Saturday, March 7, 2026
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ममतामयी और नाकुरी गांव की बेटी का नाम है बचेन्द्रीपाल

ममतामयी और नाकुरी गांव की बेटी का नाम है बचेन्द्रीपाल

24 मई 1954 को उत्तरकाशी के नाकुरी गांव में जन्मी सुश्री बचेन्द्री ने एक से 23 मई के मध्य 1984 को हिन्दुस्तान की पहली बेटी होने का एक नया इतिहास रचा। बचेन्द्रीपाल ने दुनियां के सर्वोच्च शिखर एवरेस्ट पर पहली बार तिरंगा फहराया है। जब वह एवरेस्ट से उतरी तो देशवासियों ने उसे सर आंखों पर बिठाते हुए बचेन्द्री का पूरे देश में भव्य स्वागत किया।

एक दिन बचेन्द्री के पास एक पत्र आया जिसने उसे झकझोर कर रख दिया। पत्र में खबर थी कि एवरेस्ट के रास्ते में आए एक भीषण हिमस्खलन में पोर्टर ’अंग दोर्जी’ की मौत हो गई है। खबर को पढ़कर बचेन्द्री पाल सन्न रह गई। यह वही दोर्जी था जो बचेन्द्री पाल के एवरेस्ट रोहण के समय पोर्टर के रूप में उनके साथ था और एवरेस्ट की कठिन चढ़ाई चढ़ते वक्त बचेन्द्री का हौसला बढ़ा रहा था। दोर्जी में बचेन्द्री को अपना भाई दिखने लगा था जो ऐसे कठिन वक्त में उनके साथ था। दोर्जी ने बचेन्द्री को बताया था, इतना कठिन परिश्रम करने के बावजूद उनकी घर की हालात ठीक नहीं है।

बचेन्द्री की आखों में दोर्जी का स्नेह और उसके लाचारी भरे शब्द तैर आये थे, बचेन्द्री को लगा कि उसे दोर्जी के गांव जाकर उसके परिवार की कुछ मदद करनी चाहिए।

 

और बचेन्द्री काठमांडू (नेपाल) होते हुऐ एवरेस्ट के रास्ते में पड़ने वाले दोर्जी के गांव पहुंच गई। पूछताछ करने के बाद अंगदोर्जी के घर पहुंची तो उनके घर की हालात देखकर वह कांप उठी। दोर्जी की पत्नी बीमारी से जूझ रही थी और उसके चार मासूम बच्चे पड़ोसियों की दया पर निर्भर थे जो उन्हें खाना दे रहे थे। घर के कमाऊ सदस्य के चले जाने से परिवार को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो पा रही थी।

बचेन्द्र ने जब अपने बारे में बताया तो दोर्जी की लाचार विधवा उससे लिपटकर फूटफूट कर रोने लगी। वह सिसकते हुए बोली कि लोग उन्हें आखिर कब तक खाना देंगे? कुछ दिन बाद उसके साथ उसके बच्चे भी बदहाली झेलते झेलते मर जाएंगे। बचेन्द्री उन्हें कुछ पैसा देना चाहती थी पर उनकी विपत्ति के सामने यह मदद ऊंट के मुहं में जीरा से ज्यादा कुछ नहीं था।

बचेन्द्री ने बच्चों से यों ही पूछ लिया, बच्चों क्या वे उनके साथ भारत चलेंगे? गरीबी से मजबूर बच्चों ने एक साथ हामी भर दी। इससे बचेन्द्री की दुविधा और बढ़ गई।

एक लड़की अभी से कैसे चार-चार बच्चों का बोझ उठायेगी ? अचानक उसके मन में एक ऐसी प्रतिज्ञा ने जन्म लिया जो एवरेस्ट फतह से भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण थी। बचेन्द्री ने निर्णय लिया कि वे अब इन लाचार बच्चों को अपनी संतान की तरह पालेगी और खुद कभी शादी नहीं करेगी।

वे बच्चों को लेकर जमशेदपुर आ गई। उसकी बात सुनकर उसके परिवार के लोग व जानने वाले हैरान रह गये। देश की आंखों में स्टार बन चुकी एक जवान लड़की की आंखों में जब शादी के सपने उमड़ते हैं ऐसे में बचेन्द्री के ऐसे फैसले से सभी परेशान थे, पर एवरेस्ट को मात देने वाली जांबाज के सामने कोई कुछ बोल भी नहीं पाया।

 

दोर्जी के बच्चे, भारत की कोई भाषा नहीं जानते थे इसलिए बचेन्द्री उनसे इशारे से ही बात करती थी। उनके लिए विशेष ट्यूशन लगाया गया ताकि उन्हें स्कूल में भर्ती किया जा सके। वे खुद ही उनकी परवरिश में जुट गई। बचेन्द्री के माता-पिता ने भी बेटी की खुशी में खुशी समझी और वह भी बच्चां की देखभाल में मदद करने लगे। आज चारां बच्चे (दो लड़के, दो लड़कियां) पढ़ लिखकर स्वावलम्बी बन गये हैं और उन्होंने अपने-अपने घर भी बसा लिए हैं।

