Tuesday, June 9, 2026
Home lifestyle यात्रा संस्मरण : जब एक 20 वर्षीय युवती सेल्फ स्टीक से अनजान...

यात्रा संस्मरण : जब एक 20 वर्षीय युवती सेल्फ स्टीक से अनजान थी, इस सवाल ने नए भारत के लिए नया सवाल खड़ा कर दिया।

By – Prem Pancholi

यह यात्रा मेरी अन्य यात्राओं से भिन्न हो सकती है। क्योंकि यह यात्रा पैदल, बस और रेल के माध्यम से संपन्न हुई है। इसमें खास बात यह कि मेरे साथ इस यात्रा में मेरा सहपाठी जवाहर सिंह चौहान था, जिन्होंने इतनी लंबी यात्रा पहली बार की है और इस तरह से की है।

जब हम देहरादून से दिल्ली के लिए 12 मई को रवाना हुए तो हमारे पास दिल्ली से मुंबई और मुंबई से दिल्ली का रेल टिकट था। हरिद्वार से मुंबई और मुंबई से हरिद्वार तक आने जाने वाली रेल में तीन माह के बाद का टिकट भी वेटिंग में था। सो मेरी बेटी ने हमारा टिकट दिल्ली से मुंबई और मुंबई से दिल्ली तक का करवाया दिया था, जिनमें मात्र 15, 16 तक की वेटिंग थी।

हमे 13 मई की अल सुबह दिल्ली से मुंबई के लिए रेल से रवाना होना था। हम 12 मई को इसलिए देहरादून से चले कि यदि 12 मई का रात्रि तक रेल का कन्फर्म टिकट मिल जाए तो हम इस वेटिंग वाले टिकट को कैंसिल करवा देंगे।

इस तरह से हम देहरादून से बस पर सवार हुए। हम बस से जाते वक्त खतौली के पास पहुंचे तो मेरी बेटी का फोन आया कि पापा आप लोगों का 13 मई वाला टिकट कन्फ़र्म हो गया है। मैने जवाहर सिंह को कहा कि भाई टिकट कन्फर्म हो गया है पर आज रात को दिल्ली में ही स्टे करना होगा। हम रेलवे स्टेशन के पास ही एक कमरा ले लेते है। मगर दोस्त जवाहर सिंह ने कहा कि यदि रेलवे स्टेशन के अंदर ही ऐसी कोई डोरमेट्री टाइप मिल जाए तो गनीमत है। मैने कहा कि अब रेलवे स्टेशन पर वातानुकूलित वेटिंग रूम बने है जिसमें सिर्फ AC टिकट वाले ही जा सकते है और 20 से 50 रुपए प्रति घंटा के हिसाब से किराया चुकता करना पड़ता है। जबकि एक वेटिंग रूम 100 रुपए प्रति ढाई घंटे वाला भी है। जवाहर सिंह ने कहा कि हम 50 रुपए वाले प्रति घंटे के वेटिंग रूम में रुकते है। सुबह 5 बजे हमारी ट्रेन है तो हम वहां से साढ़े चार बजे निकल जाएंगे।

इस तरह हम सायं के पांच बजे दिल्ली ISBT पहुंचे, दिल्ली में हमारे पास बहुत समय था। इसलिए हम दोनों लाल किले घूमने चले गए। सांय के 5 बजे के बाद लाल किले में संग्रहालय बंद हो जाता है। इसलिए लाल किले में अंदर जाने का शुल्क 50 रुपए हो जाता है यदि संग्रहालय देखना होता है तो 80 रुपए प्रवेश शुल्क देना होता है। लाल किला चूंकि ऐतिहासिक महत्व का है तो यह पुरातत्व विभाग भारत सरकार के अधीन है।

