Thursday, May 14, 2026
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मै, राहुल और बारामासा।

By – Charu Tiwari

राहुल कोटियाल ने एक सजग और प्रतिबद्ध पत्रकार के रूप में बहुत कम समय में अपना विशेष स्थान बनाया है। बहुत कम उम्र में जिस तरह उन्होंने चीजों को देखने का नजरिया पाया है वह अद्भुत है। यह दृष्टि उन्होंने बहुत मेहनत से पाई है। राहुल ने अपनी मुख्यधारा की पत्रकारिता की शुरुआत 2013 में उस समय की चर्चित पत्रिका ‘तहलका’ से की थी। अपने शुरुआती दिनों में ही कश्मीर से लेकर देश के तमाम हिस्सों में जाकर बहुत जन-सरोकारी पत्रकारिता से अपने को गढ़ा। मेरा राहुल के साथ पढ़ने-लिखने से संबंध बहुत पहले हो गया था, लेकिन दिल्ली में मुख्य धारा की पत्रकारिता के साथ उनसे नए सिरे से परिचय हुआ।

राहुल लंबे समय तक ‘तहलका’ पत्रिका में रहे। एक तरह से ‘तहलका’ के हिंदी संस्करण में उनकी रिपोर्ट ही धार देती थी। उन्होंने जिस तरह से अपनी पत्रकारिता को जनसरोकारों से जोड़ा है, ‘बारामासा’ के माध्यम से वह पहाड़ के लिये बहुत लाभकारी हो रहा है।

राहुल को 2015 और 2017 में प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिला। उन्हें 2019 में ‘रेड इंक’ सम्मान मिला।

राहुल ने भले ही देश की मुख्य धारा की पत्रकारिता में अपना स्थान बनाया, लेकिन उन्हें पहाड़ हमेशा अपनी ओर खींचता रहा। इसी का परिणाम था कि वे अपने जमे-जमाए पत्रकारिता के कैरियर को छोड़कर देहरादून आ गये। यहां अपने साथियों के साथ उन्होंने ‘बारामासा’ नाम से अपना प्लेटफार्म तैयार किया।

‘बारामासा’ में वह जिस तरह से हिमालयी इतिहास, भाषा, साहित्य, संस्कृति, रंगमंच, समसामयिक सरोकार, राजनीति, पर्यावरण जैसे विषयों को शोधपरक तरीके से रखते हैं वह बताता है कि उनके अंदर विषयों को समझने की कितनी गहरी दृष्टि है।

आजकल वह अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘एकस्ट्रा कवर’ के माध्यम से उत्तराखंड के सवालों को प्रखरता से उठाते हैं। उनका पोडकास्ट भी बहुत स्तरीय और शोधपरक होता है।

राहुल की इतनी सारी खूबियों को हालांकि बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपने काम से सभी को प्रभावित किया है। बताना इसलिए जरूरी हो गया है कि प्रदेश की सरकार और मुख्यमंत्री राहुल और उन जैसे जन-सरोकारी पत्रकारों के बारे में कैसी राय रखते हैं।

इससे यह भी साबित होता है कि लोकतंत्र में जब नासमझ और हल्के लोग प्रतिनिधित्व करने लगते हैं, तो उन्हें हर प्रतिरोध की आवाज में ‘अर्बन नक्सल’, ‘जिहादी’, ‘अराजक’, ‘देशद्रोही’ दिखने लगते हैं।

पिछले दिनों पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड से इस तरह के नकारात्मक बात करने वाले लोगों का सबक सिखाने की बात भी कही जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार के विकास को बाधित कर रहे हैं। यह बात मुख्यमंत्री ने उस समय कही जब अपने को ‘स्मार्ट’ बताने में एक हजार करोड़ से अधिक जनता का पैसा अपने चाटुकार मीडिया हाउसों को दे रही है। जब राहुल पर सरकार की शह पर एआई रिपोर्टर के माध्यम से हद दर्जे की बेवकूफी भरी जानकारी परोस रही थी, तब धामी के चाटुकार उनके लिए हल्द्वानी में गीत रच-गा रहे थे।

मेरा राहुल से बहुत निकट का नाता है। मैं उन्हें बहुत गहरे तक जानता हूं।

‘बारामासा’ के शुरुआती दौर से ही उनके साथ जुड़ा रहा हूं। उनके खिलाफ इस तरह के औछे और घटिया प्रचार का पुरजोर विरोध करता हूं। हम सब जानते हैं कि यह सरकार असहमति को दबाने के लिए कुछ भी कर सकती है, लेकिन जिस तरह की बेवकूफी भरी बातें कर वह एक प्रतिबद्ध पत्रकार और ‘बारामासा’ जैसे गंभीर प्लेटफार्म को बदनाम करने की कोशिश कर रही है, वह लोकतंत्र के साथ उन लोगों की भावनाओं के साथ भी साजिश है, जो हिमालय से प्रेम करते हैं।

हिमालय को लीलने-छीनले वाले ‘राष्ट्रभक्त’ और हिमालय के सरोकारों के लिए काम करने वाले ‘अर्बन नक्सल’ यह तो सहन नहीं होगा।

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