रायबहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी की 139वीं जयंती: शिल्पकार समाज के लिए ऐतिहासिक योगदान, वर्तमान चुनौतियाँ एवं भावी समाधान
Dr. Sanjay
उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक इतिहास में ‘हिमशिल्पी’ एवं ‘शिल्पकार क्रांति के जनक’ के रूप में पूजनीय रायबहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी की 139वीं जयंती (26 अगस्त 1887 – 26 अगस्त 2026) के अवसर पर समूचे समाज की ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि एवं हार्दिक बधाई संदेश समर्पित करते हैं। मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी ने कुमाऊँ एवं गढ़वाल के सामाजिक परिदृश्य में उस समय चेतना की मशाल जलाई, जब वंचित और शोषित वर्ग सदियों की सामाजिक असमानता, छुआछूत और आर्थिक पराधीनता से ग्रसित था।
उन्हें समाज विज्ञानियों द्वारा “उत्तराखंड का आंबेडकर” कहा जाता है। उन्होंने न केवल शिल्पकार समाज को एक सम्मानजनक नाम और पहचान दिलाई, बल्कि शिक्षा, रोजगार, भूमि स्वामित्व, राजनीति और सैन्य सेवाओं में उनके अधिकारों की ऐतिहासिक नींव भी रखी। उनकी 139वीं जयंती का यह अवसर उनके बहुआयामी योगदान का सूक्ष्म विश्लेषण करने, वर्तमान समय में शिल्पकार समाज द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों को रेखांकित करने और उनके दीर्घकालिक समाधान हेतु एक रणनीतिक खाका प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करता है।
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा का जीवन परिचय एवं चेतना का अभ्युदय
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी का जन्म 26 अगस्त 1887 को अल्मोड़ा के एक समृद्ध ताम्र-शिल्पी एवं व्यापारी परिवार में हुआ था। उनके पिता गोविंद प्रसाद टम्टा एवं माता गोविंद देवी थीं। उनके पिता का स्थानीय व्यापार में अच्छा वर्चस्व था, जिसके कारण परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति साधारण शिल्पकार परिवारों से बेहतर थी। बाल्यावस्था में ही माता-पिता के निधन के पश्चात उनका पालन-पोषण उनके मामा कृष्णा टम्टा के संरक्षण में हुआ, जो स्वयं अल्मोड़ा के प्रसिद्ध व्यवसायी एवं अग्रणी समाजसेवी थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक एवं माध्यमिक शिक्षा दिग्गी बंगला स्कूल तथा मिशन स्कूल से पूर्ण की। अपनी कुशाग्र बुद्धि के बल पर उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, फारसी, उर्दू और कुमाऊंनी भाषाओं पर उत्कृष्ट महारत हासिल की, जिसके कारण उन्हें ‘मुंशी’ की गरिमामय उपाधि से विभूषित किया गया। 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह पहल गाँव की सुसंस्कृत एवं दलित-हितैषी पार्वती देवी (पन्ना देवी) से हुआ।
मुंशी जी के जीवन की दिशा को बदलने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटना सन 1911 में घटित हुई। अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मैदान में जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक के अवसर पर एक भव्य शाही दरबार का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम के मंडप की सजावट हेतु मुंशी हरि प्रसाद टम्टा और उनके मामा कृष्णा टम्टा ने स्वयं कपड़ा एवं सजावटी सामग्री प्रदान की थी। किंतु जब दोनों मामा-भांजे मंच के समीप रखी कुर्सियों पर बैठने लगे, तो सवर्ण वर्ग के अभिजात्य लोगों ने उन्हें अपमानित करते हुए उठने पर मजबूर कर दिया और कहा कि अछूत होकर कुर्सियों पर बैठने का दुस्साहस कैसे किया, दूर जाकर खड़े रहो वरना बलवा हो जाएगा।