खैर, हम देर रात्रि यानी 10 बजे तक लाल किले में घूमते रहे। उसके बाद भोजन किया और इस तरह हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन रात्रि के 11 बजे पहुंच गए। हमने 50 रुपए प्रति घंटा प्रति व्यक्ति के हिसाब से कुल 500 रुपए वेटिंग रूम का चार्ज भुगतान किया। 13 मई की सुबह साढ़े चार बजे वेरिंग रूम से निकले और मुंबई जाने वाली रेल पर सवार हो गए। इस तरह हम 14 मई को सुबह 10 बजे मुंबई के बांद्रा ट्रेमिनल पहुंच गए। इधर हम 26 घंटे के रेल सफर में जिस व्यक्ति से भी मिले वह गैस, पेट्रोल आदि की समस्या का रोना ही रो रहा था।

साहब यह तो टिकट की कहानी रही। अब सफर कैसे कटा उससे भी अवगत करवाता हूं। हम जिस बस से देहरादून से दिल्ली जा रहे थे वे बस वाले रस्ते में खतौली के पास एक ढाबे में चाय नाश्ता के लिए रुकते हैं। मैने जवाहर सिंह को कहा कि क्या खाएंगे, जवाहर सिंह ने कहा कि दाल, भात, रोटी सब्जी। इसलिए मैने जवाहर सिंह के लिए एक डीलक्स थाली मंगवाई और अपने लिए एक डोसा मंगवाया। जिसका भुगतान मैने 600 रुपए किए। जवाहर सिंह ने पूछा कि इतना महंगा कैसे? रेस्त्रा वाले ने कहा कि भाई साहब आजकल गैस नहीं मिल रही है। 450 रुपए की डीलक्स थाली और 150 रुपए का डोसा है। इस तरह मात्र 600 रुपए ही होते है।

हम वापस बस में बैठे और महगाई आदि पर चर्चा होती गई। मैने अपने दोस्त जवाहर सिंह को कहा कि अब इन बसो के भीतर ही शौचालय बना हुआ है। शौच के लिए बस को कहीं रोकना नहीं पड़ता। सो मेरे दोस्त के लिए नई बात थी कि अब बस के अंदर ही शौचालय बना हुआ है? जैसे ट्रेन में होता है।

दिल्ली से जब मुंबई के लिए रवाना हुए तो एक दिन, एक रात तक का भोजन, चाय पानी ट्रेन के अंदर ही करना था। अन्य यात्रियों की भांति हमने भी ट्रेन के अंदर ही खाना मंगवाया जो 150 रूपये प्रति थाली थी। जवाहर सिंह ने इस दौरान चाय बिल्कुल नहीं पी। पानी भी बहुत कम पिया। मैने कहा पानी पीना चाहिए। जवाहर सिंह ने कहा कि वह आदतन पानी कम ही पिता है।

मुंबई में जब हम बांद्रा टर्मिनल में उतरे तो जवाहर सिंह ने स्टेशन पर ही एक सार्वजनिक पेयजल स्टैंड पर पानी पिया कहा कि यह तो नमकीन है। मैने कहा हम समुद्र के पास आ रखे है इसलिए यहां खारा पानी ही मिलेगा।

खैर, बांद्रा टर्मिनल से हम सीधे वाशी स्थित उत्तराखंड भवन आए। यहां पहुंचे और थोड़ा सुस्ताकर मैने काउंटर पर खड़ी महिला कर्मचारी को कहा कि एक कमरा खोल दीजिए। हम लोग “मुंबई कौथिग” के लिए आ रखे हैं। दिलचस्प यह है कि उत्तराखंड भवन के कुछ कर्मचारी बेहद मिलनसार है, कुछ बेहद अहंकारी है। मैने फिर कहा कि कहा मैं पत्रकार हूं, एक कमरा दे दीजिए। काउंटर पर बैठी लेडी कर्मचारी ने कहा कि पहले 5000 रुपए अग्रिम जमा कर दो। मैने कहा कर देंगे, हम मुंबई कौथिग के लिए आए हैं, अगले तीन दिन तक यहीं रुकेंगे आपको भुगतान कर देंगे। यह भी कहा कि कल हमारे पुरोला क्षेत्र के विधायक भी आ रहे हैं। मगर काउंटर पर बैठी लेडी कर्मचारी किसी भी प्रकार की बात सुनने को तैयार नहीं हुई। 5000 रुपए अग्रिम जमा करने पर तुली रही। ऐसे बातचीत करते करते एक घंटा बीत गया। इतने में विधायक पुरोला का व्यवस्थाधिकारी को फोन आया होगा कि पत्रकार के लिए एक कमरा खोल दीजिए। उस लेडी कर्मचारी ने तत्काल ही काउंटर छोड़ दिया और एक युवा कर्मचारी को यह चार्ज थमा दिया। उक्त युवा कर्मचारी ने हमे कमरा दे दिया। अब साहब कमरे में न पानी रखा, न तौलिया दिया और न साबुन दिया गया। मैने सोचा कि पिछले वर्ष तो ऐसा नहीं था अब न मालूम उत्तराखंड भवन के ऐसे ही नियम कानून बन गए होंगे?

