Sunday, September 13, 2026
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‘डड्वार’: गढ़वाली समाज में सवर्ण-शिल्पकार के जातिगत द्वंद्व की प्रतिनिधि कहानी

‘डड्वार’: गढ़वाली समाज में सवर्ण-शिल्पकार के जातिगत द्वंद्व की प्रतिनिधि कहानी

@Dr Arun Kuksal

’’…एक दां डौर जिकुड़ा बैठि छै त बैठ्यीं रै ग्या। डड्वारा पैथर डड्येंणू रा, तौबि सौणुन ढोळ बजाँण नि छोड़ि। बिर्ति अंग्यट्यीं छै। जन माछों थैं कतगि बि ध्वा, वूं कि मछळ्याण नि बौग्द, तन्नि गैख्वी जिकुड़्यूं कु मैल कब्बि नि बौगि। न ये कि डौर ग्या। जात बड़ि च त कुकर्मि बि पुजे जाँद। सौणू भळु मनिख, जात्यू छ्वट्टू। मोंण्या मत्थि गैखौ खुट्टू सदनि रा।’’ (डड्वार: पृष्ठ-34)

गढ़वाळि साहित्यकार महेशानन्द ने जीवन में जो देखा, सोचा, मिला, समझा और भोगा उसे तटस्थ भाव से लिखा है। इसके लिए उन्हें अपनी रचनाओं में कोई साहित्यिक तिकड़म लगाने की जरूरत नहीं पढ़ी। इसीलिए, वे स्वीकारते हैं कि ‘‘बग्त निमि जाँद पंणि बग्ता घौ नि मौळ्दा। वे बग्तै धुकधुकि घौ बंणि जिकुड़म् ज्यूंदि रै ग्या।…म्यरि यूं क्थ्थोंम् जिकुड् चीरी वु बथ ब्वळीं छन जु आम समाजै समंणि नि ब्वळे सकेंद। यूं क्थ्थोंम् पिड़ा छ एक समाजै, जु समाज बरसू बटि कुंजण्या बंण्यू रा। जु सकळा बस्वै छा ये देसा। भस यांकि धुकधुकि रांद सदान।’’

Dadwar
Dadwar

महेशानन्द की रचनाओं को पढ़ना व्यवहारिक जीवन के असल सत्य के साथ अन्तःयात्रा करना है। सम्पन्न और सवर्ण घरों में जन्में-पले-बढ़े लेखक सामाजिक बिडम्बनाओं के दृष्टा बनकर प्रभावी साहित्यिक अभिव्यक्ति कर सकते हैं। परन्तु, जिसने उनको स्वयं सहा-भोगा होगा उस साहित्यकार के लेखन में दुराव-छिपाव की संभावना नहीं होती है। एक तरफ सामाजिक विसंगतियों को मात्र देखने तो दूसरी तरफ उनका सामना करते हुए भोगने यह अन्तर बेहद गहरा है। स्वाभाविक है कि इससे दोनों की जीवनीय दृष्टि और अभिव्यक्ति में भी गहरा अन्तर होगा।

महेशानन्द की कहानियाँ पहाड़ी जन-जीवन की कथा-व्यथा से पल्लवित हुई हैं। पहाड़ के भूगोल की तरह उनके कथानकों में उतार-चढ़ाव और घुमाव हर वक्त सजीव रहता है। उनकी कहानियाँ भले ही बोलती कम हों पर लोक जीवन के द्वंद्व, मर्म और दर्द की ‘चटाक’ उनमें बखूबी रहती है।

‘‘…ब्यौ-कारिजुम् गैख्वा ड्यरौंम् सीणू खुंणै ग्वरा उबरा अर खांणू खाउन वु सग्वड़ौम् य कुलणों। बाजि वनि कज्यणि। पीट पैथर ज्ये हूणू छ, पणि बीच पंचेतिम् वु धोति मूंजी बिटै कि पतळा फर भात वूं कि समंणि इन चुलै जांदि छै जन कोढ़ी थैं जिमाणी हून। अफु जन ब्वलेंद यि सात पांणि धुयीं हून। भाता डौळा बाजि दां माटम् रम्दे जांदा छा। सौणू मुक ऐथर त बोल, ‘काकी क्वी बात नी। धरतिम् पुड्यूं अन्न पबेतर छ’ जन्नि काकी फुंड जौ त वु बोळ, ‘काकी! त्यारा कतगा चरेतर छन…वे हम अंक्वै बिंगदां।’’ (डड्वार: पृष्ठ-37)

व्यक्ति का कटु अतीत जीवन-भर पीछा नहीं छोड़ता। वह छुपाना चाहता है, पर छुपा नहीं पाता है। वह उसे भूलना चाहता है तो वह और भी याद आने लगता है। वह प्रेरणा नहीं, प्रतिरोध का बोध कराता हुआ व्यक्ति को जीवन-भर अंदर से जकड़े रहता है।

