पुस्तक : कुछ यादें कुछ किताबें (संस्मरण/समीक्षा)
लेखक : शशिभूषण बडोनी, देहरादून
समीक्षक – कृष्ण सुकुमार, रुड़की (उत्तराखंड
प्रथम संस्करण : 2025
प्रकाशक : काव्यांश प्रकाशन, ऋषिकेश
पृष्ठ : 200 मूल्य : 275/-
————————————————–
स्वयं को मूलतः पाठक मानने वाले देहरादून के जाने-माने लेखक और चित्रकार शशिभूषण बडोनी जी कहानी, कविता, बाल-लेखन और पुस्तक-अनुवाद के साथ ही साहित्यकारों से साक्षात्कार करने में भी साधिकार निपुण हैं जिसके चलते उनकी 51 साहित्यकारों के साक्षात्कार का एक संग्रह ‘भेद खोलेगी बात ही’ शीर्षक से लोकप्रियता हासिल कर चुका है। इसके अतिरिक्त चित्रकार होने के नाते पत्र-पत्रिकाओं में और पुस्तक-आवरण के रूप में तो उनके चित्रांकन छपते ही रहे हैं।
समीक्ष्य-पुस्तक ‘कुछ यादें कुछ किताबें’ में उनके 19 संस्मरण 5 आलोचनात्मक लेख और 24 पुस्तकों की समीक्षाएँ संगृहीत हैं। कहना न होगा कि बडोनी जी तूलिका के साथ-साथ शब्दों के भी चितेरे हैं और बड़ी सहजता और सरलता के साथ वे अपने संस्मरणों में संबंधित व्यक्ति या स्थान को पाठक के मन-मस्तिष्क के कैनवस पर चित्रांकित कर डालते हैं! जिस किसी के भी संपर्क में लेखक आया कि जिससे वह प्रभावित हुए बिना न रहा हो उसके व्यक्तित्व और कार्यों का ऐसा ख़ाका लेखक खींचकर रख देता है कि पाठक स्वयं भी उसका सामीप्य महसूस करने लगता है!
इसी तरह, जिस किसी समारोह में लेखक शामिल हुआ है या फिर किसी पर्यटन स्थल पर भ्रमण के लिए गया हो, उस जगह की विवरणात्मक रिपोर्टिंग इतनी सूक्ष्मता और दृश्यात्मकता के साथ की गयी है कि पाठक स्वयं को उसी जगह शामिल हुआ मानने लगता है!
उनके संस्मरण-खंड में एक ओर बाबा नागार्जुन, लीलाधर जगूड़ी और ओमप्रकाश बाल्मीक जैसे दिग्गज साहित्यकार शामिल हैं, वहीं दूसरी तरफ़ बनारस की यात्रा वृत्तांत सहित वहाँ की साहित्यिक बिरादरी का भी रोचक वर्णन है। अपनी बनारस यात्रा के दौरान लेखक की उपस्थिति एक बाल-सुलभ कुतूहल के साथ दर्ज होती है जो कि दिलचस्प है!
इस खंड में ही जीवन की विडंबना और विवशताओं को उकेरता ‘अपना कमरा’ जैसा सबसे हृदयस्पर्शी निजी-संस्मरण भी शामिल है, जो एक लेखक के सपनों के ध्वस्त और निर्माण के पहलुओं से होकर गुज़रता दिखाई देता है!
बडोनी जी स्वयं भी उत्तराखंड मूल के हैं, इसलिए और भी प्रमाणिक रूप से एक और उल्लेखनीय संस्मरण ‘शहर से गाँव की ओर’ में पहाड़ के लोगों के मुश्किल और कठोर जीवन का जीवंत अनुभव हमें मिल जाता है और उन लोगों के सुख-दुःख के चित्र हमारी आँखों में उतरने लगते हैं!
