हमारे इलाके के शुरुआती आईएएस किशन आर्या जिन्होंने उत्तराखंड लोकसेवा आयोग की नींव रक्खी!
*****
हैरान करने वाली बात है कि डिजिटल क्रांति के इस स्वर्णयुग में मुझे अपने सीनियर सहपाठी-मित्र किशन आर्या का कोई फोटो नहीं मिला. वह कोई छोटे-मोटे आदमी नहीं, देश की चर्चित हस्ती थे, हमारे इलाके से पहले आईएएस, असम के पूर्व मुख्य-सचिव और उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के ढाँचे के पहले शिल्पकार!
अल्मोड़ा के दूरस्थ गाँव में जन्मे और अल्मोड़ा में ही उच्च शिक्षा-प्राप्त कलात्मक अभिरुचियों वाले किशन राम आर्य हमारे इलाके के पहले आईएएस हैं.
उनका नाम विद्यार्थी जीवन में भी सुना था, मगर भेंट कभी नहीं हुई थी. एक दिन उत्तराखंड लोक सेवा आयोग से गोपनीय पत्र मिला कि मुझे आयोग का पाठ्यक्रम फ्रेम करने के लिए हरिद्वार आना है. वही पहली बार उनसे भेंट हुई और बिना किसी औपचारिकता के उन्होंने मुझे काम में जोत दिया.
खुद का नाम वो के. आर्या लिखते थे और उसी नाम से जाने जाते थे. नाम बदलने का सिलसिला पढ़े-लिखे भारतीयों में खब्त की हद तक मौजूद रहता है, पहाड़ियों में तो नशे की हद तक है.
पिछली सदी में ग्रामीण नामों का संस्कृतीकरण करने का फैशन था; मेरे पिताजी का नाम बिशन सिंह बिष्ट था, जिसे उन्होंने अपने स्कूल में ‘विष्णु सिंह बिशिष्ट’ लिखवाया. माँ को सभी मधुलिदी कहते थे, बुदापैश्त में जब पहली बार उनके नाम की जरूरत पड़ी तो मैंने अपने मन से उसका नाम माधवी देवी लिखवा दिया. अब फिर फैशन बदला है और कठिन उच्चारण वाले क्लिष्ट पौराणिक नाम रखे जाने लगे हैं.
मगर प्रशासक किशन आर्या निश्चय ही एक अलग तरह की हस्ती हैं. देहरादून-हरिद्वार की यात्रा मैंने उनके निमंत्रण पर पहली बार की और हफ़्तों तक उनके अतिथि-गृह में रहा. अब तो सबकुछ काफी धूमिल पड़ चुका है, उन दिनों वह भवन और उसकी खूबसूरती केन्द्रीय लोकसेवा आयोग से अधिक आकर्षक थी. आर्याजी ने हरेक हिस्से, खंड, अतिथि-गृह के कक्षों और प्रशासनिक-गैर प्रशासनिक खण्डों के नामों का चयन उत्तराखंड के सांस्कृतिक प्रतीकों के आधार पर किया है. वहाँ के एक-एक पत्थर और कण-कण में उत्तराखंड की स्मृति विद्यमान है.
पुराना सहपाठी होने के नाते आर्याजी छोटी-छोटी बातों पर मेरी राय लेते थे और चूँकि पहली बार मुझे भी आधारशिला में योगदान देने का मौका मिल रहा था, मैंने खूब मेहनत की. पीसीएस की मुख्य परीक्षा में मैंने शैलेश मटियानी का उपन्यास ‘मुख सरोवर के हंस’ इसलिए प्रस्तावित किया क्योंकि उत्तर प्रदेश में रेणु के ‘मैला आँचल’ को अपनी क्षेत्रीय संस्कृति के अनुरूप बदलना था. अलग बात है कि मटियानी-परिवार की हठधर्मिता के कारण उनका बहुत मामूली उपन्यास रखा गया. (यह अजीब जिद भरी कहानी विदुषी डॉ. सुधारानी पाण्डेय को मालूम है.) आर्याजी की कोशिशों से मैंने आयोग की परीक्षाओं से जुड़े अनेक परिवर्तन और संशोधन किये. उसके बाद तो जो प्रारूप हम छोड़ गए थे, उसमें कोई भी उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है. पुराना ही रिपीट हो रहा है.
एक सामान्य परिवार से उठकर सर्वोच्च शिखर तक पहुँचते हुए भी विनय तथा सदाशयता के साथ अपनी जड़ों से कैसे जुड़ा रहा जा सकता है, इसकी मिसाल कही खोजनी हो तो वह सिर्फ किशन आर्या में देखी जा सकती है! हमारे क्षेत्र के प्रशासकों में यह विराटता सिर्फ रघुनन्दन सिंह टोलिया में देखने को मिलती है. आज तो वैसी निर्भीकता, कल्पनाशीलता और आपसी विश्वास एकदम अतीत की स्वप्निल बातें रह गई है! ऐसा नहीं है की आर्याजी या टोलियाजी के ज़माने में राजनेताओं की दखलंदाज़ी नहीं होती थी, सत्ताधारी लोग और मीडिया तब भी सक्रिय थे, मगर अच्छे लोग अपने विचारों के लिए आसानी से समाज में अपनी जगह बना लेते थे.
चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना
तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने दिखाई उत्तराखण्ड में फिल्मांकन...
चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना
तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने दिखाई उत्तराखण्ड में फिल्मांकन...
डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
https://www.facebook.com/janmanchaajkal?locale=hi_IN
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय...
Shaurya and Legacy of Karmaveer Jayanand Bharti Remembered on the 94th Anniversary of Pauri Kranti Diwas
By - Prem Pancholi
The Shail Shilpi Vikas Sangathan organized...
जनसमस्याओं के त्वरित एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के उद्देश्य से सोमवार को कलेक्ट्रेट परिसर स्थित ऋषिपर्णा सभागार में समाधान दिवस आयोजित किया गया। जिलाधिकारी डॉ....
गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र में दिखाई देने वाली छोटी हिमनदीय झीलों से तत्काल बड़े खतरे की स्थिति नहीं-वाडिया
मीडिया में प्रसारित खबरों के संबंध में यूएसडीएमए...