कथाकार महेशानन्द को अतीत में मिली सामाजिक ठ्साकों की चुभन आज भी उतनी ही चुभती है। ऐसे में उनका लेखन उस जीवनीय चुभन में मरहम लगाता है। पाठक के लिए वे कहानियाँ हैं परन्तु उनके लिए अतीत के जीवंत छाया चित्र हैं।

सामाजिक अतीत महेशानन्द की कहानियों की पृष्ठभूमि को रचता जरूर है पर उसके मोह जाल से वे मुक्त हैं। भविष्य की चिन्ता से भी वे ग्रसित नहीं हैं। अतीत के बंधन और भविष्य की चिंता से ज्यादा वास्ता न रखते हुए उनकी रचनायें वर्तमान का हिसाब-किताब करती हुई लगती हैं।

अतीत और भविष्य के मुकाबले वर्तमान पर बात करना एवं लिखना ज्यादा चुनौतीपूर्ण और असज होता है। यह चुनौती कहानीकार महेशानन्द ने सहर्ष स्वीकारी है। और, यह मानना पड़ेगा कि उसमें वह खरे साबित हुये हैं।

‘‘गांव में डड्वार मांगने गई मेरी मां जब घर वापस आई तो उसकी आखें आसूओं से ड़बडबाई हुई और हाथ खाली थे। मैं समझ गया कि आज भी निपट ‘मरसा का झोल’ ही सपोड़ना पड़ेगा।…गांव में शिल्पकार-सवर्ण सभी गरीब थे इसलिए गरीबी नहीं सामाजिक भेदभाव मेरे मन-मस्तिष्क को परेशान करते थे।….मैं समझ चुका था कि अच्छी पढ़ाई हासिल करके ही इस सामाजिक अपमान को सम्मान में बदला जा सकता है। पर उस काल में भरपेट भोजन नसीब नहीं था तब अच्छी पढ़ाई की मैं कल्पना ही कर सकता था। पर मैंने अपना मन दृड किया और संकल्प लिया कि नियमित पढ़ाई न सही टुकड़े-टुकड़े में उच्च शिक्षा हासिल करूँगा। मुझे खुशी है कि यह मैं कर पाया। आज मैं शिक्षक के रूप में समाज के सबसे सम्मानित पेशे में हूं।’’

अध्यापक एवं साहित्यकार महेशानन्द का जन्म 15 नवम्बर, 1967 को किवर्स गांव, पैडुलस्यूं पट्टी, पौड़ी (गढ़वाल) में हुआ। महेशानन्द की माता सतरी देवी और पिता सन्तू लाल मिस्त्री का 3 बच्चों वाला एक आम पहाड़ी शिल्पकार परिवार था। पुश्तैनी लोहारगिरी और मिस्त्री के काम में उनके पिता की पूरे इलाके में ख्याति थी। इसके बावजूद रोज की कड़ी मेहनत-मजदूरी के बाद ही घर-गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह चलती थी। कभी कई दिनों तक काम का जुगाड़ नहीं बन पाया तो उनके परिवार को फाका-मस्ती में भी रहना होता था। गरीब परिवार के लिए यह जीवन का सामान्य हिस्सा भर था इससे समाज में किसी तरह की असामान्यता का बोध नहीं होता था।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने में महेशानन्द का साथ अभावों और सामाजिक विसंगतियों ने कभी नहीं छोड़ा। परन्तु अपने नाम के अनुरूप भगवान ‘महेश’ की तरह अभावों एवं अपमानों के घूंट उनकी पढ़ने और बेहतर जीवन जीने की ललक को कम नहीं कर पाये। हां, अतीत में भोगे गए यथार्थ के निशाँ आज भी उनके व्यक्तित्व में गहरी जड़ों के साथ पैठ बनाये हुए हैं। तभी तो जीवन के किन्हीं लम्हों में वे याद आते ही साहित्यिक लेखन की विविध विधाओं के पात्रों का रूप अपने आप ही ले लेते हैं।

पौड़ी-अदवानी सड़क मार्ग पर टेका स्थल के पास ही किवर्स गांव है। किवर्स आज भी खेती से सम्पन्न और लोगों से भरा-पूरा गांव है। समृद्ध खेती और पौड़ी नगर से नजदीकी का सुखद परिणाम यह रहा कि ग्रामीणों ने गाँव से पलायन कम किया है। बाँज-चीड़ से घिरा पहाडी ढलान पर बसा किवर्स गांव महेशानन्द के जीवनीय संघर्षों की दांस्ता को अपने में छुपाये हुए है।

