सीमांत जनपद रैथल गांव के एक युवक पर भालू ने हमला किया और उसे बुरी तरह जख्मी कर दिया। तकरीबन चार महीनों से भालूओं की बड़ी मौजूदगी गांव में देखी गई है।
पिछले हफ्ते भालू के साथ मेरा खुद आमना सामना हुआ, घर के बगल में बोई सब्जियों को भी भालू हर दो चार दिन में आकर तहस नहस कर जाता है। भालू का खौफ ऐसा कि शाम ढलते ही लोग घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, यह सिर्फ मेरे गांव की कहानी नहीं है, सुबह अखबार खोलिए पहाड़ के हर गांव की व्यथा बन चुकी है। सोशल मीडिया खोलिए भालू के हमलों, भालू की मौजूदगी के वीडियो आपकी टाइमलाइन पर आते रहते हैं। भालू की मौजूदगी ने इस कदर खौफ पैदा कर दिया है कि जैसे एक वक्त कोरोना का था। कोरोना के उस दौर में अखबारों से लेकर सोशल मीडिया, आम बातचीत, चाय की दुकानों, चौक चौहारों, सार्वजनिक वाहनों में सफर के दौरान सिर्फ चर्चा कोरोना के खौफ और उससे हो रही मौतों की ही होती थी ठीक वैसा ही हाल अब है, बस कोरोना की जगह भालू ने ले ली है।
आप गढ़वाल के किसी गांव में रहते हैं तो आप आसानी से महसूस कर सकते हैं कि भालू ने पहाड़ियों की आम जिंदगी को कितनी बुरी तरह से प्रभावित किया है, महिलाएं जंगल नहीं जा पा रही है, खेतों में जाने से पहले सोचना पड़ रहा है, सूरज अस्त होते ही घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं और गांव की गलियां सूनी पड़ रही है। भालू के हमले से घायल लोगों की तस्वीरें दिल दहला देने वाली होती है।
इन सबके बीच एक सवाल उठता जा रहा है कि सरकार क्या कर रही है। आपको क्या लगता है कि भालू के आतंक से बचाने के लिए सरकार क्या कर सकती है। क्या आपको लगता है कि भालू को आदमखोर मानकर वन विभाग उसे मारना शुरू कर देगा, क्योंकि भालू आदमखोर नहीं है बस वह इंसान से आमना सामना होने पर इंसान पर हमला कर देता है और वन विभाग के लिए वह संरक्षित प्रजाति का जीव है इसलिए वह उसे मारने का अभियान नहीं चला सकता है। सरकार क्या कर सकती है, सरकार सिर्फ एक एडवायजरी जारी कर सकती है कि आम लोगों को क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए, वह भालू के हमले में मृत और घायलों को मुआवजा दे सकती है, वह गांव गांव में सूचना के बोर्ड लगा सकती है कि अंधेरे में घर से न निकले, जंगलों में अकेले न जाएं, झाड़ी वाले इलाकों से न गुजरे, जहां भी जाएं झुंड में जाए, बस सरकार इतना ही कर सकती है।
भालुओं की आबादी में दस्तक के कई कारण है, जलवायु परिर्वतन के कारण उनकी शीतनिंद्रा का क्रम टूटा है, सर्दियों की अवधि कम हुई है, बर्फवारी नहीं हो रही है और मौसम में गर्माहट की वजह से उनकी शीतनिंद्रा की साइकिल बाधित हुई है, मानसून के दौरान भारी बारिश और वसंत में बर्फवारी के कारण जंगलों में जंगली फलों का उत्पादन खत्म हो गया है, जंगलों में उगने वाले फलों, कंद मूल से भालू अपनी खुराक पूरी करता था लेकिन जलवायु परिर्वतन के कारण इनका उत्पादन प्रभावित हुआ है तो वह आबादी के इलाकों में खाने की तलाश में आ गया, आबादी के इलाकों में खाने का भरपूर मिल रहा है तो वह आबाद इलाकों के इर्द गिर्द ही अपना ठिकाना बनाने लगा है।
कुछ सालों पहले तक भालू के पित्त की अंतराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग थी और उसकी अच्छी कीमत मिल जाती थी लिहाजा भालू का अवैध शिकार भी खूब होता रहा। गलवान झड़प के बाद चीन भारत के बीच संबंध बिगड़े तो जानवरों के अंगों की तस्करी का रास्ता भी बंद हो गया, लिहाजा वन तस्करों ने पित्त के लिए भालुओं का शिकार करना बंद कर दिया और शिकार बंद हुआ तो भालू की आबादी में इजाफा हुआ। एक मादा भालू दो बच्चों को जन्म देती है और अगले दो सालों तक बच्चों को अपने साथ ही रखती है। कुछ भी खाने में सक्षम भालू के जीवित रहने की संभावनाएं बाकी अन्य जानवरों की तुलना में ज्यादा होती है, भालू शाकाहारी और मासांहारी दोनों तरह के उत्पादों को खा लेता है और उसे शिकार करने की भी जरूरत नहीं पड़ती लिहाजा उसके सामने भूखे मर जाने की संभावनाएं कम होती है।
भालू का खौफ खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है, घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। ऐसे में न तो वन विभाग न ही सरकार के पास इस खौफ से लोगों को राहत देने का कोई रास्ता है तो अब रास्ता लोगों को खुद ही बनाना होगा,
तो सरकार के भरोसे मत बैठो क्या पता सरकार आपके भरोसे बैठी हो…







