उप चुनाव : भाजपा को कांग्रेस ने दी पटकनी, जीती दोनो सीटे।
उत्तराखंड में हुए हाल ही में उपचुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी के चेहरे की झुर्रियां इस वक्त स्पष्ट दिखाई देने लग गई है। उन्हें ऐसा एहसास नहीं था कि वह इन दोनों उपचुनाव को हार जाएंगे। कारण जो भी हो लेकिन एक बात स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी के बड़ बोल इस चुनाव में भी काम नहीं आए हैं। उन्हे कांग्रेस के दोनो प्रत्याशियों ने ऐसी पटकनी दी की जिसे वे कभी भूल भी नही सकते।
बद्रीनाथ विधानसभा की बात करें तो बद्रीनाथ विधानसभा में हमेशा ही राजेंद्र सिंह भंडारी का ही दबदबा रहा है। वह लंबे समय तक कांग्रेस के कार्यकर्ता रहे हैं और कांग्रेस की रीति नीति के अनुसार उन्होंने काम किया है यहां तक कि वह बद्रीनाथ विधानसभा में लोकप्रिय नेता भी कांग्रेस के बैनर पर ही रहे है। यह अलग मसला है कि ऐन वक्त राजेंद्र भंडारी ने अपना चोला बदल दिया। अचानक पिछले दिनों लोकसभा चुनाव में एक रात में ही राजेंद्र सिंह भंडारी ने जब अपना चोला बदला तो वे अल सुबह भगवा रंग में रंगे हुए दिखाई दिए। बद्रीनाथ विधानसभा की जनता चौक गई और समझ नहीं पा रही थी कि जो राजेंद्र भंडारी लगातार भाजपा को कोसता नजर आ रहा है वह अब भाजपा की गोद में कैसे बैठ गया?
बस यही से शुरू हुई राजेंद्र भंडारी की उल्टी गिनती और उपचुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी के बैनर पर उन्होंने चुनाव लड़ा तो उन्हें कांग्रेस के ही युवा नेता लखपत सिंह बुटोला ने पटकनी दे दी। चौंकाने वाले तथ्य यह है कि यह कम वोटो से नहीं बल्कि 24155 मत अपने पक्ष में करवाकर लखपत सिंह बुटोला ने राजेंद्र सिंह भंडारी को चुनाव हारने का एहसास तो करवा ही दिया है। इधर राजेंद्र भंडारी को बद्रीनाथ विधान सभा की जनता ने जता दिया कि कब तक झूठ के बलबूते जनता को गुमराह करोगे। बद्रीनाथ की जनता ने यह भी बताने का प्रयास किया कि रातों-रात चोला बदलने के कारण आपकी राजनीतिक पिच भी खराब हो सकती है। इधर भारतीय जनता पार्टी के कई नेता ताल ठोक कर कह रहे थे कि बद्रीनाथ और मंगलौर सीट पर उनकी जीत होनी निश्चित है। जिस पर जनता ने मतदान करके करारा जबाब दिया है।

कुलमिलाकर मोदी का जादू है और युवा मुख्यमंत्री धामी का प्रदर्शन यहां काम नहीं आया है।
मंगलौर विधानसभा सीट पर राज्य बनने के बाद से ही काजी निजामुद्दीन परिवार का लगातार कब्जा रहा है। काजी निजामुद्दीन कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक माने जाते हैं।
अतएव जहां से उत्तराखंड की सरहद शुरू होती है, वहीं से मंगलौर विधानसभा आरंभ होती है। बस! यही से उत्तराखंड की राजनीति का चरित्र सभी को देवभूमि का अहसास कराती है।
मौजूदा समय में हुए उपचुनाव को लेकर के जिस तरह की अराजकता मंगलौर सीट पर सामने आई वह चुनाव के काले इतिहास में लिखा जाएगा। चुनाव शांतिपूर्ण ना होने की वजह से मंगलौर विधानसभा की जनता लगातार डरी और सहमी रही है। यही वजह रही कि यहां चुनाव का मत प्रतिशत भी बहुत ज्यादा नहीं हो पाया है। भारी अराजकता और पुलिस की चौकसी के बीच हुए चुनाव में जहां भाजपा एक तरफा जीत की हुंकार भर रही थी, वहीं काजी निजामुद्दीन ने फिर से भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी को 449 मतों से पराजय किया है।
दिलचस्प यही है कि भारतीय जनता पार्टी ने धीरे-धीरे अपनी साख खोनी आरंभ कर दी है। बद्रीनाथ और मंगलौर विधानसभा के उपचुनाव यही बता रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी की गतिविधियां जनहित में नहीं हो रही है। कांग्रेस का आरोप है कि लोगों को धर्म और जाति के नाम पर लडाने वाली भारतीय जनता पार्टी को लोगो ने इस उप चुनाव में बता दिया कि धर्म और जाति के नाम पर नही बल्कि विकास के नाम चुनाव जीते जाते है।