बचपन से ही उनके लिए गरीबी और जातीय विभेद से पार पाना आसान नहीं था। जहाँ स्कूल में प्यास लगने पर पानी पीने के लिए सर्वण मित्रों से गुहार करनी पड़ती हो, शिक्षक जातीय भेदभाव की मानसिकता से ग्रसित हों फिर घर आकर रोज देर रात जीविका के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती हो वहाँ पढ़ाई कहाँ मायने रखती होगी। परन्तु महेशानन्द ने इस मिथक को तोड़ा।

महेशानन्द बेहतर जीवन के लिए पढाई और जीविका हेतु मेहनत-मजदूरी को साथ-साथ रखते हुए इंटर पास हुए तो आगे पढ़ने की कोई गुजांइश नहीं दिखी। तब अन्य पहाड़ी युवाओं की तरह रोजगार के लिए उनके पास ‘दिल्ली चलों’ की परम्परा को स्वीकारने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्हें दिल्ली के होटल लाइन में काम और पनाह दोनों मिली। सन् 1992 में शादी हो गई तो लगा गाँव के आस-पास रहकर रोजगार करना ठीक रहेगा। खेती, मजदूरी, बढ़ईगिरी और ठेकेदारी जो भी रोजगार मिला उसे अपनाया। खुशकिस्मती यह रही कि आगे पढ़ने की इच्छा कम नहीं हुई थी। प्राईवेट बी.ए. करने के लिए प्रयास जारी थे। दिन-भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद पूरी रात घर के ढ़ेपुर (कमरे और छत के बीच ढाईफुट की जगह) में लैम्पू जलाकर पढ़ना होता था। अगली सुबह पढ़ाई छोड पेट के लिए जूझना मजबूरी थी। एक किताब भी साथ रहती ताकि पढ़ने का कोई मौका खाली न जा पाये।

बी.ए. पास कर लिया तब भी बेहतर रोजगार कहीं नजर नहीं आया। मजबूरन, पुश्तैनी काम-धंधा ही आय का साधन रहा। बी.एड. में चयन हुआ तो आर्थिक तंगी सामने दरवाजा रोके खड़ी थी। मददगारों ने हौसला दिया तो बी.एड. के बाद विशिष्ट बीटीसी की उपाधि भी प्राप्त कर ली। उसी के बदौलत 1999 में प्राथमिक विद्यालय कनोठाखाल, पोखड़ा में शिक्षक के पद पर नियुक्ति हो गई। वर्तमान में राजकीय आदर्श उच्च प्राथमिक विद्यालय, कल्जीखाल, पौड़ी (गढ़वाल) में प्रधानाध्यापक हैं। अनेकों पुरस्कारों के साथ प्रतिष्ठित ‘शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार-2014’ से वे सम्मानित हैं।

साहित्यकार महेशानन्द की साहित्यिक यात्रा पत्र-लेखन विधा से आरम्भ हुई। महेशानन्द बचपन में पूरे गाँव-इलाके में ‘बढ़िया चिठ्ठी लिख्वार’ के नाम से लोकप्रिय थे। इसका फायदा यह हुआ कि गढ़वाली के लोक-शब्द, शब्द-विन्यास, शैली और प्रवाह उन अनपढ़ परन्तु जीवन की पढ़ाई में निपुण महिलाओं से स्वतः ही मिल गए जो उनसे चिठ्ठी लिखवाती थी। चिठ्ठी लिखवाने वाली महिला अपने दुखः-दर्द बोलती सुबकती रहती तो लिख्वार महेशानन्द के आंखों में भी आंसू होते थे। ताज्जुब तब होता जब वो परदेसी भाई या चाचा घर वापस आकर महेशानन्द से कहता कि भुला/बेटा तूने क्या चिठ्ठी लिखी मेरे तो पढ़ते हुए आसूँ आ गए थे।

इसी चिठ्ठी लिख्वार का एक पत्र सन् 1988 में दैनिक जागरण के ‘पाठकों के पत्र कालम’ में छपा। उसके कुछ दिनों बाद एक कविता भी प्रकाशित हुई तो लेखन की स्वाभाविक प्रतिभा ने अपनी राह पकड़ ली। उसके बाद पौड़ी से प्रकाशित गढ़वाली पत्र ‘खबरसार’ ने महेशानन्द को लिखने का प्लेटफार्म प्रदान किया।

महेशानन्द मूलतः कथाकार हैं। ‘डड्वार’, ‘औगार’, ‘उलार’ ‘लकार’ और ‘पराज’ उनके प्रकाशित कहानी संग्रह हैं। महेशानन्द ने कहानियों से इतर ‘स्वीलू घाम’ (निबंध संग्रह), ‘तैलु घाम’ (काव्य संग्रह), साहित्यकार विमल नेगी के साथ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ का गढ़वाली अनुवाद प्रकाशित रचना है। वे आज-कल ‘गढ़वाली-हिन्दी शब्दकोश’ एवं पहाड़ी महिला के जीवन-संघर्ष पर केन्द्रित ‘छिमला’ उपन्यास पर लेखन कार्य कर रहे हैं।

