वृक्षारोपण को सांस्कृतिक अभियान बनाया – कल्याण सिंह रावत “मैती”
By – Prem Pancholi

दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के तत्वाधान में आयोजित “मैती” व्याख्यान पर पद्मश्री पर्यावरणविद कल्याण सिंह रावत “मैती” ने अपने 35 साल के अनुभव साझा किए है। उन्होंने मैती आंदोलन और अन्य पर्यावरण संरक्षण अभियान के खट्टे मीठे अनुभव साझा किए।
बता दें कि 1995 से आरम्भ हुआ मैती आंदोलन ने अब तक पांच लाख पौधे लगाए है जो आज विभिन्न स्थानों पर जिंदा है, कोई फल दे रहा है तो कोई छाँव दे रहा है अर्थात वन संरक्षण की मिसाल स्पष्ट दिखाई दे रही है। इन रोपित पौधों की खासियत यह है कि यह पौधे क्रमशः लोगों ने बेटा और बेटी की शादी के दौरान लगाए है, इसलिए उन पौधों की सुरक्षा भी भावनात्मक रूप से हो रही है।
श्री रावत ने अपने अनुभव को सुनाने से पूर्व यह भी कहा कि मैती आंदोलन के मार्फत जो पौधे रोप गए हैं उनकी वे स्वयं हर माह खबर भी लेते है। हालांकि जिस दुल्हन ने अपनी शादी के दिन अपने मायके (मैत) से विदा होने से पहले जो पौधा रोपा होगा उससे उस युवती की ताउम्र भावनाएं, यादें जुड़ी रहती है। इसलिए इस तरह के पौधा रोपण कार्य “मैती आंदोलन” के सफल हुए है।
पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने शिक्षण कार्य किया है। उत्तरकाशी, चमोली और देहरादून में उन्होंने अलग अलग इंटर कॉलेज में सेवाएं दी है। इस अंतराल में उन्होंने पर्यावरण को लेकर बच्चों के साथ किस तरह का कार्य किया वह अनुभव भी उन्होंने साझा किए है।
उन्होंने अपनी बात आरम्भ करते हुए बताया कि उनका जन्म चमोली के बैनोली गांव में हुआ है। उन्होंने यह भी याद किया कि उनके गांव बैनोली के मिस्त्रियों ने चांदपुर गढ़ी, बद्रीनाथ मंदिर जैसे राष्ट्रीय स्तर के स्मारक बनाए है। उन्हें इस बात का मलाल है कि अब वे मिस्त्री नहीं है।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उनके पिताजी वन विभाग में सेवारत रहे है। वहीं से उन्हें वन संरक्षण के संस्कार मिले हैं। कहा कि उनके पिताजी सरकारी सेवा से लेकर ब्लॉक प्रमुख तक रहे, मगर वे जैसे थे वैसे ही थे। जबकि उनकी माताजी सांस्कृतिक पक्ष से थी। मांगल गीत की उनकी गांव में अलग ही पहचान थी, गांव में किसी भी कार्यक्रम में माता जी की उपस्थिति होती ही थी।
श्री रावत ने बताया कि जब वे आगे की पढ़ाई के लिए गोपेश्वर गए तो उनका परिचय विश्वविख्यात पर्यावरणविद चंडीप्रसाद भट्ट से हुआ। उन दिनों चिपको आंदोलन का दौर था। बस यहीं से उनका जुड़ाव सर्वोदय मंडल गोपेश्वर से हो गया। कारण इसके उन्हें चिपको नेत्री गौरा देवी को कई बार सामने से देखने का मौका मिला। कई बार वे भट्ट जी के साथ रेणी गांव जाते थे जहां गौरादेवी महिलाओं का नेतृत्व कर रही होती थी। अर्थात चिपको आंदोलन से भी उन्होंने बहुत कुछ सीखा है। यानि यहीं से पर्यावरण की चेतना मन में जाग उठी। कहने का तात्पर्य यही है कि उस समय से ही उन सभी युवाओं में रचनात्मक कार्य करने की जिज्ञासा बढ़ती गई।
इस तरह अपने अनुभव की लंबी श्रृंखला बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने वन और वन्य जीव सरंक्षण के लिए 56 प्रयोग किए है। जिनमें से वे यहां चुनिंदा प्रयोगों पर अपने अनुभव साझा करेंगे।
