Friday, September 11, 2026
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यात्रा संस्मरण : जब यायावर डॉ० अरुण कुकसाल मिले जखोली की डॉ० आशा से।

जीवन के आघातों से जूझकर हासिल की कामयाबी-डा. आशा।

Dr. Arun kuksal

श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा, मयाली से होकर जखोली पहुँचा हूँ। ‘जखोली (समुद्रतल से ऊँचाई लगभग 1900 मीटर) चारों ओर से ऊँची पहाड़ियों से घिरा है। जंगल, घाटी, नदी और हल्की बर्फ का लिबास पहने पर्वतों की खूबसूरत दृश्यावली मेरे सामने है। ब्लाक आफिस, अस्पताल, बैंक और विद्यालय होने से यहाँ के बाजार में इस बरसाती सुबह में भी लोगों की चहल-पहल भरपूर है।

 

मित्र ललिता प्रसाद भट्ट जानकारी देते हैं कि जखोली से पाँच पट्टियों यथा- लस्या, बाँगर, सिलगढ़, भरदार और बड़मा के गाँव दिखाई देते हैं। ललिता पहाड़ के माथे पर सीधी लकीर में सड़क के ऊपर-नीचे बसे गाँव कपणिया, बचवाड़, चौंरा, पौंठी, खल्याण, लिसवाल्टा, रणधार… की ओर इशारा करते हैं। खेती-किसानी और पशुपालन इन गाँवों में अभी भी भरपूर है। इसीलिए, इस पूरे क्षेत्र में पलायन का दंश अभी ज्यादा गहरा नहीं हुआ है। यहाँ के राजमा, धान, आलू, गहथ, झंगोरा, मंडुवा, मिर्च, टमाटर, नाँरगी, माल्टा, प्लम, आडू की ख्याति दूर-दूर तक है। इस इलाके के बचवाड़ गाँव की पहचान उसकी आत्मनिर्भरता और खुशहाली के लिए पूरे गढ़वाल में है। बचवाड़ गाँव के बीचों-बीच की नहर रुद्रप्रयाग जिले में पेयजल और सिंचाई की लाइफ-लाइन मानी जाती है।

 

ललिता बताते हैं कि बाँज, बुराँस और काॅफल के घने जंगलों से घिरा लस्या पट्टी का ये इलाका ‘मिनी मसूरी’ का खिताब लिए हुए है।

 

बारिश आने को है और हम जखोली बाजार के निचले छोर की सड़क से डा. आशा के घर की ओर पैदल चल रहे हैं। जगह-जगह पर सड़क के दोनों ओर निजी वाहन फिलहाल आराम फरमा रहे हैं। अधिकाँश पुरुष सड़क पर तो महिलाएं छानियों (पशु आवास) और खेतों के आस-पास नज़र आ रही हैं। सामने राजकीय रामाश्रम इण्टर काॅलेज से घरों की एक रंग-बिरंगी लम्बी लकीर धार ही धार ऊपर तक चली जा रही है। लोगों ने नए भवन बनाये, पर पुराने घरों को तोड़ा नहीं है। परम्परागत शिल्प से सजे मिट्टी-पत्थर वाले भवनों ने जखोली की पहाड़ी गाँव की पहचान को बचाया हुआ है।

 

डा. आशा के घर पहुँचते ही उनके साथ तेज बारिश ने भी हमारा स्वागत किया है। खूबसूरत घर, जिसके तीन हिस्सों में एक कुटम्ब अपनी सयुंक्त परिवार की परम्परा को जीवंत रखे हुए है। इस घर केे नीचे की ओर दूर तलहटी तक जहाँ तक नज़र जा रही है, खेतों के फैलाव ने मुझे अपने गाँव चामी में बिताये बचपन को याद दिला दिया है। खेत-किसानी का ये आकर्षक विस्तार देखकर मैं ललिता से कहता हूँ अगली बार मैं इसी घर में रहूँगा।

 

अपनी छोटी सी भतीजी तनिष्का को गोद में लिए डा. आशा के साथ उनके भाई पंकज हैं। बच्ची को देखकर खाली हाथ किसी के घर मेहमान बनकर जाने का संकोच मन में तुरंत आया है।

 

डा. आशा ओंकारानन्द हिमालयन माण्टेसरी इण्टर काॅलेज, जखोली की प्रतिभावान छात्रा रही हैं। वर्तमान में वह राजकीय सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र, जखोली में चिकित्साधिकारी के पद पर कार्यरत है।

 

डा. आशा का अपने पैतृक गाँव जखोली से विद्यालयी शिक्षा लेने के बाद वहीं एक चिकित्साधिकारी के रूप में कार्य करना स्थानीय समाज के लिए एक सुखद अहसास है। ओंकारानन्द विद्यालय, जखोली का ‘प्रतिभावान सम्मान’ और ‘लस्या गौरव’ से डा. आशा को नवाजा गया है।

