सेवानिवृत्ति के बाद की ‘डिजिटल समाजसेवा’ कितना कारगर।

By – Dinesh Verma
यहां मै अपने जौनसार-बावर क्षेत्र की जमीनी यथार्थ को समझने को कोशिश कर रहा हूँ। हालात की नजाकत यूं है कि सोशल मीडिया की बौद्धिकता के बीच सेवानिवृत्ति मनीषियों को पिसता देख रहा हूं। यह फ़ासला लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
दरअसल बात जौनसार-बावर क्षेत्र की है जहां समाज में समय के साथ साथ काफी बदलाव आए हैं। इस क्षेत्र में भी आज सोशल मीडिया ने विचार रखने और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का एक प्रभावशाली मंच उपलब्ध कराया है। यह भी अच्छी बात है। मगर यहां के बासिंदे देश के अलग अलग विभागों से जब सेवानिवृत्त होते हैं तो उनका समाजसेवा का सहारा अब सोशल मीडिया बनता जा रहा है। इस तरह ये अधिकारी, शिक्षक, बुद्धिजीवी और समाज के अनुभवी लोग अपने अनुभवों के माध्यम से क्षेत्र के विकास, शिक्षा, संस्कृति और पलायन जैसे विषयों पर चर्चा कर रहे हैं।
इधर सवाल भी उठ रहें हैं कि क्या सोशल मीडिया पर लगातार लिखना ही समाजसेवा का पर्याप्त माध्यम है? या उनके अनुभव कभी जमीनी रूप लेंगे। मुद्दा तो यही है कि जौनसार-बावर जैसे पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्र में इस प्रश्न पर भी गंभीरता से विचार करने लग गए है। अर्थात देखा जा रहा है कि सेवा के दौरान दूरी, सेवानिवृत्ति के बाद सक्रियता।
ज्ञात हो कि सरकारी सेवा में रहने वाले अधिकारियों और उच्च पदों पर कार्य कर चुके लोगों के पास भारी अनुभव, प्रशासनिक समझ और संपर्कों की एक बड़ी पूंजी होती है। समय रहते यदि इस अनुभव का उपयोग अपने गांव, क्षेत्र और समाज के लिए किया जाए तो उसका प्रभाव निश्चित रूप से व्यापक होगा। फलतः युवाओं को मार्गदर्शन, विद्यार्थियों को सही दिशा, जरूरतमंद परिवारों की समस्याओं को संबंधित विभागों तक पहुंचाना और गांवों की मूलभूत समस्याओं के समाधान में सहयोग, ऐसे अनेक कार्य हैं जिनमें अनुभवी लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, सहित सोशल मीडिया।
कई बार ऐसा देखा गया है कि सेवाकाल में व्यक्ति अपने मूल गांव और सामाजिक परिवेश से दूर होता चला जाता है। पर सेवानिवृत्ति के बाद अचानक वही सामाजिक सरोकार फिर से चर्चा का विषय बन जाते हैं। जिस बदलाव को गलत नहीं समझा जाता है बल्कि इसकी वास्तविक उपयोगिता पर समाज और क्षेत्र में सवाल उठाये जा रहे है।
उल्लेखनीय हो कि वही लोक सेवक जो सेवानिवृत्ति के बाद जन सेवक की भूमिका में “डिजिटल चौपाल बनाम गांव की चौपाल” का आयोजन करते दिखाई देते हैं। यानि फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य डिजिटल मंचों पर जौनसार-बावर के विकास, संस्कृति, पलायन और शिक्षा को लेकर लंबी लंबी चर्चाएं करते दिखाई दे रहे हैं। अतएव इस आभासी मंच पर विचार, सुझाव और क्षेत्र की समस्याओं पर चिंता व्यक्त की जा रही है। इधर आभासी दुनिया के दर्शक प्रश्न पूछ रहे हैं कि गांव की वास्तविक परिस्थितियां केवल मोबाइल स्क्रीन से नहीं समझी जा सकतीं। कुलमिलाकर आभासी दुनियां के मंच से यह सवाल बार बार आ रहे हैं कि गांव की सड़क की समस्या क्या है? विद्यालय में बच्चों और शिक्षकों की वास्तविक स्थिति क्या है? स्वास्थ्य सुविधा कितनी दूर है? किसान किन समस्याओं से जूझ रहा है? युवा रोजगार के लिए क्यों बाहर जा रहा है? इन सवालों के जवाब यही होगा कि गांव की चौपाल में बैठकर, लोगों के बीच जाकर और उनकी बात सुनकर ही बेहतर तरीके से समाधान किए जा सकते हैं।