दिनेश पाठक की कहानी ‘देखना एक दिन’ पर बडोनी जी का एक आलेख केंद्रित है जिसमें बड़ी मार्मिकता के साथ पहाड़ी जीवन में स्त्री की न केवल दुर्गति का संवेदनशील चित्रण है बल्कि एक स्त्री की पहाड़ी जीवन में कितनी और क्या महत्ता है, इसे भी पूरी शिदद्त के साथ रेखांकित किया गया है।
बडोनी जी स्वभाव से प्रकृति-प्रेमी और घुमक्कड़ जीव हैं। इसलिए प्राकृतिक सौंदर्य से सम्मोहन-वश जहाँ भी अवसर मिलता है, प्रकृति का मनोहारी दृश्य अपने शब्दों में बाँधकर अंकित करने से नहीं चूकते!
‘सिनेमा का चस्का’ जैसा दिलचस्प संस्मरणाज के उम्र-दराज़ पाठकों को अपनी किशोर वय में सिनेमा के प्रति जूनून और नादानियों की हद का स्मरण कराते हुए उन पुरानी स्मृतियों में ले जाता है, जिससे हममें से अधिकांश अवश्य ही गुज़रे होंगे।
यह मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि बडोनी जी एक लेखक होने से भी पहले सचमुच एक संवेदनशील पाठक हैं। वे ख़ूब पढ़ते हैं और पढ़ते ही नहीं, उस पढ़े हुए को अन्य पाठकों के समक्ष भी इतनी सजगता के साथ रखते हैं कि पाठक भी संबंधित पुस्तक पढ़ने को विचलित हो उठे! प्रस्तुत पुस्तक के अपने आलोचनात्मक लेखों और समीक्षाओं में उन्होंने विभिन्न लेखकों की पुस्तकों का अत्यंत सारगर्भित और महत्वपूर्ण विवेचन किया है।
पुस्तक के समीक्षात्मक आलेखों में अलग-अलग लेखकों की 24 पुस्तकों से पाठक रूबरू होता है और वे सभी प्रतिष्ठित और जाने-माने लेखकों की हैं। यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि इसके माध्यम से लेखक एक प्रकार से पाठकों को न केवल इन पुस्तकों का रसास्वादन कराने में समर्थ है बल्कि इन के रचयिताओं की भी संक्षिप्त जानकारी देते चलता है। पुस्तक के कथ्य के साथ-साथ वह पुस्तक के लेखक की रचनात्मकता और कृतित्व को भी अपने शब्दों में बाँधता चलता है।
बडोनी जी के समीक्षात्मक आलेख अद्भुत हैं! वे जब किसी भी पुस्तक पर लिखते हैं तो उससे ऐसे अंश चुन-चुनकर पाठक के सामने परोसते हैं कि पूरी पुस्तक की झलक कल्पना में तैरने लगती है। पुस्तक में क्या-कुछ है, अपने चुनिंदा शब्दों को इस प्रकार चित्रात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं कि जो पाठक की कल्पना में सहज ही बैठ जाता है।
एक और लाभकारी बात यह है कि ये तमाम लेखक पर्वतीय-क्षेत्र के निवासी हैं और ये सभी पुस्तकें उपन्यास, कहानी, नाटक, कविता, साक्षात्कार और यात्रा-संस्मरण से संबंधित हैं, जिनमें पर्वतीय जन-जीवन का विस्तार से यथार्थ और सम्यक समावेश है और यहाँ ईमानदारी के साथ पहाड़ की समस्याओं और कठिनाइयों को पाठकों के समक्ष रखा गया है।
बडोनी जी की भाषा-शैली सीधी-सरल लेकिन प्रवाहशील है। वे लिखते प्रतीत नहीं होते, पाठक से सीधे बात करते मालूम पड़ते हैं! पाठक की उत्सुकता बनी रहती है और उसकी छाप मन-मस्तिष्क पर अंकित होती जाती है। इस का एक कारण यह भी है कि लिखते समय वे इस मामले में भी अधिकांशतः सजग दिखाई पड़ते हैं कि आलेख या संस्मरण अनावश्यक लंबा न हो और प्रयासरत रहते हैं कि वर्ण्य-विषय के मूलतत्व को खींचकर कम से कम शब्दों में ढाल सकें।
अंत में मैं यही चाहता हूँ कि ‘कुछ यादें कुछ किताबें’ अवश्य ही पढ़ी जानी चाहिए क्योंकि यह न सिर्फ़ एक विविधता भरी जानकारीपूर्ण किताब है बल्कि रोचक और पठनीयता से भरपूर भी है।