 

मित्र ललिता प्रसाद भट्ट ओंकारानन्द विद्यालय, जखोली के प्रबंधक हैं। लिहाजा, उनके लिए डा. आशा की सफलता अधिक मायने और सम्मान की बात है।

 

महत्वपूर्ण है कि महामहिम राष्ट्रपति से पुरस्कृत ख्यातिप्राप्त शिक्षक स्वः के.एन. भट्ट ने ओंकारानन्द हिमालयन माण्टेसरी इण्टर काॅलेज, जखोली की स्थापना 1987 में की थी। उनके पदचिन्हों पर अग्रसर यह विद्यालय हर वर्ष संपूर्ण उत्तराखण्ड के उत्कृष्ट विद्यालयों में विशिष्ट गौरव प्राप्त किए हुए है। इस दूरस्थ क्षेत्र में जीवनीय शिक्षा की अलख जगाये इस विद्यालय ने स्थानीय समाज के सर्वागीण विकास के साथ अपने होनहार विद्यार्थियों के माध्यम से देश-दुनिया में शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियाँ हासिल की हैं।

 

ओंकारानन्द हिमालयन माण्टेसरी इण्टर काॅलेज, जखोली ने ‘‘जखोली की आशा’’ शीर्षक से एक मोटीवेशनल डाक्यूमेंट्ररी तैयार की है। एक निम्न मध्यमवर्गीय ग्रामीण परिवेश की सामान्य बालिका ‘आशा’ का ‘डा. आशा’ बनने तक के विकट सफर को इसमें दिखाया गया है।इसमें विद्यार्थी, विद्यालय, अभिभावक और समुदाय के आपसी रिश्तों को प्रमुखता से उजागर किया गया है।

 

निःसंदेह, इनके आपसी सकारात्मक सामजस्य ने एक बालिका की जीवनीय राह का निर्धारण कर उसे उसके मुकाम तक पहुँचाया है।

 

सफलता की यह कहानी बालिका ‘आशा’ को ‘डा. आशा’ में गढ़ने में अहम भूमिका अदा करने वाले नेपथ्य के चरित्रों के कठिन जीवनीय संघर्षों को भी रेखांकित करती है। उन सामान्य से लोगों ने तमाम विपदाओं और अभावों के रहते हुए अपने असाधारण दृडसंकल्प के बलबूते से यह साबित भी किया।

 

रुद्रप्रयाग जनपद के जखोली गाँव में एक साधारण परिवार में 25 जनवरी, 1999 को जन्मी डा. आशा इस तथ्य को दृडता से स्वीकारती है कि उसके व्यक्तित्व निर्माण की नींव में परिजनों का त्याग और गुरुजनों की सीख का मूल तत्व विद्यमान है। उनके ही सहयोग और मार्गदर्शन का यह प्रतिफल है।

 

डा. आशा का मानना है कि ‘जीवन का हर क्षण और पग हमें कुछ न कुछ संदेश देते हुए गतिशील रहता है। ये हम पर निर्भर करता है कि जीवनीय गतिशीलता में निहित संदेश को समय रहते समझें। क्योंकि, कौन सी घटना आपके संपूर्ण जीवन दर्शन को बदल दे, इसका शुरुआत में आभास नहीं रहता है। शिक्षा इन्हीं जीवनीय संदेशों के क्रियान्वयन के प्रति व्यक्ति को निरंतर क्षमतावान बनाती है। अतः शिक्षा जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है।’

 

अपने बचपन को याद करते हुए आशा बताती हैं कि 7वीं में पढ़़ते हुए क्लास के किसी सहपाठी ने ताना देते हुए कहा था कि ‘‘मैं कितनी ही मेहनत कर लूँ, होशियार विद्यार्थियों में शामिल नहीं हो सकती हूँ।’’

 

उस साथी के इस तंज से मैं दुःखी जरूर हुई, परन्तु इसी क्षण ने तुरंत अपना आत्मलोकन करने का मौका भी दिया था। तब मैंने उस सहपाठी से नहीं, स्वयं से प्रश्न पूछा था कि ‘‘होशियार बच्चों में मैं क्यों नहीं शामिल हो सकती हूँ?’ और मेरे नन्हे मन-मस्तिष्क ने सीधे उत्तर दिया कि ‘‘मेरी मेहनत उस स्तर को पाने लायक अभी नहीं हुई है। लिहाजा, मुझे और मेहनत और लगन से अपनी पढ़ाई-लिखाई करनी होगी। तभी मैं उस साथी को गलत साबित कर सकती हूँ।’’