बहरहाल डिजिटल संवाद जरूरी है, लेकिन डिजिटल संवाद जमीनी सहभागिता का विकल्प नहीं हो सकता। लाइक और कमेंट से आगे सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि व्यक्ति की बात कुछ ही क्षणों में सैकड़ों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन लाइक, शेयर और कमेंट की संख्या को सामाजिक परिवर्तन का पैमाना मान लेना ही उचित नहीं होगा। वास्तविक परिवर्तन तभी दिखाई देगा जब किसी बच्चे की पढ़ाई में मदद होगी, किसी युवा को सही दिशा मिलेगी, किसी किसान को नई जानकारी मिलगी या किसी गांव की वास्तविक समस्या के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठये जाएंगे आदि आदि।
इसलिए सवाल यह नहीं कि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर लिखता क्यों है। सवाल यह है कि उसके लिखे हुए शब्द जमीन पर कितना असर पैदा कर रहे हैं। वैसे भी जौनसार-बावर का समाज पहले से अधिक जागरूक है। यहां का युवा अपने भविष्य को लेकर गंभीर है। वह केवल भाषण नहीं चाहता, वह अवसर, मार्गदर्शन और सहयोग चाहता है। पूर्व अधिकारियों और अनुभवी लोगों के पास समाज को देने के लिए बहुत कुछ है। प्रशासनिक अनुभव रखने वाला व्यक्ति युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समझ दे सकता है। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोग गांवों में विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शन कार्यक्रम चला सकते हैं। कृषि का अनुभव रखने वाले लोग किसानों के साथ काम कर सकते हैं और सामाजिक क्षेत्र में अनुभव रखने वाले लोग गांवों में स्थानीय स्तर पर छोटी लेकिन प्रभावी पहल शुरू कर सकते हैं।
ही वह बिंदु है जहां ‘बौद्धिकता’ और ‘सामाजिक सहभागिता’ एक-दूसरे से जुड़ती हैं। कथनी और करनी की कसौटी किसी व्यक्ति के शहर में रहने पर सवाल उठाना उचित नहीं है। हर व्यक्ति को अपने जीवन की सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार रहने का अधिकार है। इसी तरह सोशल मीडिया पर लिखना भी गलत नहीं है। कह सकते है कि कोई व्यक्ति समाज के लिए चिंतित है, तो उसके पास अपनी क्षमता और अनुभव के अनुसार कुछ करने के अवसर भी हैं। समाजसेवा के लिए हर किसी को गांव में स्थायी रूप से रहना जरूरी नहीं। जरूरी यह है कि विचार और व्यवहार के बीच संबंध हो।
अच्छा तो यही है कि सोशल मीडिया पर मुद्दा उठाया जाए कि गांव में पुस्तकालय बनाना है, किसी विद्यार्थी को मार्गदर्शन देने, युवाओं के लिए प्रशिक्षण आयोजित करने, स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने या किसानों की मदद करने जैसी पहल को इस आभासी दुनिया के मंच से से जोड़ा जाए तो अमुक की डिजिटल सक्रियता वास्तविक सामाजिक योगदान में बदल सकती है।
यही कहा जा रहा है कि जौनसार-बावर क्षेत्र को अनुभवी लोगों से दूरी नहीं, बल्कि उनका सहयोग लेना चाहिए। सेवानिवृत्ति के बाद जीवन का यह पड़ाव केवल व्यक्तिगत आराम का समय नहीं, बल्कि वर्षों के अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि हम या ‘मैंने’ समाज के लिए क्या लिखा?’ से आगे बढ़कर यह पूछे कि ‘मैंने’ समाज के लिए क्या किया?’ क्योंकि समाज को केवल सलाह देने वालों की नहीं, बल्कि साथ चलने वालों की जरूरत है।
सोशल मीडिया आज की वास्तविकता है। इसकी शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन जौनसार-बावर की समस्याएं इतनी गहरी और जटिल हैं कि उनका समाधान केवल पोस्ट, टिप्पणी और ऑनलाइन चर्चाओं से संभव नहीं है। गांव की पगडंडी, चौपाल, विद्यालय, खेत और युवा। यही वह वास्तविक धरातल है जहां सामाजिक बदलाव की शुरुआत होती है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)







