Saturday, September 12, 2026
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स्त्री विमर्श पर खास है, गीता गैरोला की पुस्तक “अनहद गूंजे नाद”

By – Vibha Pokhriyal Naudiyal

मेरी बात:

“जीवन भर हम कुछ लोगों से मिलते नहीं हैं बस उनको सुनते हैं, उनको पढ़ते हैं और बिना मिले भी उनको अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानने लगते हैं । आदरणीय ” गीता गैरोला जी” जिनको मैं स्वयं ही ‘गीता दीदी’ बोलने लगी हूं ,उत्तराखंड के एक छोटे से गांव से बचपन की दुश्वारियों से जूझते हुए एक लड़की जो समाज में एक अच्छी सामाजिक कार्यकर्ता , एक अधिकारी, एक मां, और सबसे महत्वपूर्ण एक संवेदनशील स्त्री जिसे प्रकृति ने हर दुःख दिया ताकि वह कुंदन सी निखरकर उभरे और उत्तराखंड की ग्रामीण महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बने। आपने हर किरदार को बड़ी शिद्दत से जिया है और आपका यही जुझारूपन आपको आपके कठिन समय अर्थात बीमारी से भी बाहर खींचकर लाया है आप सच में साधुवाद की पात्र है””

“गूंजे अनहद नाद” को अपने बिजी शेड्यूल से कुछ वक्त चुराकर आखिर आज मैंने पूरा कर ही लिया। बीमार को बीमारी उतना नहीं मारती जितना मारता है या भ्रष्ट सिस्टम, अपनों का रवैया और लचर स्वास्थ्य व्यवस्था।किताब के एक एक शब्द को इस प्रकार बुना गया है मानो लेखक ने अपना दिल खोल के रख दिया हो।खोखले रिश्तो की सच्चाई, सिस्टम की मार , अस्पतालों की बीमार व्यवस्थाएं मध्यमवर्गीय परिवारों की फाइनेंसियल स्थिति और उन रिश्तो का समर्पण जिन्हें शायद हमारा तथाकथित सभ्य समाज रिश्तो में गिनता ही नहीं।

बीमारी के दौरान भी लेखक के अंदर का सामाजिक इंसान कभी हारा नहीं। अस्पतालों में मरीजों के अधिकारों को लेकर साफ-सफाई को लेकर हंगामा खड़ा करना हो या अपने कार्य क्षेत्र में अपने साथियों को अपनी बीमारी के बारे में ना बताने की बात हो लेखिका ने बखूबी से कठिन यात्रा को पूर्ण किया है।व्यक्तिगत संबंधों में खोखलेपन को भी लेखिका ने मूर्त रूप दिया है तो वही स्त्री सुलभ गुणो से ओतप्रोत जीवन के प्रति आशा और जुझारूपन मानो लेखक को सामान्य महिलाओं में खास बनाती हो।

कुछ अंश किताब से ज्यों के त्यों —–

“जब इतना बड़ा साफ सुथरा कैंसर अस्पताल बनाया है तो कैंसर के मरीजों के सारे टेस्ट भी रिसर्च इंस्टिट्यूट वाली इमारत में ही होने चाहिए । इतनी लंबी लाइनों ने बाद के दिनों में मुझे बहुत थकाया ।हमेशा सोचती रहती अस्पताल की इमारत बनाने वाले आर्किटेक्ट बीमारों की हालत को देखकर डिजाइन क्यों नहीं बनाते होंगे?? मुझे इमारत को डिजाइन करने वाले आर्किटेक्ट के कोर्स की किताबें टटोलने का मन करने लगा। वास्तव में जब बिल्डिंग का नक्शा बनाया जाता है उसमें बिल्डिंग कोड और बनवाने वाले की जरूरत को समझ कर डिजाइन किया जाता है। यहां पर उपयोग करने वालों की कोई सुध नहीं होती ।उन किताबों में यह लिखा होना जरूरी है कि जिस बिल्डिंग को डिजाइन कर रहे हैं उसका नक्शा बना रहे हैं वह किन बीमारियों की सुविधा के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है ।आर्किटेक्ट कोर्स में बीमारों की हालत को समझकर इमारत डिजाइन किए जाने के पाठ्यक्रम होने जरूरी है पर ऐसा नहीं होता इस तरह की अवधारणाएं हमारी व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था में सिरे से गायब है”
लेखक का व्यावसायिक पाठ्यक्रम की ओर इतना चिंतन उनका समाज के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को आईना दिखाता हुआ प्रतीत होता है

