Thursday, May 14, 2026
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कुमार संभव व काली दास पर आधारित कुछ प्रसंगों की बेहतरीन सांस्कृतिक प्रस्तुति

 

महाकवि कालिदास पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया. केन्द्र के समागार में आयोजित इस कार्यक्रम में कालिदास की रचनाओं तथा उनके जीवन पर आधारित वार्ता तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का भव्य आयोजन किया गया.

 

उत्तराखण्ड राज्य स्थापना दिवस के रजत जयन्ती कार्यक्रमों की श्रंखला में आयोजित इसमें विभिन्न कक्ताओं ने कालिदास के कृतित्व व जीवन प्रसंगों पर अपने विचार प्रकट किये.

इस कार्यक्रम में विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों व विश्व विद्यालय के छात्रों द्वारा समूह रुप में संस्कृत के श्लोकों का मधुर गायन भी किया गया. वहीं डी.ए.वी. पी.जी. कालेज के छात्रों द्वारा महाकवि कालिदास के चित्रों पर केन्द्रित चित्रकला प्रदर्शनी भी लगाई गयी.

 

कार्यक्रम के दूसरे चरण में दून पुस्तकालय के एम्फीथियेटर (रंग मण्डप में महाकवि कालिदास रचित मेघदूत, हिमालय प्रशस्ति, कुमार संभव व काली पर आधारित कुछ प्रसंगों की बेहतरीन सांस्कृतिक प्रस्तुति प्रसिद्ध नृत्यांगना शर्मिला गांगुली भरतरी और उनकी टीम द्वारा किया गया. इस सांस्कृतिक प्रस्तुति की दर्शकों ने खुले मन से खूब सराहना की।

 

आज के कार्यक्रम के अध्यक्षता डॉ. सुधा रानी पांडेय, पूर्व कुलपति,उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय ने की जबकि मुख्य अतिथि के तौर पर श्री दीपक गैरोला, सचिव संस्कृत शिक्षा, उत्तराखण्ड शासन रहे. मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. रामविनय सिंह, प्रोफेसर, संस्कृत,डी.ए.वी.(पीजी ) कॉलेज थे.

कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुति शर्मिला भरतरी, गांगुली, प्रसिद्ध नृत्यांगना ने दी. इन्हें सहयोग दिया शैलेंद्र रावत, बापुन दत्ता व डॉ. नूतन स्मृति ने. इस कार्यक्रम की मुख्य सूत्रधार डॉ. इन्दु सिंह, पूर्व प्राचार्य एमकेपी (पीजी ) कॉलेज ने उपस्थित लोगों का अभिनंदन किया और कार्यक्रम की रुपरेखा प्रस्तुत की.

 

वक्ता के रूप में डॉ. राम विनय सिंह ने कहा कि कालिदास सही मायने में पूरे संसार में श्रंगार के महाकवि के रुप में देखे जाते रहे हैं। उनके जन्म समय व स्थान परिचय में सटीक जानकारी न मिलने तथा कई मतान्तर होते हुए भी वे अपनी अद्भुत रचनाओं से भारत के महान कवि तथा नव रत्न कवि के रुप में प्रख्यात रहे. लोक मान्यताओं में उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जनपद के कविल्ठा गांव को भी उनके जन्म भूमि व कर्म भूमि से जोड़कर देखा जाता है। किंवन्दती नुसार विभिन्न काल खण्डों में कालिदास व उनकी रचनाओं को राजिश का भी शिकार रहते हुए भी वे अप्रतिम कवि बने रहे। उन्होनें राजा भोज के मिथ्या मृत्यु से जुड़ी कविता पर कालिदास का चर्चित प्रसंग भी सुनाया. उन्होनें कालिदास के ऋतु संसार, मेघदूत, कुमार संभव, अभिज्ञान शाकुन्तलम् के कई पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला.

 

मुख्य अतिथि दीपक गैरोला ने कहा कि आज के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम संस्कृत कवि कालिदास के व्यापक कृतित्व को चरितार्थ करने की दिशा में सफल प्रयास रहा. उन्होने संस्कृत साहित्य के इतिहास पर भी प्रकाश डाला और इस दिशा में सरकार प्रयासों को भी रेखांकित किया।

 

कार्यक्रम की अध्यक्षा डॉ. सुधारानी पाण्डे ने कहा कि देहरादून जैसे आधुनिक शहर में में संस्कृत साहित्य की अच्छी परम्परा बन रही है। इस दिशा में दून पुस्तकालय का यह अभिनव प्रयास भी सफल रहा है।

 

कार्यक्रम के प्रारम्भ में दून पुस्तकालय के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, ने सभी लोगों का अभिनंदन किया. कार्यक्रम संचालन डॉ. भारती मिश्रा ने किया. दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के मानद निदेशक श्री एन. रवि शंकर ने अतिथियों और कलाकारों को प्रतीक चिन्ह भेंट किये.

 

कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त, उत्तराखण्ड, श्रीमती, राधा रतूड़ी, अनिल रतूड़ी, पूर्व मुख्य सचिव, नृप सिंह नपलच्याल, राजीव भरतरी, अजय जोशी, सोमवारी लाल उनियाल, डाॅ. सुशील उपाध्याय, सोहन सिंह रजवार, कल्याण बुटोला, शैलेन्द्र नौटियाल, कमला पंत, भारतीआंनद, दिनेश भट्ट, सुन्दर सिंह बिष्ट, नरेन्द्र सिंह, डॉली डबराल, नीता, कुकरेती,जय भगवान गोयल, जादीश सिंह महर, अनिल कुमार, साहित देहरादून शहर के कई संस्कृतिविद, लेखक, साहित्यकार व अन्य प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।

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