जबकि इस भवन में सभी प्रकार की सुविधाएं सरकार द्वारा करवाई गई।कमरे में लगा टीवी रिचार्ज के बिना नहीं चल रहा था। वाई फाई है पर कमरों में नहीं दिया जा रहा है। शौचालय/वाशरूम में साबुन रखने तक की ट्रे नहीं है। कह सकते हैं कि उत्तराखंड भवन मुंबई में सुविधा है मगर अव्यवस्था चरम पर है। इसके अलावा संपूर्ण इमारत जर्जर होती दिखाई दी है। इस आलीशान इमारत में जगह जगह दरारें हैं। इस इमारत को बने हुए पांच साल भी पूरे नहीं हुए। हालांकि बताया गया कि इस इमारत के सुदृढ़ीकरण के लिए जल्दी टेण्डर होने वाले है।

किंतु उत्तराखंड भवन की कैंटीन संचालित करने वाले युवा बहुत ही सूझ बूझ वाले है, शिष्ट हैं। अच्छा खाना और समय पर मांग के अनुसार खाने की चीजें पहुंचा देना इनकी योग्यता को दर्शाता है।

मैने जवाहर सिंह को कहा कि कल हम मुंबई की लोकल ट्रेन में बैठेंगे। अगली सुबह हम तैयार होकर अपने क्षेत्र के कंडारी गांव निवासी मुंबई में सफल कारोबारियों में सुमार बड़े भाईजी गजेंद्र गौड़ से उनके कार्यालय मिलने गए। उन्होंने ने भी सबसे पहले भोजन करवाया। कहा कि वहां पर रात्रि विश्राम क्यों? यहां आ जाओ, इसी गेस्ट हाउस में रुको, जब तक मुंबई में हो।

उसके बाद हम गेटवे इंडिया गए, जहां से हम देर रात्रि उत्तराखंड भवन मुंबई वाशी पहुंचे। मुंबई की लोकल ट्रेन की खास बात यही है कि आप लोकल ट्रेन में 15 रुपए में मुंबई घूम सकते है। जबकि यदि हमे ठाणे से वाशी टैक्सी से आना था तो उसका किराया 800 रुपए और यदि बस द्वारा आना था तो उसका 50 रुपए भाड़ा था, सो हमने लोकल ट्रेन ही मुफीद समझी, जिसका भाड़ा प्रति व्यक्ति 15 रुपए अदा किए।

मुंबई शहर में हमे कोई भी रुका हुआ, आराम करते हुआ नजर नहीं आया, क्या महिला, क्या पुरुष, क्या बच्चे, सभी दौड़ते हुए एक ट्रेन से उतरते हुए दूसरी ट्रेन में सवार होते हुए नजर आए है।

इसके अलावा मुंबई में अपार्टमेंट संस्कृति के साक्षात् दर्शन हो गए। अब तो झुग्गी झोपड़ियां भी अपार्टमेंट में तब्दील होती नजर आयी है। 20 मंजिल से लेकर 50 मंजिल और उससे अधिक मंजिल अपार्टमेंट हमने देखे है। ऐसा नहीं कि मुंबई में झुग्गी झोपड़ी नहीं है। जब आप लोकल ट्रेन में सफर करेंगे तो कई जगह झुग्गी झोपड़ियां भारी मात्रा में दिखेगी। लोकल ट्रेन का मजा यहां नए लोगों इसलिए आता है कि कई बार यह ट्रेन समुद्र के ऊपर से गुजरती है। वैसे भी लोकल ट्रेन ही मुंबई में यातायात की ऐसी सेवा है जो समय पर आपको यथा स्थान पहुंचा देती है। हालांकि इस ट्रेन में सीट मिल भी जाती है अधिकांश इस लोकल ट्रेन में लोग खड़े और भारी भीड़ के बीच झूलते ही नजर आते है।

