Sunday, September 13, 2026
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प्राकृतिक सम्पदा पर एक अनूठी किताब : उत्तराखंड के पक्षी

हिंदी और अंग्रेजी की विदुषी रचनाकारों की भारतीय प्राकृतिक सम्पदा पर एक अनूठी किताब

Dr. Batrohi

लीफवर्ड फाउंडेशन, मुंबई की ओर से अंग्रेजी और हिंदी में भारत के दुर्लभ पहाड़ी पक्षियों को लेकर लिखी गई किताब ‘उत्तराखंड के पक्षी’ अपनी तरह की पहली किताब है. सामान्यतः इस तरह की किताबें अंग्रेजी में ही लिखी जाती रही हैं. हिंदी में भी कुछ किताबें सामने तो आई हैं, मगर उनमें मौलिकता कम देखने को मिलती है. ज्यादातर ऐसी किताबें प्रसिद्ध पक्षी-प्रेमियों की किताबों की नकल लगती हैं. यह किताब एक मौलिक शोध की तरह लिखी गई है इसलिए अपना ध्यान सहज ही आकर्षित करती है.
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इन दोनों शोधकर्ता रचनाकारों का मुख्यधारा के हिंदी लेखन के साथ अभिन्न सम्बन्ध रहा है. 1988 में मैंने सम्पूर्ण हिंदी कहानियों का दो खण्डों में वृहत संकलन सम्पादित किया, जिसके पहले खंड में गुलेरी से लेकर हरिशंकर परसाई तक सोलह और दूसरे खंड में ज्ञानरंजन से लेकर सुनील सिंह तक सत्रह कहानीकारों (कुल 33) को शामिल किया था. हिंदी के अलग मिजाज के जटिल कथाकारों की कहानियों का हिंदी की बोलियों की प्रकृति को पकड़ते हुए अनुवाद करना एक चुनौती भरा काम था. खासकर जयशंकर प्रसाद, रेणु, राधाकृष्ण, परसाई, जैनेन्द्र कुमार आदि की कहानियों का अनुवाद.
उस वक़्त मैं कुमाऊँ विवि के हिंदी विभाग का अध्यक्ष था औए डॉ. अनिल बिष्ट अंग्रेजी विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापक. अनुवाद की जिम्मेदारी अनिलजी ने संभाली और उन्होंने ही पूरे देश से कुशल अनुवादकों की टीम जुटाई. अनुवादकों में उनके अलावा हमारी बेहद आत्मीय सहयोगी अंग्रेजी विभाग की (स्व.) मधु जोशी मेरी मुख्य सलाहकार थीं जिन्होंने खुद भी अनेक कहानियों के यादगार अनुवाद किये. किताब अल्मोड़ा बुक डिपो से प्रकाशित हुई और देश-विदेश में खूब चर्चित हुई.
इसी संकलन में उस वक़्त एम. ए. की मेधावी छात्रा बेला नेगी ने भी खूब मेहनत की. सुनील सिंह की अंतिम कहानी ‘माँ मेरे साथ ही रहेगी’ का अनुवाद बेला ने ही किया था.
इन दोनों प्रबुद्ध रचनाकारों की पहाड़ के पक्षियों पर लिखी गई इस यादगार कृति को देखकर मुझे वो पुराने दिन आज अनायास याद आ रहे हैं; जब हम लोगों ने मिलकर एक-एक शब्द, भाव और भंगिमा को लेकर घंटों बातें की थी और हिंदी कहानी की अन्तरंग दुनिया के बीच कितने ही दिनों तक गोते लगाए थे . उसी मेहनत को आज स्मरण करते हुए साफ लगता है कि उनका यह शोध कितना मूल्यवान है.
कवर डिजाईन मृगांक नेगी ने तैयार किया है.

 

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार है।

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