बचेन्द्री ने पर्वतारोहण के क्षेत्र में सैकड़ों युवाओं को रोजगार से जोड़ दिया है। वे जमशेदपुर में ’टाटा एडवेंचर संस्थान’ की निदेशक हैं जिसके तहत वे पर्वतारोहण और समाज सेवा की गतिविधियों से एक साथ जुड़ी हैं। वे हर लाचार की मदद के लिए हर समय तैयार रहती हैं।

एक दिन अपने गांव नाकुरी गई थी। सुबह -सुबह उनके घर में अतर सिंह रावत नामक एक व्यक्ति आया जो बीमार था। उनके साथ एक छोटी सी बेटी थी। बचेन्द्री को उसे पहचानते देर नहीं लगी। यह वही युवक अतर सिंह था जो कभी बचेन्द्री के साथ पोर्टर के रूप में कई अभियानों में शामिल रहा। उत्तरकाशी जिले के फतेपर्वत क्षेत्र का रहने वाला उस युवक को गम्भीर रोग ने घेर लिया था।

बचेन्द्री ने बच्ची को गोद में लिया और यों ही पूछ लिया मेरे साथ जमशेदपुर चलेगी-बच्ची ने हाथ पकड़कर ’हां’ कह दिया। ममतामयी बचेन्द्री उसे भी अपने साथ जमशेदपुर ले गई और नताशा रावत नामक इस बच्ची को जमशेदपुर के नामी सेक्रेट हार्ट कान्वेट स्कूल से पढाई करवाई। नताशा भी बचेन्द्री की बेटी के रूप में साथ रहती है। अतर सिंह रावत की माली हालत को देखते हुए अब उसका दूसरा बेटा भी बचेन्द्री के साथ जमशेदपुर में रहकर पढाई पूरी कर चुका है। जबकि तीसरा लड़का देहरादून में पढ़ा है जिसकी रहने खाने की व्यवस्था भी बचेन्द्री ने कर रखी है।

बचेन्द्री की मां हंसा देवी बुजुर्ग हुई तो उसकी देखरेख के लिए उन्हें एक युवा लड़की की जरूरत थी। उत्तरकाशी में पर्वतारोहण के क्षेत्र में मजदूरी करने वाले उत्तम सिंह ’नेपाली’ की 10 पुत्रियां थी वह भी बेहद करीब था। बचेन्द्री ने उससे अपनी सबसे बड़ी लड़की को मां की देखरेख के लिए जमशेदपुर भेजने को कहा। बचेन्द्री पर्वतारोहण पर गई थी, घर लौटी तो एक बेहद छोटी बच्ची को घर में देखकर सकते में आ गई उसने उत्तम से उसकी बड़ी बेटी को भेजने को कहा था पर उसने अपनी सबसे छोटी बेटी भेज दी थी। बचेन्द्री ने बच्ची को वापस भेजने को कहा तो बच्ची रोने लगी, उसने रोने का कारण पूछा तो बच्ची बोली कि वह यहीं रहना चाहती है उन्हीं के घर में। और वह भी बचेन्द्री की बेटी बन गई और मां की सेवा के लिए लाई गई बच्ची की सेवा में खुद बचेन्द्री जुट गई। आज वह भी जमशेदपुर के अच्छे स्कूल में पढ़ रही है। बचेन्द्री कहती हैं कि उससे ज्यादा त्याग उसके मां-बाप का है जिन्होंने उसे बेहद गरीबी में पढ़ाया-लिखाया और जब थोड़ी सम्पन्नता आई तो उसने दूसरा रास्ता चुन लिया।

मां-बाप ने उसके काम में हाथ बंटाया। वह पर्वतारोहण में देश-विदेश की यात्राओं पर रहती थी, तब बच्चों की देखभाल उनके मां-बाप के जिम्मे ही होती थी। यद्यपि वे नियमित मां-बाप व बच्चों से सम्पर्क बनाए रहती थी। बचेन्द्री अब तक दर्जनों गरीब बच्चां की पढ़ाई में मदद कर चुकी हैं।

गांव की बुजुर्ग महिलाओं से बचेन्द्री बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री तथा गंगोत्री की यात्राएं समय-समय पर करवाती रहती हैं। इसलिए उसे गांव वाले ’गांव की बेटी’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। गांव में किसी को कोई परेशानी हो तो बचेन्द्री मदद के लिए हमेशा तैयार रहती हैं।

बचेन्द्री के नाम पद्मश्री, अर्जुन अवार्ड सहित दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान हैं। उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी दर्ज है पर एवरेस्ट की बेटी का जो ममतामयी चेहरा है वह एवरेस्ट से भी ऊंचा और गिनीज बुक के रिकार्ड से भी बड़ा है।

@देहरादून से विजेन्द्र रावत के साथ प्रेम पंचोली

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