इस दौरान हमे भोजन बहुत महंगा लग रहा था। हमने पूछा भी कि भोजन इतना महंगा क्यों है। जबाव मिला कि “कुकिंग गैस” की भारी किल्लत है।यहां भी 450 रुपए की एक थाली, और एक पाव भाजी 120 रुपए की मिल रही थी। जबकि पिछले वर्ष पाव भाजी 65 रुपए की थी। मगर यहां के ऑटो रिक्शा वाले इतने ईमानदार हैं कि आपसे वाजिब भाड़ा ही लेंगे। वे अपने ऑटो रिक्शा पर मीटर के हिसाब से भाड़ा लेते है जो वाजिब होता है।

गेटवे इंडिया पर गए तो मेरे दोस्त जवाहर सिंह का मन प्रफुल्लित हो उठा। मैने कहा ये अरब सागर है जिसे हम किताब में पढ़ते है। जवाहर सिंह ने कहा कि सच में ये अरब सागर है? मैने कहा गूगल से पूछ लो, वह बता देगा। जब हम गेटवे इंडिया पहुंचे तो वहां पर इस वक्त “लाइट एंड साउंड शो” चल रहा था, जो नियमित चलता है, निःशुल्क होता है। यहां कुछ हजार कुर्सियां लगी है। मगर जो जहां खड़ा है वहीं से लोग इस शो को जरूर देखते है। क्योंकि कुर्सियां खाली मिलती ही नहीं। 57 की क्रांति से लेकर वर्तमान तक के भारत के सफर को यहां इस “लाइट एंड साउंड शो” में प्रस्तुत किया जाता है। सच में यह शो देखने लायक है। यह अनुभव भी मेरे दोस्त के लिए नया ही था।

गेटवे इंडिया पर एक नई बात मुझे सुनने को मिली। जब मैं अपने मोबाइल को सेल्फ स्टिक पर रखकर वीडियो सूट कर रहा था तो पास में एक युवती ने पूछ लिया कि अंकल ये क्या चीज है। क्या ये मोबाइल पर पहले से ही फिट रहता है। मैने उस युवती को पूछा कि तुम्हारी उम्र क्या है उसने कहा कि अभी वह 20 साल की है और ऐसा उसने पहली बार देखा। मैने उसे सभी कुछ समझाया कि कहाँ मिलता है किस काम आता है आदि आदि। उसने कहा कि अंकल आप भी चल रहे है, हम इस पानी के जहाज में बैठ रहे हैं। मैने कहा नहीं बेटा तुम अभी इसमें बैठकर क्या करोगी? अभी तो रात का समय है। एलिफेंटा बंद है समुद्र भी नहीं दिखाई देगा। वह लड़की नहीं मानी अपनी मम्मी के साथ दौड़कर क्रूज में बैठ गई। इस लड़की के सवाल से मेरे मन में एक और सवाल कौंधता गया कि आज भी भारत का गांव समाज विकास की मुख्य धारा से अच्छी तरह नहीं जुड़ पाया। इसलिए कि जब एक 20 वर्षीय युवती स्टिक के बारे में नहीं जान पाती तो हम नए भारत के बारे में क्या सोच सकते हैं। इस संस्मरण को पढ़ने वाले इस पंक्ति पर जरूर मुझे कुछ सुझाएं।

दोस्त जवाहर सिंह को सादा भोजन मात्र रोटी दाल भात ही चाहिए। मैने कहा पाव बड़ा, पाव भाजी, या अन्य फास्ट फूड खाते है। कहता है कि बिल्कुल नहीं। यही नहीं बड़े और अच्छे होटल का भोजन भी जवाहर सिंह को पसंद नहीं आता था।