 

‘‘जीवन का यह क्षण मेरे लिए निर्णायक साबित हुआ। और, मैंने स्वयं महसूस किया कि अब मैं वैसी नहीं, जैसी उस साथी के तंज से पहले थी। मेरे अन्तर्मन में आत्मविश्वास की एक नई ताकत का संचार हो चुका था।सौभाग्य से मेरे आत्मविश्वास को सही दिशा में गतिशील करने के लिए मेरे शिक्षक पिता और अन्य परिवारजन आत्मीय मार्गदर्शी की भूमिका में मेरे साथ थे।’’

 

‘‘उक्त घटना का ही प्रभाव था कि अब मुझे पढ़ना-लिखना और रुचिकर लगने लगा। ये सच है कि जीवन में जो भी कार्य रूचिकर लगने लगता है, उससे थकान कोसों दूर रहती है। मेरी मेहनत रंग लाई और 7वीं कक्षा में मुझे प्रथम स्थान मिला। यह मेरे दोस्तों और सहपाठियों के लिए आश्चर्यजनक था, लेकिन मैं इसके लिए पूरी तरह से आश्वस्त थी।’’

 

‘‘मैं यह जानती थी कि मंजिल अभी दूर है और ऐसे कई कठिन पड़ाव मुझे सफलतापूर्वक पार करने हैं। मेरी इस प्रारम्भिक शैक्षिक जीवन यात्रा के मुख्य सारथी मेरे पिता थे, जो मुझे चिन्ता नहीं, निरंतर चिन्तन-मनन करने का गूढ़ मंत्र समय-समय पर देते रहते थे। वे समझाते कि शिक्षा व्यक्ति की मूल अभिवृत्ति को सही दिशा में क्रियाशील करने की सामर्थ्य एवं योग्यता को विकसित करती है। अतः जीवन के लिए शिक्षा सर्वोपरि है। विद्यालयी शिक्षण के इतर जहाँ से भी मेरी अध्ययनशीलता को मदद मिल सकती थी, वो प्रयास उन्होने किए।”

 

“अब ओंकारानन्द विद्यालय, जखोली के होशियार विद्यार्थियों की पहचान मेरी थी। परिणामस्वरूप, हाईस्कूल (2016) में 84 प्रतिशत और इण्टरमीडिएट (2018) में 80 प्रतिशत अंकों के साथ मैंने सम्मान के साथ परीक्षा उत्तीर्ण की।’’

 

इण्टरमीडिएट के बाद आशा डाक्टर बनने के सपने के साथ देहरादून आई। पहले प्रयास में सफल नहीं हुई। लेकिन, उसके पिता ने उसका हौंसला नहीं टूटने दिया। आशा ने भी अपने पिता, परिवार और शिक्षकों के विश्वास को कायम रखा। वह बखूबी जानती थी कि देहरादून वो केवल डाक्टर बनने के सपने के साथ आई है। इसलिए, पढ़ाई के अलावा घूमना-फिरना और मौज-मस्ती उसकी दिनचर्या में थे ही नहीं। उसने अपने मन को कसकर बाँध लिया और मस्तिष्क को पूर्णतया मेडिकल की तैयारी के लिए सक्रिय कर दिया था। देहरादून 2 साल रहने के बाद भी उसके लिए एक अजनबी शहर ही रहा।

 

निरन्तर कड़ी मेहनत और अभ्यास से दूसरे प्रयास में उसे सफलता हासिल हुई। एमबीबीएस पढ़ाई के लिए 2018 में वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली राजकीय आयुर्विज्ञान शोध संस्थान, श्रीकोट, श्रीनगर (गढ़वाल) में उसे प्रवेश मिला।

 

जीवन में सब कुछ मन के मुताबिक नहीं होता है। जीवनीय लक्ष्यों की ओर अग्रसर आशा ने अपनी मेडिकल की पढ़ाई के दौरान कई पारिवारिक आघात सहे। परिवार के प्रमुख आधार स्तम्भ बड़े चाचा (2017), पिता (2019) और छोटे चाचा (2024) का इस दौरान असमय देहान्त हो गया।

 

आशा बताती है कि ‘‘बहुत कम अंतराल में हुए इन तीन प्रमुख आघातों से हर कोई अवा्क था। इसके अलावा अन्य कई दिक्कतें मेरे पारिवारिक दुःखों को और गहरा कर देती थी। एक कष्ट से उभरते तो दूसरा चला आता। तब लगता कि सारे परिवार का जीवन यहीं ध्वस्त हो गया है। माँ, दोनों चाची और सबसे बढ़कर दादा-दादी के लिए यह अकल्पनीय दुःख था। जीवन के सांध्यकाल में जब सहारे की उनको जरूरत थी, वे निपट बेसहारा हो गए। हम कच्ची उम्र के 10 भाई-बहिन अपनी सूनी आंखों से उनकी ही पथराई आंखों में अपना सहारा ढूढने लगे।”