इस अपमानजनक घटना ने मुंशी जी के मन पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने बाद में लिखा कि पच्चीस वर्ष बीत जाने के बाद भी वे इस अपमान को नहीं भूल सके हैं। इसी अपमानबोध ने उन्हें शिल्पकार समाज की मुक्ति और सामाजिक समरसता के लिए संस्थागत क्रांति शुरू करने का संकल्प दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने टम्टा सुधार सभा से लेकर समाचार पत्रों, परिवहन कंपनियों और सैन्य भर्तियों तक एक बहुआयामी आंदोलन की शुरुआत की।
शिल्पकार समाज के उत्थान में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा का ऐतिहासिक योगदान
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा का योगदान केवल एक आंदोलनकारी तक सीमित नहीं था; वे एक दूरदर्शी समाजशास्त्री, कुशल राजनीतिज्ञ, उद्यमी और पत्रकार थे। उन्होंने शिल्पकार समाज के पुनरुद्धार के लिए बहुआयामी रणनीतियाँ अपनाईं।
संस्थागत ढाँचे का निर्माण एवं ‘शिल्पकार’ पहचान की स्थापना सन 1905 में मुंशी जी ने अपने मामा कृष्णा टम्टा के साथ मिलकर ‘टम्टा सुधार सभा’ का गठन किया, जिसका उद्देश्य अछूत जातियों के बीच शिक्षा का प्रसार, कुटीर उद्योगों का विकास और युवाओं को स्वरोजगार हेतु प्रेरित करना था। 1914 में इस संस्था का विस्तार करते हुए इसका नाम ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ कर दिया गया, जिसके वे आजीवन अध्यक्ष रहे।
तद्युगीन समाज में पर्वतीय क्षेत्र के दस्तकारों और श्रमजीवियों के लिए अपमानजनक और हेय शब्दों का प्रयोग किया जाता था। मुंशी जी के प्रयासों से 1913 में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय ने नैनीताल के सुंकिया सम्मेलन में पहली बार इन वंचित वर्गों के लिए ‘शिल्पकार’ शब्द का सार्वजनिक उपयोग किया। निरंतर अभियानों के बाद 1925-1926 में ब्रिटिश सरकार ने ‘शिल्पकार’ शब्द को आधिकारिक एवं कानूनी मान्यता दी। इसके उपरांत 1931 की जनगणना में सभी शोषित जातियों के लिए जातिसूचक अपमानजनक शब्दों के स्थान पर एकमात्र सर्वसमावेशी शब्द ‘शिल्पकार’ दर्ज किया गया, जिसने विभिन्न उप-जातियों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया।
शैक्षणिक क्रांति एवं सामाजिक-धार्मिक सुधार
मुंशी जी का स्पष्ट मानना था कि शिक्षा ही सामाजिक गुलामी से मुक्ति का एकमात्र साधन है। उन्होंने ब्रिटिश शासन और नगरपालिकाओं पर दबाव बनाकर संपूर्ण कुमाऊँ में प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य करने की माँग रखी। उन्होंने ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्रों में 150 से अधिक प्राथमिक एवं प्रौढ़ पाठशालाओं की स्थापना की।
इसके अतिरिक्त, 24-25 सितंबर 1925 को अल्मोड़ा के दियोलीडांडा के जंगलों में ऐतिहासिक सर्वकुमाऊंनी शिल्पकार सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक समानता से संबंधित 10 प्रमुख प्रस्ताव पारित किए गए। मुंशी जी ने समाज को हीनभावना से उबारने के लिए शिल्पकारों को जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण कराया और नाम के अंत में राम, प्रसाद, कुमार, लाल, चंद्र जैसे सम्मानजनक उपनाम लगाने का आह्वान किया।
दलित पत्रकारिता का बीजारोपण: ‘समता’ समाचार पत्र