खैर हमने तीन दिन तक वहां खूब भ्रमण किया। जुहू, गेटवे इंडिया, अंधेरी, इस्कॉन मंदिर आदि आदि घूमे। सांय को हम रोज नवी मुंबई स्थित सानपाड़ा सेक्टर 5 में मुंबई कौथिग देखने पहुंच जाते थे।

लाखों में एकत्र होते उत्तराखंडी प्रवासियों ने कौथिग में खूब रंग जमाया। साथ साथ पंडाल में पहुंच रहे अतिथियों का स्वागत तिलक लगाकर किया जा रहा था।

अब साहब हमे वापसी आना था तो 18 वाली टिकट कैंसिल हो गई। मेरी बेटी ने 19 की टिकट बनाई वह भी कैंसिल हो गई। फिर मेरी बेटी ने मुंबई से बड़ौदा तक की टिकट बनाई। जो गाड़ी सूबेदारगंज (यूपी) जाने वाली है। यह ट्रेन भी कोटा होते हुए आती है। मेरी बेटी ने कहा पापा अब कोई टिकट नहीं बन रही है रिग्रेड लिखा आ रहा है। आप उसी ट्रेन में आ जाना या बस में कोटा तक आ जाना। कोटा से दिल्ली तक टिकट मिल गई है जो टिकट कन्फर्म भी हो गई थी। बड़ौदा से कोटा लगभग 600 किमी है। बस का सफर कठिन लग रहा था। खैर हमारे साथ ट्रेन में जो लोग बैठे थे सभी सूबेदारगंज जाने वाले ठहरे। सभी मुख में “पान गुटखा” रख के साथ साथ बतिया भी रहे थे और थूका थाकी भी कर रहे थे।

उस ट्रेन में 90 फीसदी सवारी महिलाओं सहित गुटखा और पान मसाला चबाने वाले ही थे। पर अच्छे व्यवहारिक लोग भी थे। अब यह ट्रेन कोटा तक थी। किंतु हम बड़ौदा नहीं उतरे।

यानी यह बात 19 तारीख की है। ट्रेन तीन घंटे लेट चल रही थी, यह ट्रेन बड़ौदा सांय के 6 बजे पहुंचने वाली थी मगर बिलम्ब होने के कारण बड़ौदा स्टेशन पर रात्रि के नौ बजे पहुंची। मैने टीटी को कहा कि हमारा टिकट रतलाम तक बना दो और एक सीट दे दो। हम दोनों एडजस्ट कर लेंगे। फिर मैने कहा कि यह ट्रेन कोटा कब पहुंचेगी,? टीटी ने कहा कि सुबह चार बजे। मैने कहा कि अब हमारा टिकट कोटा तक का ही बना दो, मैने अपना परिचय भी दिया। मगर टीटी नहीं पिघला, बजाय टीटी महाशय ने बीच का रास्ता निकाला कि बड़ौदा से कोटा तक की दो जनों की सिल्फर क्लास वाली टिकट 1688 रूपये की है। तुम मुझे 1000 रुपये दो और S6 वाले डिब्बे में 46, 47 नंबर की सीट पर बैठ जाओ। उसने मुझे बाकायदा अपने टैबलेट पर चार्ट दिखाया कि इस सीट की टिकट कैंसिल हो चुकी है। यहां बैठ जाओ कोटा तक कोई भी आपको परेशान नहीं करेगा। उक्त टीटी का नम्बर मैं यहाँ पेस्ट कर रहा हूं (TT मुंबई सूबेदारगंज एक्सप्रेस फोन नम्बर 9752485886)। मैने अपना परिचय देने के साथ उसे 1000 रुपए दिये। टीटी महाशय ने फटक से 1000 रुपए अपने जेब में घुसेड़ दिए। मैने टीटी को कहा कि वे प्रमाण के तौर पर हमे कुछ तो दे दें। टिकट दो, या कुछ रसीद अथवा प्लेटफार्म टिकट, कुछ तो देना होगा। टीटी ने कहा कि कोटा में तुम जैसे ट्रेन से उतरोगे तुम्हे कोई परेशान नहीं करेगा। अपना नम्बर मुझे दे दिया कि जो भी तुम से पूछ ताछ करेगा उस कर्मचारी की बात उनसे करवा देना।