“अचानक यह कैंसर कहां से आकर मुझसे चिपक गया इसने जिंदगी के ऐसे पलों पर हमला किया जो नितांत मेरे अपने थे जिनका मुझे शिद्दत से इंतजार था, जिन्हें मुझे अपने लिए जीना था अपने पास रखी छोटी सी जमा पूंजी को खुद अपने लिए खर्च करना था किसी बीमारी के इलाज में खर्च नहीं करना था”

एक स्त्री के अंदर छुपा हुआ स्त्री सुलभ आकांक्षाएं , जीने की चाह उक्त पंक्तियों में बखूबी सिमटी हुई है

“देखो रजनी कैंसर के मरीजों में भी जेंडर गैप दिख रहा है सारे मरीजों में स्त्रियों की संख्या ज्यादा है मन ही मन हंसते में सोचा तो कैंसर भी स्त्रियों पर ही ज्यादा मेहरबान है”
यह व्यंग समाज की कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है जहां महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर आंखें मूंदे पड़े रहते हैं।

एक साथ की कैंसर पेशेंट युवा लड़की की मां से हुआ संवाद दिल को झकझोर देने वाला है-
: “ब्याह के बाद पता चला कि कुसुमी की छाती में बहुत बड़ी गांठ बनी है इस निर्भागी छोरी ने शर्म के मारे मुझे पहले कभी नहीं बताया, दीदी पीड़ा होती तब तो बताती ना, बिना पीड़ा की गुठली थी। उसका जमाई टिहरी बाजार के अस्पताल दिखाने ले गया वह डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए बोला इसका इलाज यहां इस अस्पताल में नहीं हो सकता ऋषिकेश के बड़े वाले अस्पताल जौलीग्रांट में दिखाओ। यहां पर डॉक्टरों ने देखते ही ऑपरेशन करके गुठली निकाल दी जिस समय ऑपरेशन हुआ उसका जमाई, सास ससुर भी साथ रहे ,गुठली के टेस्ट करने के बाद जैसे ही मालूम हुआ ये कोई छोटी बीमारी नहीं थी, मेरी छोरी को कैंसर हो गया था लंबा इलाज चलेगा इसके बाद सब ने साथ छोड़ दिया इसका पति कमबख्त कभी नहीं आता ।मैं कैसे छोड़ दूं अपनी इस छोरी । इतनी बड़ी बीमारी से पता नहीं बचती भी है कि नहीं जो कुछ मेरे पल्ले में था सब लगा दिया इसके आगे उसका गला रूठ गया और अपनी आंखों से बहते आंसू को रोकने की कोशिश करते हुए धोती के पल्लू को मुंह में भींच दिया”

“अस्पताल शांत होने चाहिए जहां पर मुर्दों जैसी शांति नहीं जीवंत शांति होनी चाहिए लोग आध्यात्मिक शांति की बात भी करते हैं पर ऐसी किसी शांति के बारे में मेरा अनुभव नहीं है लेकिन अगर आध्यात्मिक शांति होती है तो उसके अस्पताल जैसी जगह में बहुत जरूरत है प्रत्येक अस्पताल के वार्ड में हरिशंकर चौरसिया की मध्यम बांसुरी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई सुबह लक्ष्मी का विष्णु सहस्त्रनाम विथोवन की सिंफनी कुमार गंधर्व के कबीर गायन किशोरी अमंवकर की धुन बजती रहनी चाहिए जिन्हें सुनकर दर्द और भी साथ में डूबे लोग दुनिया की सुंदरता स्वर लहरियों के साथ गोते लगाते जिंदगी के राग आत्मक लहरों को लम्हों को जी सके पता नहीं यह अवधारणाएं का आकार लेंगे की अस्पताल दुनिया की सुंदर तक जगहों की तरह विकसित किए जा सके जहां लोग अपने जीवन के सबसे दर्दनाक दिनों को जिंदगी के अंतिम पलों को उत्कृष्टता के साथ गुजार सके यह सच है कि आप अस्पताल में ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध रहती है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सुविधाएं सामान्य लोगों कम आय वाले गरीब लोगों की पहुंच से हमेशा बाहर होती है उनके हिस्से गंदगी से भरे हिस्से आते हैं””

