सोशल मीडिया पर जिस तरह से प्रतापनगर के ओण पट्टी के देवल गांव निवासी अनुसूचित जाति के किशोर केतन लाल की वीडियो सामने आ रही है इससे तो ऐसा लगता है कि किशोर केतन लाल की हत्या इरादतन की गई है। इतना ही नहीं संपूर्ण प्रतापनगर (टी०ग०) में यह भी चर्चा है कि यह मामला उतना ही नहीं है बल्कि इससे और खतरनाक भी है कि केतन लाल अनुसूचित जाति का किशोर है और हत्या करने वाले परिवार खोलगढ़ के पंवार राजपूत है।
बताया जा रहा है कि केतन लाल का सिर्फ इतना ही कसूर है कि वह पंवार परिवार की बेटी (किशोरी) से टेलीफोनिक बात करता था। जो इन किशोर और किशोरी का प्रेम प्रसंग बताया जा रहा है।
माना कि केतन लाल पंवार परिवार की बेटी से बात करता था, तो वे पंवार परिवार की बेटी भी तो अनुसूचित जाति के केतन लाल से कितनी बार कॉल बैक अथवा सीधा फोन करके बात करती होगी। यह तो उन दोनों के फोन जांच करके सामने आ जाएगा। मगर केतन लाल को सिर्फ रिलीफोनिक फोन वार्ता पर मौत के उतरा गया है तो यह आज के सभ्य समाज के लिए शर्मशार करने वाली घटना है।
यदि हम सच में इक्कीसवीं सदी में जी रहें हैं तो ऐसी जातिवादी घटनाओं को क्यों अंजाम दिया जा रहा है? प्रतापनगर के ओण गांव की घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि देश और गांव से अभी जातिवाद का जहर समाप्त नहीं हुआ है।
बता दें कि केतन लाल की मौत का मामला बहुत खतरनाक है। पहले उसे अपनी बेटी से घर बुलाया गया, फिर उसे और उसके दोस्त को लाठी डंडो से इतनी बेरहमी से पीटा कि केतन लाल की मौत ही हो गई। यही नहीं उसके पांव में लोहे की लंबी लंबी किले तक ठोक दी है जैसा कि वीडियो में दिखाया जा रहा है।
हाल का यह मामला समाज द्रोही कहा जाएगा। संविधान और कानून के जानकारों का कहना है कि यदि केतन लाल को बेरहमी से पीटा गया, हथियार/लोहे के औजार से गंभीर चोटे पहुँचाई गई और तत्पश्चात उसकी मृत्यु हो गई तो यह बहुत गंभीर व संगीन मामला है। जिस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 (IPC की जगह) अनुसार हत्यारोपी पर धारा 103 तहत कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
यही नहीं यदि मृत्यु हुई है लेकिन परिस्थितियाँ हत्या की परिभाषा में अलग आती हैं, तो अन्य धाराएँ भी लग सकती हैं। कानून के जानकारों के अनुसार हथियार या खतरनाक साधन से गंभीर चोट पहुँचाने के लिए BNS धारा 118 जैसी धाराएँ भी परिस्थितियों के अनुसार जुड़ सकती हैं।
दरसल धारा कौन-सी लगेगी, यह पुलिस की जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, चोटों की प्रकृति, आरोपी की मंशा (इरादा), घटना की परिस्थितियों और अदालत के आकलन पर निर्भर करता है।
इधर संविधान मौलिक अधिकार और शासन की व्यवस्था को बताता है, की अपराध और सजा आपराधिक कानूनों में निर्धारित होते हैं और सत्तासिनो को इसमें बाधा डालने की अनुमति नहीं है।
अर्थात यह समझ में आता है कि केतन लाल की मौत की सजा के वनस्पत यदि हत्यारोपियों पर कठोर कार्रवाई होती है और इस कार्रवाई को कोई प्रभावित करता हो तो यह माना जाए कि हत्यारोपी की सत्ता से नजदीकी है।
खैर यह तो स्पष्ट हो गया है कि केतन लाल की मौत एक संगीन और जातिवाद से प्रेरित घटना है जिस पर पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई पर बात होगी।
फिलवक्त केतन लाल को प्रेम के बदले अपनी जान गंवानी पड़ी वह भी जातिवाद के कारण।
कुलमिलाकर यह शर्मशार करने वाली घटना है। उससे भी अधिक उन लोगों के लिए है जो कहते फिरते हैं कि जातिवाद खत्म हो गया है। यदि खत्म हुआ है तो ऐसे संगठनों, विशेषकर हिंदू संगठनों को तो इस खतरनाक जातिवाद घटना पर आगे आना ही चाहिए।