सामाजिक और राजनीतिक चेतना के विस्तार हेतु मुंशी हरि प्रसाद टम्टा ने 1934 में अल्मोड़ा के थाना बाजार स्थित टम्टा प्रिंटिंग प्रेस से हिंदी साप्ताहिक पत्र ‘समता’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। ‘समता’ ने शोषित वर्ग की आवाज को निर्भीकता से उठाया और प्रशासन की जनविरोधी नीतियाँ उजागर कीं।
सन 1935 में मुंशी जी की भतीजी लक्ष्मी देवी टम्टा ने इस समाचार पत्र का संपादन संभाला। लक्ष्मी देवी टम्टा न केवल उत्तराखंड की पहली दलित महिला स्नातक थीं, बल्कि उत्तराखंड इतिहास की प्रथम महिला संपादक बनने का गौरव भी उन्हें ही प्राप्त है। मुंशी जी की प्रेरणा से स्थापित ‘समता’ के माध्यम से महिलाओं की शिक्षा, बाल-विवाह निषेध और विधवा पुनर्विवाह जैसे प्रगतिशील सामाजिक मुद्दों को प्रखरता से उठाया गया।
आर्थिक स्वावलंबन एवं उद्यमशीलता
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा व्यावसायिक दूरदर्शिता के धनी थे। पर्वतीय क्षेत्रों में परिवहन की विकट समस्या को देखते हुए उन्होंने 1920 में ‘हिल मोटर्स ट्रांसपोर्ट कंपनी’ की स्थापना की। यह कुमाऊँ में हल्द्वानी से अल्मोड़ा व नैनीताल के बीच मोटर सेवा संचालित करने वाली पहली संगठित ट्रांसपोर्ट कंपनी थी।
इस कंपनी के माध्यम से उन्होंने 600 से अधिक शिल्पकार युवाओं को रोजगार प्रदान किया। उन्होंने हल्द्वानी में वाहन प्रशिक्षण केंद्र खोला जहाँ युवाओं को ड्राइविंग और मैकेनिकल कार्य सिखाया गया। इन कर्मचारियों को नियमानुसार वेतन, निःशुल्क वर्दी और भोजन दिया जाता था, जो उस दौर में एक पेशेवर कॉर्पोरेट कार्य-संस्कृति का अनूठा उदाहरण था।
प्रशासनिक, सेना और राजनीतिक क्षेत्र में प्रतिनिधित्व
मुंशी जी ने शिल्पकार समाज को प्रशासनिक और सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी दिलाने के लिए लगातार संवैधानिक संघर्ष किया। ब्रिटिश काल में शिल्पकारों को सेना योग्य नहीं माना जाता था। मुंशी जी ने तर्क दिया कि यह समाज धातुओं से हथियार बनाना और उन्हें चलाना दोनों जानता है। उनके प्रयासों से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शिल्पकारों के लिए सैन्य दरवाजे खुले और पायनियर बटालियनों का निर्माण कर लगभग 5,000 शिल्पकार युवाओं को ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती कराया गया।
सन 1935 के बाद उनके प्रयासों से शिल्पकारों को पुलिस, अर्दली, माली और चपरासी जैसे पदों पर नियुक्तियाँ मिलने लगीं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाकर कुमाऊँ और गढ़वाल में भूमिहीन शिल्पकारों के मध्य लगभग 30,000 एकड़ कृषि भूमि का वितरण करवाया। 1931 के गोलमेज सम्मेलन के दौरान उन्होंने बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के पूना पैक्ट और पृथक निर्वाचिका संबंधी रुख का समर्थन करते हुए लंदन तार भेजा था। वे 1934 से 1940 तक ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन की संयुक्त प्रांत शाखा के उपाध्यक्ष रहे। 1937 में वे संयुक्त प्रांत विधानसभा के लिए गोंडा से निर्विरोध विधायक चुने गए। 1942 से 1945 तक वे नगरपालिका अल्मोड़ा के चेयरमैन रहे तथा बाद में जिला परिषद के सदस्य चुने गए। सामाजिक सेवाओं के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1935 में उन्हें ‘रायबहादुर’ की उपाधि प्रदान की।
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा के जीवन एवं कार्यों की ऐतिहासिक समयावली
वर्ष
प्रमुख घटना / मील का पत्थर
सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव
1887
26 अगस्त को अल्मोड़ा में जन्म
पर्वतीय दलित पुनर्जागरण के युग का प्रारंभ।
1905
