कौतूहल है और बना रहेगा
By – Chandra shekhar joshi
आईआईएम, आईआईटी, मेडिकल के छात्र और सामान्य युवा जंतर-मंतर देखने जा रहे हैं, वहां सेल्फी ले रहे हैं और हर तरफ नजरें दौड़ा रहे हैं। ये नफरती भाजपाई नहीं हैं।
दर्जनों युवा सड़क किनारे उन जगहों को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं, जहां सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर सोनम वांगचुक और एक युवती नेहा बोरा जिसके साथ कुछ युवक भी भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनके लिए वह सब कुछ अकल्पनीय है। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि दूर पर्वतीय इलाकों की निवासी नेहा बोरा भीड़-भरी सड़क किनारे 23 दिनों तक भूख हड़ताल पर कैसे बैठी होगी। कई बच्चे मोबाइल पर नेहा के भाषणों के वीडियो बार-बार देखते हैं, वांगचुक के बारे में सर्च करते रहते हैं।
हालांकि अब यहां की सड़क से दरियां हटा दी गई हैं, तंबू गायब हैं, सामूहिक रसोई भी नहीं है, उन विद्यार्थियों का सैलाब भी नहीं जिन्होंने सड़कों को स्वच्छ और आरामदायक बना दिया था।
भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में दाखिले के लिए कॉमन एडमिशन टेस्ट (कैट) की तैयारी कर रहे 19 वर्षीय छात्र रोहन ने कहा, हर कोई इस जगह के बारे में बात कर रहा था। हमने वीडियो देखे, पुलिस की मारपीट देखी और भीड़ देखी। मैं बस यह देखना चाहता था कि जब यहां कोई प्रदर्शन नहीं होता है, तो यह जगह कैसी दिखती है। मैं बहुत सारी वीडियो देखकर विचलित हो जाता हूं और मुझे खुशी भी होती है। सुबह मेरे सीनियर भी यहां आए थे।
लखनऊ के रोहन के दोस्त ने कहा, हम देर से दिल्ली आए। हमें पता था कि प्रदर्शन खत्म हो चुका है, फिर भी हम एक बार यहां आना चाहते थे। यहां हजारों लोगों को देखने के बाद इस जगह को इतना खाली देखना अच्छा नहीं लग रहा है।
सोनू नाम का पेंटर प्रदर्शन के दौरान क्षतिग्रस्त अवरोधकों को ठीक कर रहा था। उसने ब्रेकरों पर पीला रंग चढ़ाया और लाल रंग से दिल्ली पुलिस लिखा। दिल्ली पुलिस लिखते समय उसका ब्रश लड़खड़ा कर गिर गया, उसने तीन बार में दिल्ली पुलिस लिखा और पूछा तो हंस गया। फिर पूछा तो बोला-दिल्ली पुलिस लिखा नहीं जा रहा।
मेडिकल कॉलेज की ड्रेस पहना एक लड़का नीट परीक्षा लीक होने पर जान देने वाले बच्चों की फोटो वाला कागज हाथ पर थामे घूमता दिखा, शायद कहीं पर चिपका देना चाहता होगा।कहीं पर आंदोलन के दिनों का सामान अभी बिखरा पड़ा है, मच्छरदानियां, प्लास्टिक की कुर्सियां, पोस्टर, बर्तन, ईसा मसीह की तस्वीरें, भगत सिंह की फोटो वाले कागज, बी.आर. आंबेडकर की एक छोटी सी मूर्ति।
जनपथ मार्केट और आसपास दुकानदारों ने अपने प्रतिष्ठान फिर से खोल दिए हैं। चाय-नाश्ता वाले अपनी रेहड़ियों पर लौट आए हैं और दफ्तर जाने वाले लोग भी दिखने लगे हैं। सभी के दिमाग में सड़क किनारे से उठने वाली बच्चों की आवाजें गूंज रही हैं।
जनाब संघर्षों की भूमि के नजारे अजब होते हैं, तब भी थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।







