्वः उद्यम की ओर प्रेरित करने के लिए है। वे ‘सुन्दरियाल प्रोड्क्शन’ को इस इलाके की जीवन-शैली में घर कर चुके नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलने के परामर्श केन्द्र के रूप में विकसित कर रहे हैं।

मनीष कहते हैं कि मैंने बचपन से ही अपने पिता को नित्य-प्रतिदिन संघर्ष करते हुए देखा। पिताजी को पारिवारिक, सामाजिक और सरकारी स्तर पर समुचित प्रोत्साहन नहीं मिल पाया। परिवार और स्थानीय लोगों की यही सोच रहती कि कारोबार तो दिल्ली, कानपुर, गाजियाबाद और फरीदाबाद में ही किया जा सकता है (कमोवेश आज भी यही नकारात्मक सोच हमारे पर्वतीय अंचलों में व्याप्त है।)। अर्थात, उद्यम शुरू करने के लिए विपरीत परिस्थितियां घर में ही मौजूद थी।

इस सबके बावजूद वे अपनी असफलताओं से कुछ समय के लिए उदास जरूर होते पर निराशा कभी उनके मन-मस्तिष्क में आई ही नहीं। तभी तो, वे एक प्रयोग के बाद दूसरे प्रयोग को हकीक़त में लाने के लिए जी-जान से जुट जाते थे।

मनीष बताते हैं कि किशोरावस्था में वे पिता के साथ विविध पहाड़ी उत्पादों को बेचने दिल्ली जाया करते थे। दिल्ली में गढ़वाल भवन में रहने का ठिकाना मिला तो यह कार्य फैलने लगा। लेकिन, अभी भी ज्यादातर जान-पहचान के लोग इस कार्य को युक्ति-संगत नहीं समझते थे। तब मेरे पिता कहा करते थे कि ‘जब मेरा पुत्र मेरे साथ है तो मुझे कोई नहीं हरा सकता और मैं सोचता था कि जब मेरे साथ मेरे पिता हैं तो फिर जीवनीय भविष्य के बारे में क्यों चिन्ता करनी है? उनके पिताजी ने 1 जुलाई, 2021 को अपनी मृत्यु तक यह साथ निभाया। नतीजन, पिता के साथ-साथ पुत्र को भी पारिवारिक, सामाजिक और सरकारी स्तर पर मिले कड़वे अनुभवों ने कमजोर नहीं और मज़बूत बनाया।

मनीष सुन्दरियाल विगत 5 वर्षों से अपने पिता की पुण्य-स्मृति में 1 जुलाई को ‘स्वरोजगार दिवस’ के रूप में गोष्ठी का आयोजन करते हैं। इसमें स्वः रोजगार में प्रशंसनीय कार्य करने वाले उद्यमियों को सम्मानित भी किया जाता है।

मनीष का उद्धेश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। इसमें वे सबसे बड़ी बाधक सरकारी नीतियों और कार्य पद्धतियों को मानते हैं। वे कहते हैं कि, ‘सरकार के कार्य और उपलब्धियां बस प्रचार और विज्ञापनों में ही दिखाई देते हैं। वास्तविक धरातल पर सरकारी योजनाओं का अस्तित्व नगण्य होता है। सरकार दावे बड़े-बड़े करती है और स्थानीय किसानों को उनके उपज का समुचित दाम भी नहीं दिला पाती है। पहाड़ के परम्परागत बीज, अनाज, फल और सब्जी खत्म होने के कगार पर हैं। इनको बढ़ावा देने के बजाय सरकार हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्बू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों से बीज और पौधे लाने में अपनी होशियारी समझ रही है। कृषि, उद्यान और उद्योग विभाग के कुल बजट का अधिकांश भाग इसी प्रकार के अनावश्यक कार्यों में व्यय हो रहा है। रामनगर से आये बिचौलिये किसानों को भरमा कर उनका शोषण कर रहे हैं। सरकार इन पर नियंत्रण न करके उन्हीं को पनाह देती नज़र आती है’।

मनीष कहते हैं कि, आन्दोलनकारियों और जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’, हीरासिंह राणा तथा नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों में जिस उत्तराखण्ड राज्य का सपना सुना-देखा था, वो ये तो नहीं है।

हमारा तो मानना था कि, हमारा राज्य होगा तो विकास सरल और सहज होगा। पर आज हमारे ही लोग इस राज्य के लिए बोझ बन गए हैं। उनकी न केवल सही सोच है वरन सामाजिक व्यवहार भी ठीक नहीं है। हमने राज्य बनने के बाद आपसी सामाजिक सौहार्द भी खोया। वे मानते हैं कि हम राज्य के सर्वागींण विकास की बेहतर परिस्थितियों का लाभ नहीं ले पाये हैं।

मनीष चिन्तित हैं कि तेजी से पहाड़ों से हो रहे पलायन के कारण वर्ष-2027 के परिसीमन के बाद मैदानी भागों की विधानसभा सीटें तो बड़ेगी जबकि पहाड़ों में विधानसभा सीटें कम होंगी। मनीष रोष व्यक्त करते हैं कि, ‘आज नीति-नियताओं ने हम पर्वतीय लोगों को घाट का मुर्दा जैसा बना दिया है, जिसे फूंकना ही है। उसे वापस घर तो ला नहीं सकते हैं’।

मनीष सुन्दरियाल जो सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में पूरी सजगता के साथ सक्रीय हैं की बातों में अवश्य भरपूर उदासी हैं, परन्तु मन-मस्तिष्क से वो अपने उद्यमी पिता की तरह भविष्य के प्रति निराश नहीं हैं।

मेरा दृड मत है कि मनीष की तरह उत्तराखण्ड के युवाओं में व्याप्त ये बैचैनी ही इस दौर के कुहासे को हटाने में मददगार होगी।

……………………….

अरुण कुकसाल
ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौं-246163
पट्टी- असवालस्यूॅं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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