‘टम्टा सुधार सभा’ का गठन
दस्तकारों के सुधार हेतु प्रथम संगठित संस्थागत प्रयास।
1911
बद्रेश्वर दरबार में जातीय अपमान का शिकार
छुआछूत उन्मूलन हेतु आजीवन संकल्प का उत्प्रेरक।
1914
‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ में नाम परिवर्तन
सर्व-शिल्पकार एकता और शैक्षणिक माँगों का संस्थागत मंच।
1920
‘हिल मोटर्स ट्रांसपोर्ट कंपनी’ की स्थापना
600+ शिल्पकारों को रोजगार व व्यावसायिक प्रशिक्षण।
1925
दियोलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन
जनेऊ धारण, नाम परिवर्तन व 10 ऐतिहासिक प्रस्तावों की स्वीकृति।
1926-31
‘शिल्पकार’ नाम को सरकारी व जनगणना मान्यता
आधिकारिक दस्तावेजों में ‘शिल्पकार’ शब्द का स्थायी अंकन।
1931
लंदन में डॉ. आंबेडकर को समर्थन तार
राष्ट्रीय स्तर पर दलित आंदोलनों के साथ एकीकरण।
1934
‘समता’ साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन
दलित पत्रकारिता एवं जन-जागृति का ऐतिहासिक माध्यम।
1935
‘रायबहादुर’ उपाधि एवं लक्ष्मी देवी टम्टा द्वारा संपादन
प्रथम दलित महिला संपादक का उदय; नौकरियों में प्रवेश की शुरुआत।
1937
संयुक्त प्रांत विधानसभा में निर्विरोध निर्वाचन
प्रांतीय विधायिका में शिल्पकारों की सीधी राजनीतिक आवाज।
1938-42
सेना में पायनियर बटालियन भर्ती व 30,000 एकड़ भूमि वितरण
5,000 शिल्पकारों का सैन्य प्रवेश एवं भूमिहीनता का अंत।
1942-45
अध्यक्ष, अल्मोड़ा नगरपालिका परिषद
स्थानीय स्वशासन में दलित नेतृत्व का ऐतिहासिक उदाहरण।
1960
23 फरवरी को प्रयागराज में देहावसान
एक महान युग का अंत, किंतु अमर वैचारिक विरासत का निर्माण।
विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि एवं ऐतिहासिक प्रभाव
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा के कार्यों का ऐतिहासिक विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका आंदोलन केवल तात्कालिक सुधारों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने पर्वतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना के मूलभूत ढाँचे को पुनर्गठित किया। मुंशी जी से पूर्व पर्वतीय क्षेत्रों में टम्टा, लोहार, ओड़, आरी, भूल, दर्जी जैसी विभिन्न दस्तकार जातियाँ बिखरी हुई थीं। ‘शिल्पकार’ शब्द की स्वीकृति ने इन सभी उप-जातियों को एक साझा राजनीतिक एवं सामाजिक पहचान प्रदान की। इसका दूरगामी प्रभाव यह हुआ कि दस्तकारों की सामाजिक सौदेबाजी की शक्ति बढ़ी और वे संगठित होकर अपने अधिकारों की माँग करने में सक्षम हुए।
उत्तराखंड का शिल्पकार आंदोलन दो स्पष्ट धाराओं में संचालित हो रहा था। एक धारा जयनानंद भारतीय और खुशी राम के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस से जुड़ी हुई थी, जबकि दूसरी धारा मुंशी हरि प्रसाद टम्टा के नेतृत्व में प्रशासनिक-सहयोगवादी दृष्टिकोण रखती थी। मुंशी जी का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता से पूर्व शिल्पकार समाज का शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त होना अनिवार्य है, अन्यथा सत्ता परिवर्तन के बाद भी दलित वर्ग पारंपरिक अभिजात्य वर्ग के अधीन ही रहेगा। इस व्यावहारिक दृष्टिकोण के कारण ही वे नौकरियों, सेना भर्ती और भूमि आवंटन में प्रत्यक्ष अधिकार प्राप्त कर सके। इसके अतिरिक्त, ‘हिल मोटर्स ट्रांसपोर्ट कंपनी’ की स्थापना करके उन्होंने यह सिद्ध किया कि दलित समुदाय केवल पारंपरिक सेवा प्रदाता नहीं है, बल्कि वह आधुनिक उद्यमशीलता और रोजगार सृजन का नेतृत्व भी कर सकता है।