जब गोपेश्वर से आगे मंडल में कस्तूरी प्रजनन केंद्र बन रहा था तो वहां दुनियाभर के वैज्ञानिक आते थे। उन्हें लगता था कि वे तो पहाड़ी है, वन्य सरंक्षण का प्रयोग वे बिना विज्ञान भी कर सकते है। इसलिए कल्याण सिंह रावत ने 1976 में “हिमालय वन्य जीव संस्थान” का गठन कर दिया। इसके लिए उन्होंने समय समय पर वन विभाग और चंडीप्रसाद जी का मार्गदर्शन लिया। वे आगे बताते हैं कि उन दिनों रुद्रनाथ में जड़ी बूटियों का पालतू जानवर भारी नुकसान पहुंचा रहे थे। संस्थान के बैनर पर वहां जाकर उन्होंने अनशन आरम्भ कर दिया। इस पर तत्कालीन सरकार ने निर्णय दिया कि बाहर के लोग यहां जानवर न लाये। तब से लेकर रुद्रनाथ वाले क्षेत्र में पालतू पशुओं के लिए प्रतिबंध है। इसी तरह के अन्य कार्य भी करते गए।
अब उनका स्थानांतरण उत्तरकाशी के राजगढ़ी में हो गया।राजगढ़ी में उन्होंने देखा कि सर्दियों में सुबह सुबह जंगली जानवरों का मांस बिक रहा है। यह दृश्य उनके लिए चौंकाने वाला था। मालूम हुआ कि ऊपरी वाले क्षेत्र व्यांली आदि के जंगल में बहुत अधिक बर्फ गिर गई है। सो जंगली जानवरो का शिकार भारी मात्रा में हो रहा है। यहां भी कल्याण सिंह रावत ने स्कूली बच्चों और उनके माता पिता के साथ मिलकर वन्य जीव बचाने का अभियान चलाया और व्यांली के जंगल में जंगली जानवरों की तस्करी को रोका गया। इसके अलावा उन्होंने वहां के ग्रामीणों को मांसाहारी शाकाहारी जानवरों की जानकारी दी, की पर्यावरण संरक्षण हेतु ऐसे जानवरों की नितांत आवश्यकता होती है।
यह अभियान सफल हुआ तो राजगढ़ी में तहसील का कार्यालय बड़कोट आ गया, पर तहसील की जमीन राजगढ़ी इंटर कॉलेज के नाम हो गई। मगर स्थानीय लोगों ने मौके का फायदा उठाना चाहा और राजगढ़ी की स्कूली जमीन पर कब्जा होने लगा। बहरहाल कॉलेज के प्रधानाचार्य से बातचीत करके और कुछ स्थानीय लोगों से सलाह मशविरा करके इस जमींन पर एक नर्सरी बनवानी आरम्भ कर दी। जहां तत्काल 40 हजार पौध तैयार की गई। इसका फायदा यह हुआ कि एक तरफ स्कूल की जमीन कब्जे से बच गई और दूसरी तरफ वृक्षारोपण के लिए पौध भी तैयार हो गई। अब यह पौधे सभी बच्चों को बांट दिए गए। बच्चों ने अपने अपने गांव में पौधे लगाए जो आज भी दिखाई देते है।
उन्होंने बताया कि सम्पूर्ण रवांई घाटी में 30 मई को तिलाड़ी शहीद दिवस मनाया जाता है। उस दिन टिहरी और उत्तरकाशी में अवकाश रहता है। उन्होंने सोचा कि तिलाड़ी दिवस राजगढ़ी में भी मनाया जा सकता है। क्योंकि तिलाड़ी से जुड़ी यादें राजगढ़ी की भी है। श्री रावत ने डख्याट गांव के बचन सिंह जयाड़, जयबीर सिंह जयाड़ सहित दराली गांव और आस पास के संभ्रांत ग्रामीणों से बातचीत की, कि 30 मई को शहीदों के नाम पर राजगढ़ी में वे वृक्षारोपण करना चाहते है। इस बात पर ग्रामीण तैयार हो गए। तब जाकर साल 1987 में राजगढ़ी में तिलाड़ी के शहीदों के नाम पर “वृक्षारोपण अभिषेक कार्यक्रम” आरंभ हुआ। किंतु उन दिनों क्षेत्र में हालात इतनी खराब थी कि उस वक्त क्षेत्र में सूखा पड़ा हुआ था। फिर भी यह कार्यक्रम संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम कैसे संपन्न हुआ उसकी एक बानगीभर है।
