सबसे पहले आधुनिक रंगमंच शैली मे रमे नाटक देखे। देहरादून मे भी और दिल्ली मे भी।
हबीब तनवीर का आगरा बाजार, और जयदेव हटंगड़ी का पोस्टर , श्यामा नन्द जालान का आधे अधूरे, अल्काज़ी का तुगलक, गिरीश करनाड का हयवदन , विजय तेन्दुलकर के लिखे नाटक सैया भये कोतवाल, घासी राम कोतवाल, आदि आदि।
फिर देहरादून मे बंशी कौन आये 78 मे। उन्होंने नाटक कार्य शाला की और धर्मवीर भारती का नाटक सूरज का सातवां घोड़ा किया। रेंजर्स कालेज मे।
तब वातायन कला मंच, ओ एन जी सी थियेटर ग्रुप युगांतर युगमंच अभि रंग अविकल , जागृति, आदि आदि संस्थायें एक्टिव हुईं। बेहतरीन नाटक हुए।
मै रिहर्सल से लेकर नाट्य प्रदर्शन से जुड़ा रहता। बहुत नाटकों की समीक्षा कीं। फिर स्मारिका संपादन भी करता रहा।
बहुत गहरी तरह से समझता रहा।
फिर एक अलग तरह से भी जुड़ा। नाट्य प्रदर्शन के साथ गैलरी मे कोलाज़ प्रदर्शनी लगाता। कभी नाट्य गोष्ठियों मे भाग लेता रहा। बस जुड़ा रहा।
एक दिन दादा अशोक चक्रवर्ती ने पूजा पंडाल मे एक नाटक निर्देशित किया और मुझसे गीत लिखने को कहा। मैने नाट्य गीत लिखे। बहुत सफल रहे।
फिर दिनेश खन्ना आये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली से। नाट्य कार्य शाला की। तीन नाटक किये। उसमे एक महत्वपूर्ण नाटक था ” कव्वे और काला पानी ” ( निर्मल वर्मा) । उसके समस्त रंग गीत लिखे। इसी तरह सुवर्ण रावत ने एन एस डी मे हो रहे अंतर्राष्ट्रीय रंग आयोजन जश्ने बचपन के लिये रस्किन बांड की कहानी नीली छतरी के लिए संपूर्ण रंग गीत लिखवाये । ए एस डी दिल्ली के अभिमंच पर यह बहुत पसंद किये गये। उन्ही ने मिशन सिलक्यारा के लिए मेरा गीत मेरी ही आवाज़ मे लिया । भारत रंग महोत्सव के लिए।
इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ समझने का मौका मिलता रहा।
टाम आल्टर, नसीरुद्दीन शाह राकेश बेदी हेमा सहाय आदि की एकल नाट्य प्रस्तुतियां देखीं।
रीच और विरासत के अतिरिक्त संगीत नाटक अकादमी के सौजन्य से ।
तो हुआ यह कि माहौल का गहरा प्रभाव पड़ा। तो मैने दून बाल रंगमंच की स्थापना कर दी। नाटक लिखे व बच्चों से करवाये।
आसपास के बच्चे होते और सुभाष रोड देहरादून यानी अपने घर के बरामदे मे रिहर्सल होती। नाटक,,, एक थी पूनम, खबरों का खजाना आदि के पांच सौ से ऊपर शो हुए। नुक्कड़ नाटक भी और प्रोसेनियम भी। लगभग पंद्रह साल तक किये नाटक।
इसके बाद नाट्य कार्य शाला शुरू कीं।
खाड़ी टिहरी,( अरंण्य रंजन) शहंशाही आश्रम देहरादून, आई टी एम कालेज, टिहरी गढ़वाल,महिला समाख्या कौसानी ( कुमाऊँ) खटीमा,खरसाड़ा आदि मे नाट्य इम्प्रोवाइजेशन किये।
इसके बाद उत्तरकाशी मे नदी बचाओ अभियान के लिए मामले मे नुक्कड़ नाटक तथा दो गीत तैयार किये जो पूरे उत्तराखण्ड मे खेले गये । सुरेश भाई प्रणेता और संयोजक प्रेम पंचोली थे।
रंगमंच वह विधा है जिसमे सभी विधाये शामिल हैं। कहानी अभिनय डिक्शन मंच सज्जा, रंगदीपन कला संगीत गीत, कल्पनाशक्ति मनोभाव आदि आदि।
यहाँ दीपक भट्टाचार्य, गजेंद्र वर्मा मंजुल मयंक मिश्रा दुर्गा कुकरेती, अवधेश,हिमानी शिवपुरी सुरेन्द्र भंडारी टी के अग्रवाल अतुल विश्नोई आलोक उल्फत अवि नन्दा रामेंद्र कोटनाला नवनीत गैरोला अभिषेक मैंदोला एस पी मंहगाईअतीक अहमद, राम प्रसाद अनुज मदन डुकलान निवेदिता बौठियाल कुलदीप मधवाल ए वी राणा कुसुम पंत सुशील यादव सतीश धौलाखंडी वीके डोभाल, सुषमा श्री प्रसाद गैरोला
सोनिया गैरोला, विमला ढौडियाल, रमेश डोबरियाल उदयशंकर भट्ट रोशन धस्माना, चंद्र दत्त सुयाल विशाल सावंत दिनेश उनियाल शैलजा, आदेश कुमार उर्मिला कंडवाल राजीव शुक्र्ला गायत्री आदि बहुत से नाम है जो सक्रिय थे और कुछ सक्रिय हैं।
नाम बहुत से है और भी है जो दूनरंगमच की पहचान हैं।
एक नाम बहुत महत्वपूर्ण है श्रीश डोभाल वे पूरे उत्तराखण्ड मे सक्रिय हैं।
इन सबके साथ बहुत से सुखद संस्मरण हैं।
इन्ही मे से गढवाली और हिन्दी फिल्मों मे भी सक्रिय हैं और धारावाहिक मे भी। गढ़वाल विश्व विद्यालय, दून वि विद्यालय मे नाटक पढाया जा रहा है।
इसी के साथ यह भी सच है कि यहाँ कोई रिहर्सल की जगह नही है।
एक सांस्कृतिक केंद्र की आवश्यकता है।