कितनी सटीक टिप्पणी लेखिका की कि,गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नहीं!जिस प्रकार लेखक सोचता है शायद और भी बीमार अस्पतालों में यही सोचते होंगे ऐसा प्रतीत होता है लाखों बीमारों की इच्छा को लेखिका ने आवाज दी है।

“लोग दवाई की कंपनियों बीमारियों पर सर्च करने वालों टेस्ट लैबोरेट्री बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पतालों हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी और विशेषज्ञ डॉक्टरों के जाल में उलझ कर रह गए हैं जिनके पास उलझनों के जाल हैं अस्पताल में सुविधाएं भी उन्हीं के पास होती है। बीमारी के दौरान मुझे इन अनुभवों से गुजरना पड़ा था।”

“समाज व धर्म यह तय करने वाला कौन होता है कि हम स्त्रियां कहां जाएंगे और कहां नहीं जाएंगी ?कौन से आयोजन उत्सव में शामिल होंगी ?कौन से स्थान उनके लिए वर्जित है?? जब जीवन को चलाने वाली इन व्यवस्थाओं में हम स्त्रियों की पूरी सहभागिता है तो किसी भी तरह के ढांचे हमारे होने को कैसे नकार सकते हैं! हमारी ताकत को दोयम दर्जे पर रखकर किन आधारों पर कमतर आंका जा सकता है? जब पुरुषों में युवा और बूढ़े सब इस कठिन यात्रा को कर सकते हैं तो इसी पहाड़ में हाड़ तोड़ मेहनत करने वालु जुझारू, निडर स्त्रियां जात क्यों नहीं जा सकती ? यही स्त्रियां घने जंगलों में पहाड़ों में अकेली घास और लकड़ी काट कर लाती है यात्रा की कठिनाई बताकर उनको नकारना पचता नहीं है। नंदा देवी राजा का पूरा इतिहास ऐसी किंवदंतियां से भरा पड़ा है जहां स्त्रियों की यात्रा में शामिल हो जाने से देवी नाराज हो गई थी'”

स्त्रियों के लिए दोयम दर्जे की राय रखने वाला यह पुरुष वर्ग अपने वर्चस्व के चलते कुतर्क देने में माहिर होता है
वह आगे कहती है –

“नंदा देवी राजजात में स्त्रियों को शामिल न किए जाने के लिए जितने मुंह उतनी किंवदंतियां प्रचलित हैं। वर्जनाओं को याद रख कर उनको मान्यता दिए जाने के बावजूद भी याद रखा जाना बहुत जरूरी है कि जिस देवी के डोली को ढोने में भक्त भक्ति भाव से ओतप्रोत रहते हैं वह देवी भी एक स्त्री ही है। नंदा शिव की पत्नी का दूसरा नाम है। पूरे महीने पूजा अर्चना के दौरान उसे भी तो महावारी होती ही होगी अब कहने वाले भक्तों का क्या,यह कहेंगे कि देवी महावारी के पाप से दूर रहती है। महामारी को पाप करने वाली दुनिया को यह बात याद रखनी चाहिए कि महावारी के पाप को ढोने वाली स्त्रियों के बिना यह दुनिया बिना संतान के निरवंशी मर जाएगी । इस दुनिया को बनाने और चलाने में हमारी आभा को कब स्वीकारोगे।”

सामाजिक चिंतन, बीमारी, ममतामई ह्रदय और एक अनुभवी कलम से उत्कृष्ट किताब निकलकर हम सबके बीच में उपस्थित है । एक ओर जहां बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए आशा की किरण है तो वही समाज को आईना दिखाती अपने और पराए का भेद करवाती कलम की ताकत का मूर्त रूप भी है ।
मैं “गीता गैरोला जी ” ( गीता दी)को अच्छे स्वास्थ्य की शुभकामनाएं देते हुए एक उत्कृष्ट लेखन की के लिए साधुवाद भी देती हूं और महिलाओं की सशक्त छवि प्रस्तुत करने के लिए एक बार पुनः धन्यवाद भी देती हूं।

आप किताब को अवश्य पढ़ें
“गूंजे अनहद नाद “
लेखिका – गीता गैरोला
प्रकाशक -संभावना प्रकाशन
मूल्य- ₹400
संपर्क+7017437410

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