वे आगे बताते हैं कि सोचा गया कि प्रत्येक गांव से सात सात लड़कियां एक जल कलश लेकर आए और गांव के लोग पेड़ लेकर आए। ग्रामीणों के लिए पौध की पूर्ति तत्काल वन प्रभाग अधिकारी बड़कोट द्वारा की गई, ऐसा ही हुआ। इस कार्यक्रम के लिए चार हजार से भी अधिक लोग राजगढ़ी में एकत्र हुए। पौधे की पूजा हुई, गांव गांवों से आई सात सात लड़कियों ने जल कलश लाए हुए थे, पौधे रोप गए, पौधों की पूजा हुई जल कलश का पानी पौधों पर डाला गया और इस तरह वृक्ष अभिषेक कार्यक्रम संपन्न हुआ। जबकि रात्रि में सरनौल गांव के लोग वापस नहीं जा पाए। तो उसी रात को राजगढ़ी कोठी में ग्रामीणों को सिनेमा दिखाया गया। ताज्जुब हो कि जिस क्षेत्र में बरसात नहीं हो रही थी सूखा पड़ा हुआ था, ग्रामीण परेशान थे वहां उसी दिन से लगातार सात दिन तक बारिश होती गई। लोगो ने कहा कि गुरु जी आपने जो सात लड़कियों से सात सात जल कलश मंगवाये और जिस प्रकार से पौधा रोपण हुआ उसके हिसाब से ही यहां बारिश हो गई, ऐसा लोगों का विश्वास जग गया। आस पास के लोग कुछ दिन बाद फिर आए कि पेड़ दे दो। इसलिए कि इस कार्यक्रम से क्षेत्र में पेड़ लगाने की लालसा बढ़ी। मैने भी इसी कार्यक्रम से समझा की प्रकृति ही देवी देवता होते है।
इसके बाद डख्याट गांव के जंगल को बचाने का प्रयास किया गया। आज भी इस गांव का जंगल देखने लायक है।
उन्होंने अपने संस्मरण को सुनाते हुए कहा कि मोरी में स्थित एशिया का सबसे ऊंचा पेड़ इसलिए जल्दी टूट गया कि लोग उस पेड़ को देखने जाते थे और पेड़ को खुरच कर अपना नाम लिख देते थे। पेड़ पर घाव हो गया और पेड़ का तना कमजोर होता गया, एक दिन पेड़ गिर गया। यानि मानवीय हस्तक्षेप के कारण।
इसी तरह के अनुभव को श्री रावत साझा करते हुए बताते हैं कि FRI का जब शताब्दी वर्ष था, उन्होंने तत्काल FRI के निदेशक नेगी जी से कहा कि वे भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लेना चाहते है। श्री रावत ने शिक्षा निदेशक से निवेदन किया कि प्रत्येक स्कूल से एक कपड़ा यहां भेजे, जिस पर पेड़ बचाने का स्लोगन लिखा हो। इस तरह राज्य के प्रत्येक स्कूल से हरा रंग का कपड़ा पेड़ बचाने के स्लोगन के साथ बालिका इंटर कॉलेज राजपुर रोड में एकत्र हुआ। उस कपड़े पर 12 लाख बच्चों के हस्ताक्षर थे। सभी कपड़ों के टुकड़ों को सिला गया। यह हरा रंग का कपड़ा इतना बड़ा हो गया था कि FRI पहुंचाने के लिए ट्रक बुक करना पड़ा। वे बताते हैं कि शताब्दी वर्ष में बनाए गए हरे रंग के कपडे से FRI की बिल्डिंग को गिफ्ट पैक के रूप में ढका गया। आज भी वह कपड़ा FRI के म्यूजियम में सुरक्षित है।
टिहरी बांध से जुड़े अनुभव भी उन्होंने साझा किए। जब टिहरी शहर डूब रहा था, अलग अलग तरह से लोग सोच रहे थे कि टिहरी तो पानी में समा जाएगी, पर टिहरी की यादें कैसे सुरक्षित रहेगी। उन्होंने टिहरी शहर के ऐतिहासिक जगहों को ढूंढा। इस तरह उन्होंने टिहरी के 35 स्थानों की जगह जगह की मिट्टी थैलों में भरी। यह मिट्टी 35 थैलों में भरकर जहां की मिट्टी वहीं का नाम थैले पर चस्पा किया और बादशाही थौल पहुंचा दी। “लोक माटी वृक्ष अभिषेक समारोह” का आयोजन बादशाहीथौल में किया गया। 35 थैलों की मिट्टी 35 जगह गड्ढे करवा कर रखी गई। इसी मिट्टी में 35 पेड़ लगाए गए। जिस जगह की मिट्टी थी उसी जगह के नाम की पट्टी बनाकर रोपे गए पौधे पर चस्पा की गई। ऐसे में टिहरी की यादें संजोई गई है। आज भी बादशाहीथौल में ये पेड़ अपना आकर लिए हैं और पानी में समा गई टिहरी की यादें ताजा करते है।
पद्मश्री कल्याण सिंह रावत अपने अनुभव को साझा करते हुए “मैती आंदोलन” की भावनात्मक स्थिति बताते है। उन्होंने कहा कि मैती आंदोलन 1995 में ग्वालदम से शुरू हुआ है। सबसे पहले उन्होंने वहां 2000 पौधों की नर्सरी तैयार की है। यहां “शौर्य वन” बनाया गया।
