पीछे खड़ा एक नन्हा बुरांश डरते-डरते बोला, “दादा… और परसों?”
बूढ़े देवदार ने गहरी साँस ली। कुछ देर तक चुप रहा। उसकी चुप्पी में शायद दो-तीन सौ साल की हवा, बारिश और बर्फ़ एक साथ उतर आई थी। फिर उसने धीमे से कहा, “परसों से फिर विकास शुरू हो जाएगा।” … नन्हे बुरांश पर उदासी सी छा गई… पीछे मुड़कर उसने अपने पिता की ओर देखा… और सोचा क्या पता कब तक का साथ है ।
जंगल में सन्नाटा छा गया। पेड़ों ने अनुभव से सीखा है कि विकास कभी खाली मैदान से शुरू नहीं होता। उसे हमेशा वहीं जाना होता है, जहाँ सदियों से जंगल खड़ा हो। सड़क बनानी है तो पेड़ हटाओ। एयरपोर्ट चाहिये तो जंगल काट दो। डैम बनाना है पहाड़ काट दो… । मतलब जहाँ बड़ा बड़ा “विकास” लिखना हो, वहाँ सबसे पहले हरियाली मिटा दो। क्योंकि विकास का पहला नियम है… जहाँ पेड़ दिखे, वहीं से विकास शुरू करो। बाद में उसी जगह डेढ़ फुट का पौधा लगाकर घोषणा कर दो… “प्रकृति संरक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”
इतने में सूखे पत्तों पर खड़-खड़ की आवाज़ आई। सबकी निगाह उधर घूम गई। एक चमचमाती कुल्हाड़ी पेड़ों की सभा में चली आ रही थी। उसके चेहरे पर वैसी ही आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी, जैसी किसी ठेकेदार के हाथ में नई परियोजना की स्वीकृति आते ही आ जाती है।
छोटा बुरांश डरकर बाँज के पीछे छिप गया।
कुल्हाड़ी हँसते हुए बोली, “अरे… घबराओ मत। आज मैं मेहमान बनकर आई हूँ। कल हरेला है। कल मैं किसी को नहीं काटती। कल तो मैं भी माथे पर लाल साफ़ा बांधकर पर्यावरण प्रेमी बन जाती हूँ। कल मेरा उपयोग करना अशुभ माना जाता है। नेताओं के साथ फोटो खिंचवाती हूँ, पौधों के पास खड़ी रहती हूँ और शाम को सोशल मीडिया पर लिखती हूँ… ‘प्रकृति हमारी माँ है।'”
पंचायत में बैठे एक बूढ़े बाँज ने पूछा, “और परसों?”
कुल्हाड़ी ने अपने फाल पर उँगली फेरते हुए कहा, “परसों से ओवरटाइम है…। आख़िर मेरे घर का चूल्हा भी तो विकास से ही जलता है।”
बूढ़े बाँज ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “तू दोषी नहीं है बेटी। तू तो सिर्फ़ एक औज़ार है। असली धार तेरे लोहे में नहीं, उन दिमाग़ों में है जिन्होंने यह तय कर लिया है कि जंगल हमेशा नक्शे की सीधी लकीरों के रास्ते में ही क्यों आते हैं।”
कुल्हाड़ी कुछ पल के लिए चुप हो गई। शायद पहली बार किसी ने उसे अपराधी नहीं, औज़ार कहा था।
धीरे से बोली, “बाबा… सच कहूँ? मुझे भी अच्छा नहीं लगता। मेरा जन्म लकड़हारे के हाथ में इसलिए हुआ था कि सूखी डालियाँ हटाऊँ, लोगों के चूल्हे जलाऊँ, घर बनाऊँ। लेकिन अब मुझे सदियों पुराने जंगलों पर चलाया जाता है। पहले मैं ज़रूरत थी, अब मैं परियोजना का हिस्सा बन गई हूँ।”
सभा में फिर सन्नाटा छा गया।
तभी सबसे पीछे खड़ा एक नन्हा-सा बांज का पौधा बोला, “दादा… अगर हम सब कट गए तो इंसान कहाँ रहेगा?”
बूढ़े देवदार ने आसमान की ओर देखा। उसकी सूखी शाखाओं पर बैठे पक्षी चुपचाप उनकी बातें सुन रहे थे। उसने भारी आवाज़ में कहा, “बेटा… इंसान को यह भ्रम हो गया है कि वह जंगल के बिना भी जी सकता है। उसे अभी तक यह समझ नहीं आया कि पेड़ धरती पर नहीं रहते… धरती पेड़ों पर रहती है। जिस दिन आख़िरी जंगल कटेगा, उस दिन केवल पेड़ ही नहीं मरेंगे… इंसान अपने भविष्य का अंतिम संस्कार करेगा।”
तभी काफ़ल के पेड़ ने लहराते हुये बोला… “लेकिन सरकारी रिपोर्ट तो कहती है… ’जितने पेड़ कटेंगे, उससे कई गुना अधिक पौधे लगाए जाएँगे।’… उसका क्या ?”
