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दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित “हिमालयी एक्शन स्कूल” कार्यक्रम के तीसरे दिन सामाजिक संस्था एक्शनएड और दून विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती आपदाओं, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन पर गंभीर चिंतन हुआ। नेपाल सहित विभिन्न हिमालय राज्यों से आए विशेषज्ञों, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिभागियों ने हिमालय के सामने खड़ी चुनौतियों पर अपने विचार रखे तथा समाधान के लिए स्थानीय समुदायों को केंद्र में रखने पर जोर दिया गया।
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र सदियों से प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में अपनाए गए विकास के मॉडल ने आपदाओं के जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है। अनियोजित निर्माण, अंधाधुंध सड़क विस्तार, खनन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने पहाड़ों की संवेदनशीलता को बढ़ाया है। परिणामस्वरूप भूस्खलन, बादल फटना, अतिवृष्टि और भू-धंसाव जैसी घटनाएं अधिक गंभीर रूप में सामने आ रही हैं।
वक्ताओं का मानना था कि आपदाओं को केवल प्राकृतिक घटनाओं के रूप में देखने की बजाय मानवजनित कारणों को भी समझना होगा। उन्होंने कहा कि विकास की योजनाएं स्थानीय भूगोल, पर्यावरण और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए। यदि प्रकृति की वहन क्षमता की अनदेखी की जाएगी तो हिमालयी क्षेत्र लगातार संकट की ओर बढ़ते रहेंगे।
कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि आपदा प्रबंधन का सबसे प्रभावी तरीका आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि उसके पहले तैयारी करना है। इसके लिए गांव स्तर पर नवयुवक मंगल दल, महिला मंगल दल, स्वयं सहायता समूहों और ग्राम पंचायतों को आपदा प्रबंधन की बुनियादी जानकारी और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। स्थानीय समुदायों को चेतावनी प्रणालियों, बचाव उपायों और संसाधनों के प्रबंधन में शामिल करके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्रतिभागियों ने कहा कि आपदाएं हालांकि किसी एक वर्ग, क्षेत्र या समुदाय को लक्ष्य बनाकर नहीं आतीं, मगर ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित दलित, महिलाएं, बच्चे और पिछड़े समुदाय के लोग सर्वाधिक प्रभावित होते है।
इसलिए आपदा प्रबंधन को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानने के बजाय सामूहिक सामाजिक दायित्व के रूप में स्वीकार करना होगा। जब तक समाज और शासन मिलकर तैयारी नहीं करेंगे, तब तक आपदाओं से होने वाली क्षति को कम करना कठिन होगा।
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने चिंता जताई कि हिमालय में जल, जंगल और जमीन का बड़े पैमाने पर दोहन हुआ है, जबकि संरक्षण के प्रयास अपेक्षाकृत कमजोर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिमालय केवल पहाड़ी राज्यों की धरोहर नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की जल, जैव विविधता और आजीविका का आधार है। ऐसे में इसके संरक्षण को विकास की मुख्यधारा में शामिल करना आवश्यक है।
कार्यक्रम में यह बात सामने आई कि हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा केवल बड़े सरकारी प्रोजेक्टों से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय ज्ञान, सामुदायिक भागीदारी, पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को विकास की आधारशिला बनाना होगा। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान विकास मॉडल की समीक्षा नहीं की गई और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो भविष्य में हिमालयी क्षेत्र और भी बड़ी आपदाओं का सामना कर सकते हैं।
वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के खतरे सामने से दिखाई दे रहे है, उससे निबटने के लिए स्थानीय स्तर पर ही प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के इंतजाम किए जा सकते है
इस अवसर पर पर्यावरणविद पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, नेपाल की पूर्व विदेश मंत्री विमला राय पौड़ियाल, एक्शनएड के कंट्री डायरेक्टर संदीप चाचरा, एक्शनएड के सह निदेशक खालिद चौधरी, पर्यावरणविद पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, सामाजिक कार्यकर्ता हीरा जंगपांगी, प्राकृतिक संसाधनों के अध्येता डॉ. जीत सिंह सनवाल, वरिष्ठ पत्रकार प्रेम बहुखंडी, श्रमयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत, कुलदीप वर्मा, मोहम्मद मीर हमजा, रेनू ठाकुर, हीरा जंगपांगी, तरुण जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता अरण्य रंजन, पर्यावरण कार्यकर्ता बच्ची सिंह बिष्ट, भारती आनंद, सोनी शबनम, डॉ. शिवानी पांडे, डॉ. सालमन खुर्शीद सहित विभिन्न हिमालयी राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न हो रहे खतरों और चुनौतियों पर प्रकाश डाला तथा समाधान की ओर रणनीतिक कवायद बताया।