मै इसलिए भी कह रहा था कि रेलवे स्टेशन पर बिना टिकट कोई पकड़ा गया तो कानूनी जुर्म है। यदि हम पकड़े जाते तो बहुत अधिक जुर्माना भरना पड़ता और कानूनी कार्यवाही अलग से। फिर क्या था सीट मिल गई बड़ौदा से ही सो गए और अगली रात्रि की अल सुबह चार बजे हम उठ गए। ट्रेन भी कोटा में प्लेटफार्म पर पहुंच चुकी थी।

कोटा से हम दोनों जनशताब्दी से दिल्ली तक आए यानी यह ट्रेन चीयरकार थी। यह अनुभव भी मेरे दोस्त के लिए नया था।

जब हमारी टिकट 18 मई वाली कैंसिल हो गई, तब हमने सोचा कि आज हम अपने क्षेत्र के कंडारी गांव निवासी मुंबई में सफल उद्यमी गजेंद्र गौड़ जी के गेस्ट हाउस क्यों न जाएं। हम एक रात गौड़ साहब के गेस्ट हाउस रुके। उन्होंने हमारी जो मेहमाननवाजी की उसे हम ताउम्र नहीं भूल सकते।

इसके अलावा सदा की भांति मुंबई पहुंचते ही मैं बड़े भाई सुभाष गौड़ को फोन करता ही हूं। इस दौरान मैने उन्हें 14 मई की जगह 17 मई को फोन किया। उन्हें मालूम था कि प्रेम यहां पहुंच रखा है। वह भी मेरे फोन का इंतजार कर रहे थे। मैने जैसे 17 मई को उन्हें फोन किया कि भाईजी आज “मुंबई कौथिग” में मिलते है, उधर से उन्होंने कहा कि तू 14 मई से कहां है। आज तुझे याद आ रही है। कहा कि “कौथिग” में पहुंचते ही मुझे मिल। सुभाष गौड़ भी मुंबई में सफल कारोबारियों में प्रतिष्ठित नाम है। सो ऐसा ही हुआ। 17 मई को “मुंबई कौथिग” का अंतिम दिन था। पूर्व तय अनुसार मैं सबसे पहले बड़े भाई सुभाष गौड़ से मिला। अपने दोस्त जवाहर सिंह को भी परिचय करवाया। गौड़ भाईजी ने कहा कि तुम मुंबई कौथिग घूमो रात्रि का भोजन साथ करेंगे, वह पुरोला के विधायक से मिलते है। मुंबई कौथिग के अंतिम दिन के मुख्य अतिथि पुरोला के युवा विधायक दुर्गेश्वर लाल थे। कौथिग के समापन के बाद मैं भाईजी सुभाष गौड़ से पुनः मिला और उन्होंने ने भी हम सभी की जो मेहमाननवाजी की है उसे शब्दों में बयां करना मेरे लिए यहां मुश्किल है। साथ साथ एक आम का बॉक्स भी दिया कि इसे घर ले जाना।

मुंबई यात्रा इसलिए मेरे लिए यादगार रहती है कि बड़े भाईजी गजेंद्र गौड़, बड़े भाईजी सुभाष गौड़ का मै हमेशा ऋणी हूं। वे इतना प्यार देते है जिसे मैं कभी भी शब्दों में नहीं गूंथ सकता हूँ। यहां मुंबई स्थित हमारे तियां गांव के रोशन बहुगुणा, कंडारी गांव के सुनील गौड़ और अन्य दर्जनों साथी रहते है। यह सभी अपना अपना काम छोड़कर मुझे मिलते है, जब तक मैं मुंबई में रहता हूं तब तक साथ रहते है। धन्यवाद रवाई, जौनपुर, जौनसार, गोडर खाटल क्षेत्र के प्रवासी भाइयों आप सदैव मेरे जेहन में रहते है। मै आप सभी का ऋणी हूं।

RELATED ARTICLES

आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए सरकारी वर्जिश

वैज्ञानिक योजना, कुशल प्रशासन और समयबद्ध निर्णय प्रक्रिया के जरिए आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने का प्रयास किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि...