वर्तमान में शिल्पकार समाज की समस्याएँ एवं चुनौतियाँ
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी द्वारा रखी गई ऐतिहासिक नींव के बावजूद, 21वीं सदी में उत्तराखंड का शिल्पकार समाज कई गंभीर सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक संकटों का सामना कर रहा है।
पारंपरिक हस्तशिल्प एवं ताम्र-कला का अस्तित्व संकट
अल्मोड़ा की 400 वर्ष पुरानी पारंपरिक ताम्र-कला आज अपने सबसे विकट दौर से गुजर रही है। कुछ दशक पूर्व तक अल्मोड़ा के टम्टा मोहल्ले में लगभग 72 परिवार तांबे के बर्तन और हस्तशिल्प बनाने के पारंपरिक पेशे से जुड़े थे, जो आज घटकर मात्र 10 से 12 परिवारों तक सीमित हो गए हैं। हाथों से पीट-पीटकर शुद्ध तांबे के गगरे, फिल्टर और पूजा के बर्तन बनाने वाले दस्तकारों को बाजार में मशीनों से बने सस्ते उत्पादों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। इसके अलावा, पूर्व में तांबा शिल्प में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, जो भट्टी जलाने और पॉलिशिंग में मदद करती थीं। पर्यटन और होटल उद्योग के विस्तार के कारण महिलाओं के अन्य दैनिक मजदूरी कार्यों में चले जाने से पारिवारिक कार्यशाला ढाँचा टूट गया है, जिससे अकेले कारीगर के लिए उत्पादन समय और लागत बढ़ गई है।
कच्चे माल की अनुपलब्धता, बिचौलियों का शोषण एवं करों का बोझ
पारंपरिक शिल्पकारों के सामने कच्चे माल की महँगाई एक प्रमुख बाधा है। पूर्व में तांबे का कच्चा माल समीपवर्ती क्षेत्रों से आसानी से मिल जाता था, परंतु अब आपूर्ति श्रृंखला टूटने के कारण कारीगरों को थोक बिचौलियों से महँगे दामों पर कॉपर रोल खरीदने पड़ते हैं। बिचौलिए ₹700 मूल्य का कच्चा माल ₹1000 तक में बेचकर भारी मुनाफा कमाते हैं। इसके साथ ही, कच्चे माल पर लगने वाले जीएसटी और उच्च करों के कारण कारीगरों का लाभ मार्जिन समाप्त हो गया है, जिससे उनकी आय में ठहराव आ गया है।
जी.आई. टैग का अप्रभावी क्रियान्वयन
उत्तराखंड के ‘अल्मोड़ा ताम्र उत्पाद’ को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त हो चुका है। राज्य सरकार द्वारा विभिन्न मंचों पर इसका प्रचार भी किया जा रहा है। हालाँकि, धरातल पर कारीगरों को इस जीआई टैग का कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा है। कारीगरों का मानना है कि जब तक सरकार सस्ते कच्चे माल और सुनिश्चित बाजार की व्यवस्था नहीं करती, तब तक जीआई टैग केवल एक कागजी उपलब्धि बना रहेगा। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजारों में इन उत्पादों की डिजिटल मार्केटिंग की कोई संगठित प्रणाली नहीं है।
कृषि निर्भरता, भूमिहीनता एवं युवा पीढ़ी का विमुख होना
उत्तराखंड में अनुसूचित जाति आबादी का लगभग 68.5% भाग अब भी कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। इनमें से अधिकांश सीमांत या छोटे भूस्वामी हैं, जिनकी आजीविका पर्वतीय कृषि की विकट परिस्थितियों में असुरक्षित बनी रहती है। दूसरी ओर, नई पीढ़ी के शिल्पकार युवा पारंपरिक हस्तशिल्प और धातु कार्य में कम आय तथा सामाजिक उदासीनता के कारण इसमें रुचि नहीं ले रहे हैं। वे आजीविका की तलाश में मैदानी शहरों की ओर पलायन कर असंगठित सेवा क्षेत्रों में कम वेतन वाली नौकरियों के लिए मजबूर हैं।
सूक्ष्म सामाजिक भेदभाव एवं शैक्षणिक विषमताएँ
