Sunday, June 28, 2026
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ब्लड डोनेशन का अनुभव साझा कर रहे है वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन बिष्ट। विचार एक नई सोच द्वारा आयोजित ब्लड डोनेशन कार्यक्रम।

डेढ़ साल की अवधि में आज फिर तीसरी बार रक्तदान करने का अवसर मिला। रक्त इंसानी जीवन के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि हवा और पानी। हवा और पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कई वैकल्पिक इंतजाम हो चुके हैं लेकिन खून एक ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है जिसका आज तक कोई विकल्प नहीं है। यानी किसी इंसान को यदि खून की आवश्यकता पड़ती है तो उसको इंसान का ही खून चाहिए होता है।
अमोलाज रेस्टोरेंट में आज “विचार एक नई सोच” सामाजिक संगठन द्वारा आयोजित ब्लड डोनेशन कैंप मैं दूसरी बार रक्तदान करने का अवसर मिला। जब डॉ एस जोशी और डॉ सयाना जी ने रक्तदान के महत्व पर बात रखी तो बरबस ही कुछ पुराने प्रसंग जेहन में उतर आए।
उस दौर में देहरादून में सिर्फ दो ही बड़े अस्पताल होते थे। एक था सरकारी दून अस्पताल और दूसरा सीएमआई। पहाड़ से भी ज्यादातर मरीज इन्हीं दो अस्पतालों में आते थे। एक बार तो हिमनी गांव से अमर सिंह बूबू आए। उनकी बेटी को बहुत बड़ी समस्या हो गई थी और उसका खून ही नहीं बन पा रहा था। खून की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती थी। मैं दून अस्पताल के परिसर में ही इस समस्या के समाधान के लिए सोच रहा था, तभी मेरे मित्र कर्नल एमके जोशी जो उस समय यहां देहरादून में एनसीसी की 11th गर्ल्स बटालियन के सीओ थे, का फोन आ गया।
कर्नल साहब ने कहा, अरे परेशान मत होइए। मैं करता हूं कुछ व्यवस्था। उन्होंने दूसरे दिन एनसीसी की करीब 20 लड़कियों को दून अस्पताल भेज दिया। कैडेट्स की कम उम्र और हीमोग्लोबिन की समस्या के कारण ज्यादातर लड़कियां रिजेक्ट हो गई। मगर दो या तीन यूनिट खून का इंतजाम आसानी से हो गया। उस दौरान कई बार दून अस्पताल के डॉक्टरों की मदद से कम से कम 4-5 लोगों के लिए खून का इंतजाम करवाया। दवाइयां और दूसरी मदद तो पता नहीं कितने लोगों को दिलवायी होगी।
आप में से बहुत सारे साथियों ने भी अस्पतालों में ऐसे ही अनगिनत लोगों की मदद की होगी।
इस पोस्ट को लिखने का बस एक ही कारण है। आज अस्पतालों में बहुत सारे ऐसे लोग पहुंच रहे हैं जिन्हें बचाने के लिए खून की आवश्यकता पड़ती है। आए दिन सड़क हादसों में न जाने कितने लोग घायल होकर अस्पतालों में पहुंचते हैं। ऐसे लोगों को दवाई से पहले खून की ही जरूरत पड़ती है।
दवाई आदि की व्यवस्था तो सरकार या कोई व्यक्तिगत रूप से भी कर सकता है, लेकिन खून एक ऐसा तत्व है, जिसकी पूर्ति मानवीय खून से ही हो सकती है।
एक और दिलचस्प बात। मनुष्य अपने शरीर से करीब करीब 50 अंगों या तत्वों को दान देकर दूसरे की जान बचा सकता है, लेकिन खून एक ऐसा तत्व है जिसकी शायद अस्पतालों में सबसे अधिक न केवल आवश्यकता है बल्कि उसको डोनेट करना भी सबसे आसान है।
यह वैज्ञानिक तथ्य है कि हमारे रक्त की कोशिकाएं और प्लेटलेट्स 180 दिन के बाद बेकार हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई कोशिकाएं और प्लेटलेट्स बनती है। इसलिए रक्तदान से हमारे शरीर को किसी तरह का नुकसान भी नहीं होता। 6 महीने की अवधि में हम जो रक्तदान करते हैं वह वैसे भी नए रक्त से रिप्लेस हो जाता है।
आज के कार्यक्रम डॉक्टर अनिल वर्मा भी एक मुख्य आकर्षण थे। वर्मा साहब अपने जीवन में डेढ़ सौ से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं और 72 वर्ष की उम्र में भी उनके चेहरे की ताजगी बताती है कि रक्तदान इंसान को स्वस्थ और तरोताजा रखने के लिए भी कितना काम करता है।
एक बार फिर से विचार एक नहीं सोच के साथ ही उन सभी संस्थाओं को साधुवाद जो समय-समय पर रक्तदान करा कर इंसान की जान बचाने का महान व पुनीत कार्य कर रहे हैं।
आइए हम सभी संकल्प लें कि अस्पतालों में आने वाला कोई भी व्यक्ति कम से कम खून की कमी से जान गंवाने को मजबूर न हो।
विचार एक नई सोच के सभी साथियों को लेखक की ओर से हृदय के तल से आभार एवं बधाई।

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