यह तर्क सुनकर बूढ़ा बाँज हँस पड़ा। बोला, “वाह! अब तो ऐसा भी दिन आ गया कि दादा को मारकर पोते के जन्म का प्रमाणपत्र दिखाया जा रहा है।”
सभा समाप्त हो गई।
अगले दिन हरेला था।
और जंगल में सचमुच किसी कुल्हाड़ी की आवाज़ नहीं आई।
क्योंकि उस दिन पूरे प्रदेश में पौधे लगाए जा रहे थे।
अब तो पेड़ों ने भी मनुष्य को भली-भांति समझ लिया है। उन्हें मालूम है कि अफ़सर आदमी दो तरह के पेड़ पसंद करता है। एक वह, जिसके साथ फोटो खिंचवा सके। दूसरा वह, जिसे काटकर किसी बड़ी परियोजना का शिलान्यास किया जा सके। बीच वाला पेड़… जो चुपचाप बारिश बुलाता है, मिट्टी बचाता है, नदियों को जिंदा रखता है… वह किसी के काम का नहीं। उसके लिये न भाषण होता है, न बजट… कुछ भी नहीं।
मुझे तो कई बार लगता है कि हमारे यहाँ पेड़ ऑक्सीजन कम और अवसर ज़्यादा देते हैं। कोई समाजसेवी उनमें पर्यावरण देखता है, कोई नेता उनमें कमीशन देखता है, कोई ठेकेदार उनमें लकड़ी देखता है, कोई अधिकारी उनमें मुआवज़े की फाइल देखता है, कोई बिल्डर उनमें प्लॉट देखता है। बेचारा पेड़ सिर्फ पेड़ बना रहना चाहता है, लेकिन इंसान उसे हर चीज़ बना देता है… बस पेड़ नहीं रहने देता।
अब हुक्मरानों से भी क्या शिकायत की जाए। उनके पर्यावरण प्रेम की भी अपनी यात्रा है। वह हवाई जहाज़ में बैठकर विदेश जाता है, कैमरों के सामने एक पौधे के साथ मुस्कुराता है, गोरी चिट्टी एक मेम के साथ एक पौधा रोपकर “एक पेड़ माँ के नाम” का संदेश देता है और दुनिया भर की सुर्खियाँ बटोरकर वापस लौट आता है। इधर लौटते ही उसी सरज़मीं माँ के आँचल की हरियाली को नापने के लिए सर्वे शुरू हो जाता है कि किस जंगल के बीच से सड़क निकलेगी, कहाँ एयरपोर्ट बनेगा, कहां डैम बनेगा और कहाँ नई परियोजना। लगता है पौधा लगाने और जंगल बचाने के बीच का रिश्ता अब वैसा ही रह गया है जैसा चुनावी घोषणा और उसके अमल के बीच होता है। यह देखकर जंगल के पेड़ मुस्कुरा देते होंगे। उन्हें लगता होगा कि मनुष्य बड़ा करामाती जीव है। पहले माँ का आँचल काटता है, फिर उसी के नाम पर रूमाल भेंट कर देता है। पूरे पहाड़ की हरियाली उजाड़कर एक पौधा लगाता है और समझता है कि प्रकृति के साथ हिसाब बराबर हो गया।
हरेला अब त्योहार कम, सालाना प्रायश्चित ज़्यादा लगता है। पूरे साल जंगलों को फाइलों में नापा जाता है, नक्शों में काटा जाता है, जलाया जाता है, मशीनों से गिराया जाता है और फिर एक दिन मिट्टी में पौधा दबाकर घोषणा कर दी जाती है कि हमने प्रकृति का ऋण चुका दिया। पहाड़ यह सब चुपचाप देख रहा है। नदियाँ भी देख रही हैं। जंगल भी देख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे वोट नहीं देते। अगर पेड़ों के भी वोट होते, तो शायद चुनाव से पहले कोई घोषणा करता… “इस बार कोई पेड़ नहीं कटेगा।” लेकिन पेड़ वोट नहीं देते, सिर्फ जीवन देते हैं। इसलिए उनकी सुनवाई हर साल सिर्फ एक दिन होती है।
हरेला के दिन दस पौधे लगाने की फोटो डालने वालों से विनम्र आग्रह है कि साल के बाकी दिनों में कम से कम एक पेड़ बचाने की कोशिश भी कर लीजिए। आखिर पहाड़ की लाईफ़-लाइन सिर्फ बड़ी बड़ी इमारतें और चौड़ी सड़कें नहीं हैं। पहाड़ की साँस उसके जंगल हैं। अगर हरियाली ही खत्म हो गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हरेला नहीं, सिर्फ “कटेला महोत्सव” मनाएँगी और हमको कोसेंगी।
तक के लिये… आप सबको कटेला वाला हरेला मुबारक…!
आज सिर्फ हरेला बाकी दिन कटेला…