यद्यपि शहरी क्षेत्रों में प्रत्यक्ष छुआछूत में कमी आई है, परंतु पर्वतीय क्षेत्रों के सुदूर ग्रामीण अंचलों में सामाजिक भेदभाव, सार्वजनिक धार्मिक स्थलों या मांगलिक आयोजनों में सूक्ष्म स्तर पर पृथक्कीकरण की समस्याएँ आज भी यदा-कदा देखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त, उच्च शिक्षा, तकनीकी संस्थानों और व्यावसायिक क्षेत्रों में शिल्पकार समाज के युवाओं की पहुँच को और अधिक सुलभ बनाने की आवश्यकता है।
शिल्पकार समाज की समकालीन सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण
सूचकांक / क्षेत्र
वर्तमान स्थिति एवं आँकड़े
मुख्य कारण / कारक
जनसांख्यिकी एवं पहचान
उत्तराखंड की कुल अनुसूचित जाति आबादी का ~52% हिस्सा शिल्पकार हैं।
राज्य का सबसे बड़ा दलित समूह, जिसमें विभिन्न पारंपरिक दस्तकार शामिल हैं।
ताम्र-शिल्प परिवार (अल्मोड़ा)
72 परिवारों से घटकर मात्र 10-12 परिवार शेष।
कच्चे माल की उच्च लागत, मशीनी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा और कम आय।
आजीविका पैटर्न
~68.5% आबादी कृषि पर निर्भर।
औद्योगिक विकास का अभाव और पारंपरिक हस्तशिल्पों का पतन।
जीआई टैग (GI Tag) प्रभाव
पंजीकृत उत्पाद (2021/2023), किंतु आर्थिक लाभ सीमित।
संस्थागत विपणन, ब्रांडिंग और कच्चे माल के सहयोग का अभाव।
कच्चे माल का अर्थशास्त्र
₹700 का कॉपर रोल बिचौलियों द्वारा ₹1000 में विक्रय।
सरकारी ‘रॉ मैटेरियल बैंक’ का न होना और मध्यस्थों का प्रभाव।
युवा रोजगार प्रवृत्ति
पारंपरिक शिल्प छोड़कर सेवा क्षेत्र/होटल नौकरियों में पलायन।
पारंपरिक कार्यों में कम लाभ और सामाजिक प्रतिष्ठा की कमी।
शिल्पकार समाज की समस्याओं का स्थायी समाधान एवं भावी रोडमैप
मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी की 139वीं जयंती मनाते हुए यह आवश्यक है कि उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए वर्तमान समस्याओं के व्यावहारिक एवं नीतिगत समाधान लागू किए जाएँ।
‘रॉ मैटेरियल बैंक’ की स्थापना एवं कर राहत
उत्तराखंड सरकार के उद्योग विभाग द्वारा अल्मोड़ा, बागेश्वर और श्रीनगर जैसे शिल्प केंद्रों में ‘रॉ मैटेरियल बैंक’ स्थापित किए जाने चाहिए, जो ताम्र और लोह शिल्पकारों को बिना किसी बिचौलिए के सीधे रियायती दरों पर ताँबा, पीतल और अन्य कच्चा माल उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही, हस्तशिल्प में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल पर कर दरों को न्यूनतम किया जाए ताकि कारीगरों का लाभ मार्जिन बढ़ सके।
जी.आई. टैग का व्यावसायिक उपयोग एवं एकीकृत विपणन
हल्द्वानी में स्थापित जीआई प्रॉडक्ट्स गैलरी की तर्ज पर देहरादून, हरिद्वार, दिल्ली और प्रमुख पर्यटन स्थलों पर ‘शिल्पकार एम्पोरियम’ स्थापित किए जाने चाहिए। एमएसएमई विभाग के माध्यम से शिल्पकारों के उत्पादों को अमेज़न, फ्लिपकार्ट, ट्राइब्स इंडिया (TRIFED) और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए। उत्पादों पर होलोग्राफिक जीआई क्यूआर कोड लगाया जाए जो उत्पादक शिल्पकार की प्रामाणिकता की गारंटी दे।
आधुनिक तकनीक, डिजाइन इनोवेशन एवं क्लस्टर विकास
हस्तशिल्पियों की हस्त-निर्माण तकनीक की मौलिकता को बनाए रखते हुए उन्हें आधुनिक पॉलिशिंग, कटिंग और फिनिशिंग टूलकिट प्रदान की जानी चाहिए ताकि श्रम का समय कम हो सके। राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (NID) और निफ्ट (NIFT) के सहयोग से शिल्पकारों को आधुनिक इंटीरियर डिजाइन, स्मारिकाओं और सजावटी वस्तुओं के निर्माण हेतु प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
‘मुंशी हरि प्रसाद टम्टा स्वरोजगार एवं सहकारिता योजना’
