Sunday, September 13, 2026
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उत्तराखंड की जीएसडीपी में खेती का योगदान घटा।

उत्तराखंड की जीएसडीपी में खेती का योगदान घटा।

 

-दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के हिमालयी अध्ययन केन्द्र का शोध
-पलायन, छोटी जोत और जलवायु संकट से जूझ रहा उत्तराखंड का कृषि सेक्टर
-अधिकांश कृषि स्टार्ट अप की सीधे बाजार तक पहुंच नहीं, बिचौलिए उठा रहे फायदा
-विकसित भारत-2047 की राह में खेती को स्टार्ट-अप और बाजार से जोड़ने का सुझाव
-इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में प्रकाशित हुआ शोध

By – shailendrasemwal

पलायन, छोटे जोत आकार और जलवायु संकट से जूझ रहे उत्तराखंड में कृषि स्टार्ट-अप को प्रोत्साहन की जरुरत है। पहाड़ की खेती को तकनीक, नवाचार और बाजार से जोड़ने की कोशिशें तेज हुई हैं, लेकिन ताजा राष्ट्रीय अध्ययन बताता है कि नीति, पूंजी और तकनीकी बाधाएं उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों की कृषि ग्रोथ को प्रभावित कर रही हैं। उत्तराखंड की ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट(जीएसडीपी) में खेती का योगदान घट रहा है।

भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की पत्रिका इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में प्रकाशित दिल्ली विवि के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के हिमालयी अध्ययन केन्द्र निदेशक प्रो. बिंध्यवासिनी पांडेय, डॉक्टोरल फेलो राम मनोहर, मनु आर्य के ताजा शोध में कृषि स्टार्टअप के महत्व और विस्तार में आ रही बाधाओं को रेखांकित किया गया है। शोध में कहा गया है कि देश में वर्तमान में एग्रो स्टार्टअप वित्तीय बाधाओं से जूझ रहा है। 66 फीसदी से ज्यादा स्टार्टअप पर्याप्त फंडिंग पाने को संघर्षरत हैं, जिससे स्टार्टअप से जुड़े लोगों का मनोबल गिर रहा है। अधिकांश कृषि स्टार्टअप की सीधे बाजार तक पहुंच नहीं है, बिचौलिए इसका फायदा उठा रहे हैं। सही प्रोत्साहन मिले तो कृषि आधारित स्टार्ट-अप-जैसे ऑर्गेनिक फार्मिंग, हर्बल, एरोमैटिक प्लांट्स, मधुमक्खी पालन, मिलेट्स और एग्रो-टूरिज्म राज्य की आर्थिकी को नई दिशा दे सकते हैं।

25 सालों में 27 फ़ीसदी कृषि भूमि हुई कम-

उत्तराखंड की करीब 70% आबादी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। बावजूद इसके राज्य में खेती का योगदान जीएसडीपी में घटा है। राज्य में सन 2000 में जहां 7.70 लाख हेक्टेयर कृषि जमीन थी, वहीं 2025 में यह 5.68 लाख हेक्टेयर रह गई। इस दौरान 2.02 लाख हेक्टेयर भूमि कृषि भूमि कम हुई है। कुल 3.53 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में ही सिंचाई की सुविधा है। 2011-2025 टेरेटरी सेक्टर में उत्तराखंड में कृषि क्षेत्र में 4.6% जीडीपी की कमी आई। उत्तराखंड की जीएसडीपी में शहरी हिस्सेदारी 58 फ़ीसदी और ग्रामीण हिस्सेदारी 42 फ़ीसदी है। पिछले कुछ सालों में शहरी क्षेत्र का योगदान 53 फ़ीसदी से बढ़कर 58 फ़ीसदी हुआ है, जो बताता है कि शहरीकरण की अर्थव्यवस्था ग्रामीण के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है।

कृषि स्टार्टअप क्यों जरूरी
राज्य में छोटे और बिखरे जोत, अधिक लागत-कम लाभ, पलायन, पारंपरिक फसलों के लिए बाजार संकट, जंगली जानवरों की चुनौती के चलते कृषि स्टार्टअप को बढ़ावा देने की जरुरत है। स्थानीय रोजगार, रिवर्स माइग्रेशन की संभावना को देखते हुए यह मौजूदा दौर की जरुरत है।

सुझाव-
एडवांस तकनीक, स्थानीय युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण, मार्केट चेन, कोल्ड चेन, प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना, ब्रांडिंग, पैकेजिंग में सपोर्ट, बिचौलियों को हटाकर कृषि स्टार्टअप को सहारा। किसानों-उद्यमियों की झिझक तोड़नी होगी। विकसित भारत-2047 की राह में खेती को स्टार्टअप और बाजार से जोड़े।

दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, हिमालयी अध्ययन केंद्र दिल्ली विवि के डीन प्रो.बिंध्यवासिनी पांडेय कहते हैं, शोध का संदेश स्पष्ट है कि यदि ब्लॉक स्तर पर कृषि स्टार्टअप हब, मजबूत इनक्यूबेशन सेंटर, आसान ऋण व्यवस्था और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नीति बनाई जाए, तो कृषि स्टार्टअप पलायन रोकने और पहाड़ की अर्थव्यवस्था को संजीवनी दे सकती है।

द फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया फार्मर एसोसिएशन(एएफआईएफए)के मुताबिक कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में पिछले नौ सालों में हजारों की संख्या में नए स्टार्टअप शुरू हुए हैं। भारत सरकार के तहत उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग(डीपीआईटी) ने 1.59 लाख से अधिक कृषि स्टार्टअप को मान्यता दी है। देश में 3.80 फीसदी स्टार्टअप एग्रो स्टार्टअप हैं।

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