 

“लेकिन, ये बात भी सच है कि दुःख तोड़ता है, तो उसे फिर से जोड़ने की ताकत भी स्वतः देता है। मेरे 10 भाई-बहिनों के कुटम्ब ने एक-दूसरे को सहारा देते हुए अपने बुर्जुगों को भी ढाढस दिया। साथ ही, मेरी पढ़ाई पर कोई आँच नहीं आने दी।’’

 

डा. आशा ने मेडिकल काॅलेज, श्रीनगर (गढ़वाल) से 2022 में एमबीबीएस की उपाधि लेने के बाद वहीं से इंटर्नशिप (2023) और जूनियर रेजीडेन्ट डाक्टर (2024) के पद पर कार्य किया। तत्पश्चात, उनका 2025 में यात्राकाल के दौरान केदारनाथ और उसके बाद राजकीय सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र, जखोली में चिकित्साधिकारी के पद पर चयन हुआ।

 

डा. आशा बताती हैं कि ‘‘बचपन से मैंने अपने आस-पास के सामाजिक परिवेश में शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और सुविधाओं का अभाव महसूस किया। कहीं बाल्यमन में डाक्टर और शिक्षक बनने की अभिलाषा ने यहीं से अंकुर लिया था। संयोग से मैं चिकित्सक बनी और अगर ये न होती तो शिक्षक बनने का प्रयास करती। आज भी मैं चिकित्सा क्षेत्र में एक शोधार्थी के रूप में उच्च शिक्षा लेने के लिए प्रयासरत हूँ।’’

 

डा. आशा का मानना है कि आज भी हमारा पहाड़ी समाज स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूक नहीं है। विशेषकर, महिलायें इस ओर चिन्ताजनक स्थिति तक लापरवाह दिखती हैं। अपने परिवार की जिम्मेदारियों के प्रति जरूरत से ज्यादा वे कार्यशील रहती हैं। महिलाओं की कार्य की दशायें कष्टप्रद और बोझयुक्त हैं। जिस कारण अक्सर शारीरिक दर्द, बुखार, सिरदर्द, ब्लड प्रेशर, खून की कमी आदि से वे पीड़ित रहती हैं। ये सब होने पर भी वे डाक्टर से सलाह लेने में कतराती हैं। इसके बावजूद भी अस्पताल आने वाले मरीजों में 60 प्रतिशत की संख्या महिलाओं की होती है।

 

अतः जरूरी है कि महिलाओं में स्वास्थ्य जागरूकता और उनके कार्य के समय को कम एवं तरीकों को सरलीकृत किया जाए। डा. आशा यह स्वीकारती हैं कि युवा महिलाओं और नवयुवतियों में स्वास्थ्य चेतना पनपी है। लेकिन, अधिक सुंदर और मार्डन दिखने की अत्यधिक चाह की प्रवृत्ति के प्रति उन्हें सचेत रहना चाहिए।

 

डा. आशा गम्भीरता से कहती हैं कि ‘‘जीवन की सार्थकता तभी है जबकि हमारी जीवनीय उपलब्धियाँ सामाजिक हितों के अनुकूल हों। अतः अपनी व्यक्तिगत सफलता को सामाजिक विकास से जोड़ना हमारा जीवनीय लक्ष्य होना चाहिए। तभी एक सुखी, सम्पन्न, समृद्ध, सामाजिक समानता और समरसता वाले समाज को हम बना पायेंगे।’’

 

एक आत्मीय और सार्थक बातचीत के विराम के बाद हम घर के बाहर चौक में हैं। डा. आशा के दादा-दादी के आस-पास बच्चे खेल रहे हैं। समय के क्रूर कालचक्र ने इन बुर्जुग दम्पत्ति से जो छीना उसकी कल्पना ही भयावह है। लेकिन, सब कुछ खोने के बाद भी जीवन रुकता नहीं है। वो अपनी स्वाभाविक गति ले ही लेता है। भविष्य की सुखद आशायें जीवन को जीवंत और प्रफुल्लित बनाये रखती हैं। बच्चों की किलकारियों के साथ इन बुर्जग पति-पत्नी की खिलखिलाती उन्मुक्त हंसी तो यही सिखाती है।

………………………..

3 मई, 2026, जखोली, (रुद्रप्रयाग), उत्तराखण्ड

………………………….

संपर्क – अरुण कुकसाल, ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163  पट्टी- असवालस्यूॅं, विकासखण्ड- कल्जीखाल, जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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