मुंशी टम्टा जी की ‘हिल मोटर्स’ की तर्ज पर शिल्पकार दस्तकारों की सहकारी समितियाँ बनाई जाएँ। सरकार इन समितियों को बिना ब्याज के कार्यशील पूँजी और विपणन प्रोत्साहन उपलब्ध कराए। ‘समता’ अखबार की ऐतिहासिक विरासत को सहेजने हेतु अल्मोड़ा में ‘मुंशी हरि प्रसाद टम्टा दलित एवं क्षेत्रीय पत्रकारिता संस्थान’ की स्थापना की जाए, जो वंचित वर्ग के युवाओं को मीडिया और डिजिटल संचार में छात्रवृत्ति और प्रशिक्षण दे।
सामाजिक समरसता, शिक्षा एवं कानूनी सुरक्षा
सुदूर ग्रामीण अंचलों में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन हो तथा विद्यालयों में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा और उत्तराखंड के शिल्पकार आंदोलन का इतिहास पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। शिल्पकार समाज के बच्चों के लिए राज्य के प्रत्येक जिले में सर्वसुविधायुक्त मुफ्त आवासीय विद्यालय और उच्च शिक्षा हेतु मुंशी हरि प्रसाद टम्टा छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाए।
शिल्पकार समाज हेतु रणनीतिक एक्शन मैट्रिक्स
समस्या का क्षेत्र
वर्तमान चुनौती
प्रस्तावित रणनीतिक समाधान
कार्यान्वयन एजेंसी
कच्चा माल एवं लागत
बिचौलियों का एकाधिकार; उच्च मूल्य एवं करों का भार।
‘रॉ मैटेरियल बैंक’ (RMB) की स्थापना; रियायती दर पर सामग्री।
उत्तराखंड उद्योग विभाग एवं एमएसएमई (MSME)
बाजार एवं जीआई टैग
जीआई टैग का धरातलीय लाभ नहीं; प्रत्यक्ष बाजार पहुँच का अभाव।
GeM पोर्टल पर अनिवार्य लिस्टिंग; जीआई ब्रांडिंग व TRIFED सहबद्धता।
ट्रिफेड (TRIFED) एवं पर्यटन-उद्योग विभाग
तकनीक एवं डिजाइन
पारंपरिक उत्पाद आधुनिक बाजारों से मेल नहीं खाते; श्रम-साध्य प्रक्रिया।
NID/NIFT द्वारा डिजाइन वर्कशॉप; आधुनिक टूलकिट वितरण।
हस्तशिल्प विकास निगम एवं खादी ग्रामोद्योग
युवा पलायन
कम आय एवं सामाजिक उपेक्षा के कारण युवा पारंपरिक शिल्प छोड़ रहे हैं।
‘मुंशी हरि प्रसाद टम्टा स्वरोजगार योजना’ के तहत रियायती ऋण।
राज्य योजना आयोग एवं राष्ट्रीयकृत बैंक
सामाजिक भेदभाव
ग्रामीण अंचलों में सूक्ष्म छुआछूत एवं शैक्षणिक विषमताएँ।
पाठ्यक्रम में शिल्पकार इतिहास का समावेश; आधुनिक छात्रावासों का निर्माण।
शिक्षा विभाग एवं समाज कल्याण विभाग
रायबहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी का जीवन संघर्ष, आत्मसम्मान और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का एक अनूठा उदाहरण है। उन्होंने अपने व्यक्तिगतअनुभवों को पूरे समाज की मुक्ति का माध्यम बना दिया और शिक्षा, संगठन, समाचार पत्र, उद्योग तथा प्रशासनिक अधिकारों के माध्यम से शिल्पकार समाज की नियति बदलने का ऐतिहासिक कार्य किया।
उनकी 139वीं जयंती के अवसर पर केवल उनकी स्मृतियों का सम्मान करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलते हुए वर्तमान समय की चुनौतियों का स्थायी समाधान करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आज जब पारंपरिक ताम्र-कला और शिल्पकारों की आजीविका संकट में है, तब राज्य सरकार, नागरिक समाज और शिल्पकार समुदाय को एकजुट होकर आधुनिक तकनीकों, नीतिगत प्रोत्साहनों और संस्थागत सहयोग के माध्यम से इस ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण करना होगा। मुंशी जी के विचार और उनका समरसता का संदेश आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शित करता रहेगा।
विभिन्न स्रोतों से जानकारी ली गईं हैं।