पर्यावरण दिवस : पद्मश्री प्रेमचंद शर्मा ने किया कृषि अनुसंधान संस्थान में वृक्षारोपण

विश्व पर्यावरण दिवस पर IATR देहरादून में पौधारोपण एवं गोष्ठी का आयोजन। पद्मश्री प्रेम चंद शर्मा ने छात्रों को मोरिंगा और पंच पल्लव के...

एक्शनएड की पहल : जलवायु परिवर्तन के खतरे और समाधान पर चिंतन

By - Prem Pancholi   सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने वाली सामाजिक संस्था एक्शनएड एवं दून विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में "हिमालयी भविष्य की...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए सरकारी वर्जिश

वैज्ञानिक योजना, कुशल प्रशासन और समयबद्ध निर्णय प्रक्रिया के जरिए आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने का प्रयास किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि...

पर्यावरण दिवस : पद्मश्री प्रेमचंद शर्मा ने किया कृषि अनुसंधान संस्थान में वृक्षारोपण

विश्व पर्यावरण दिवस पर IATR देहरादून में पौधारोपण एवं गोष्ठी का आयोजन। पद्मश्री प्रेम चंद शर्मा ने छात्रों को मोरिंगा और पंच पल्लव के...

एक्शनएड की पहल : जलवायु परिवर्तन के खतरे और समाधान पर चिंतन

By - Prem Pancholi   सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने वाली सामाजिक संस्था एक्शनएड एवं दून विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में "हिमालयी भविष्य की...

जलवायु परिवर्तन चर्चा : प्राकृतिक संसाधनों पर परंपरागत अधिकारों पर सरकारी कब्जा।

By - Prem Pancholi   दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित "हिमालयी एक्शन स्कूल" कार्यक्रम के दूसरे दिन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, सुशासन, रोजगार, पलायन और...

स्थानीय समुदाय के बिना आपदा राहत कार्य अधूरा।

By - Prem Pancholi ................................... दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित "हिमालयी एक्शन स्कूल" कार्यक्रम के तीसरे दिन सामाजिक संस्था एक्शनएड और दून विश्वविद्यालय के संयुक्त...

सतत विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु एक साथ आएंगे हिमालयीवासी

By - Prem Pancholi   सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने वाली सामाजिक संस्था एक्शनएड एवं दून विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में "हिमालयी भविष्य की...

कहानी : दादी की चिट्ठी

आजकल छुट्टियों में गाँव जा रहे हो? मेरी इस कहानी को पढ़कर जाना - डॉ० ममता कुंवर By - Dr. Mamata Kunwar आज दादी सुबह से...

विश्लेषण : आखिर ज़ेन-जी (Gen-Z) पैसा क्यों नहीं बचा रही?

फाइनेंशियल निहिलिज्म (Financial Nihilism): आखिर ज़ेन-जी (Gen-Z) पैसा क्यों नहीं बचा रही? Dr. Nitin Upadhyay ।। आजकल अक्सर सुनने को मिलता है—"आजकल के बच्चे सेविंग्स नहीं...

यात्रा संस्मरण : जब एक 20 वर्षीय युवती सेल्फ स्टीक से अनजान थी, इस सवाल ने नए भारत के लिए नया सवाल खड़ा कर...

By - Prem Pancholi यह यात्रा मेरी अन्य यात्राओं से भिन्न हो सकती है। क्योंकि यह यात्रा पैदल, बस और रेल के माध्यम से संपन्न...

कहानी : बधाई हो, जज हुआ है, एक नर्स का यह कहना?

By - Deepa Shah  कुछ साल पहले का वो कार्टून आज भी याद आता है। नर्स ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकलती है, चेहरे पर थकान...