इन दिनों नंदा देवी राजजात जा रही थी। महिलाएं नन्दा की डोली पर लिपटी थी विदाई जैसे गमगीन माहौल था। महिलाओं का यह भावनात्मक रूप उनको कुछ करने के लिए प्रेरित कर रहा था। अतः सोचा गया कि शादी के दिन माइक में दुल्हन और दूल्हा एक पेड़ लगाकर विदा हों तो यह बड़ा यादगार और पेड़ बचाने का कारगर तरीका हो सकता है। इस तरह यह अभियान जीवंत अभियान बन सकता है। यानि पेड़ की सुरक्षा उसी भाव से होती है। जब ब्याही गई लड़की ससुराल में होती है तो वह अपनी माता से अवश्य पूछती है कि शादी के दिन रोपा गया पेड़ कैसे है। माता भी जबाव देती है कि बेटी यह तेरी निशानी है इसे मुझे सुरक्षित रखना है।
इस तरह मैती आंदोलन इंडोनेशिया सहित आदि कई देशों तक पहुंच गया। अपने देश के लगभग 17 राज्यों में मैती आंदोलन हर शादी में स्वस्फूर्त होता है, वहां के लोगों ने यह परंपरा अनिवार्य कर रखी है। उन्होंने कहा कि देशभर के महत्वपूर्ण लोगों ने भी इस अभियान को हाथों हाथ लिया है। ये महत्वपूर्ण नामचीन लोग मानते हैं कि शहर में यदि जगह नहीं भी होगी तो वे अपने गमले में बेटी की शादी के दिन पेड़ अवश्य लगा लेंगे।
कल्याण सिंह रावत से सेलाकुई के एक शिक्षक मित्र ने कहा कि वे अपनी बेटी की शादी में पेड़ लगाएंगे। वह शिक्षक मूल रूप से मृगपुर गांव (सहारनपुर) का है। जबकि उस गांव में रह रहे एक बाबा ने गांव में धूम्र पान प्रतिबंध कर रखा है। उन्हें भी इस शादी में जाना जरूरी था। क्योंकि शिक्षक मित्र का बुलावा जो था। मैती आंदोलन की परंपरा अनुसार पेड़ लगाया गया। अगले दिन अखबारों ने इस अभियान को बड़ी हेडिंग के साथ प्रकाशित किया। गांव में इस तरह से भी लोगों में मैती आंदोलन के प्रति भाव जाग उठे।
वे आगे बताते हैं कि दो साल बाद वही शिक्षक मित्र उनसे एक किस्सा सुनाते है। कि उनकी बेटी जब अपने बच्चे को लेकर मायके आई तो तब तक उसका रोपा हुआ पौधा बड़ा हो गया था। वे दोनों उस पेड़ की अच्छी निगरानी करते भी है। एक दिन उनकी बेटी का बच्चा बहुत रोने लगा और चुप रहने का नाम नहीं ले रहा था। वे अपनी बेटी को कह रहे थे कि दूध पिलाओ ताकि बच्चा चुप हो जाए, पर ऐसा करने से भी बच्चा चुप नहीं हुआ। उन्होंने बाहर देखा तो जिस कपड़े से वे पेड़ को ढक देते थे वह कपड़ा पेड़ से गिर चुका था। उनकी पत्नी गई, कपड़ा उठाया और पूर्व की भांति पेड़ ढक दिया। बस उनकी बेटी का बच्चा चुप हो गया। दुबारा भी ऐसा ही हुआ।
अब जाकर उनकी समझ में आया कि उस बच्चे की सम्पूर्ण भावना उस पेड़ से जुड़ी हुई थी। कई बार उनकी बेटी ससुराल में कुछ दिक्कत में होती थी तो वे उस पेड़ के नीचे दीपक जला देते थे और उनकी बेटी की दिक्कत समाप्त हो जाती थी। कहा कि यह मैती आंदोलन की अलग अलग कहानियां है जो सफलताएं बताती है।
एक सवाल के जबाव में उन्होंने कहा कि देहरादून में जो बचे खुचे जंगल हैं उन पर होफले लगे है। पेड़ तेजी से सूख रहे है। पूरे पहाड़ में चौड़ी पति के जंगल बहुत कम हो गए है। यह स्थिति भविष्य में बड़ा संकट पैदा करने वाली है।
राज्य में 28 प्रतिशत चीड़ का जंगल हो गया। बरसाती नदियां उत्तराखंड की रीढ़ है। यह नदियां भी धीरे धीरे सूखने लग गई है। बर्फानी नदियाँ उतनी जरूरी नहीं है।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ० योगेश धस्माना ने किया और कार्यक्रम में उपस्थित लोगों का आभार दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के रिसर्च एसोसिएट चंद्रशेखर तिवारी ने किया है।