आज के गढ़वाली साहित्यकारों की भीड़ में महेशानन्द वाकई ‘महेश’ हैं। लुप्तप्रायः हो गए गढ़वाली शब्दों, लोकोक्तियों और उच्चारणों को बेहद संजीदगी और सहजता से उन्होनें अपनी रचनाओं में उकेरा है। आज हमारे परिवारों में गढ़वाली भाषा का ठिंया किंचित मात्र भी नहीं रह गया है। ऐसे में महेशानन्द की कहानियों के पात्र ठेठ गढ़वाली में मजे से संवाद करते नजर आते हैं। वे हिन्दीनुमा गढ़वाली नहीं वरन असल गढ़वाली भाषा मेें अपने चरित्र को जीवंत किए हुए हैं। यहां पर यह उल्लेख करना प्रसांगिक है कि गढ़वाली के नये लिख्वार महेशानन्द के साहित्य का गहराई से अध्ययन करें ताकि वे हिन्दीनुमा गढ़वाली लिखने से अपने को उभार सकने मेे सक्षम हो सकें।

‘डड्वार’ गढ़वाळी कहानी संग्रह में शामिल शीर्षक कहानी ‘डड्वार’ महेशानन्द की बहुचर्चित कहानी है। यह कहानी गढ़वाली समाज में शिल्पकारों की स्थिति, स्तर और मनोदशा को जानने-समझने की दृष्टि से एक प्रतिनिधि कहानी है। ग्रामीण गढ़वाली समाज में सवर्ण और शिल्पकारों के आपसी सामाजिक, आार्थिक और सांस्कृतिक पक्ष इसमें बिना लाग-लपेट के उजागर हुए हैं। साथ ही, गढ़वाली समाज को भविष्य की आहट से इस कहानी ने चेताया भी है।

महेशानन्द स्वीकारते हैं कि पाठकों के लिए यह कहानी है। परन्तु, मैंने तो इसमें अपने दुर्दान्त अतीत का एक हिस्सा भर ही लिखा है। जिसे मैंने देखा ही नहीं उसे भोगा भी है। सच ये भी है कि इसमें मेरी वेदना का अतिरेक नहीं वरन इससे इतर बहुत कुछ शेष रह गया है। जिनकी अभिव्यक्ति के लिए मुझे नये शब्दों को गढ़ना पड़ेगा।

‘‘हे सौण्वी सैणी! तु कतगा जिदमार छै। जब त्वेकु बोल्याळि कि मिन त्वे डड्वार नि दीण, त तु नप्प-नप्प क्य ढुकीं छै। चैता मैना तिन पसऽरू जूदा मंगण। मोरलू वे कु जौऽन तुम तीन कौऽडया कुजात लोगों थैं ये गौंमा बसा। मि अबऽरि हौर कामू मा बिळम्यूं छौं, हैंका दिन ऐ।’’ (डड्वार: पृष्ठ-37)

आज भी जातीय विभेद की जडें हमारे लोक समाज में इस कदर गहरी हैं कि हम चाहते हुए भी उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यह सर्वविदित है कि जाति-विभेद के कारण गढ़वाली लोक समाज के शिल्प और संस्कृति का तेजी से क्षरण हो रहा है। इस पर भी यह समाज प्रायः बच्चों को जातीय विभेद का अनुपालन करने की सीख देने में कोई देरी नहीं करता। दूसरी ओर, इसी समाज के मुख्य संयोजन में मंच प्रदर्शनों के माध्यम से लोक शिल्प और संस्कृति को बचाने के ढोल भी नित्य-प्रतिदिन और तेजी से पीटे जा रहे हैं।

‘‘वीं देबिन् यीं देबी थैं नि बिंगा कि बाजि दां त तु ये सौणू द्येखि छै लंक्खा बटि धै मार दीणी छै कि हे सौणू फुंड चौड़ि जगम जा, मि आणू छौं। मै फर नि भिडे़। अबऽरि किलै छै वे कऽ गौळा उंद झुंट्येंणि।’’ (डड्वार: पृष्ठ-37)

वास्तविकता यह है कि आज हमारे समाज में लोक शिल्प एवं संस्कृति बचाने के लिए वे लोग सबसे ज्यादा सार्वजनिक दुःखी हैं, जिनकी स्वयं की दिन-चर्या में वे पहले से ही बहुत दूर जा चुके हैं। वे चाहते हैं कि उनके पारिवारिक उत्सवों में औजी ढ़ोल बजाये, ओड उनकी तिबारि-डंड्यालियों का निर्माण करे। वे गुहार लगा रहे हैं कि बद्दी प्रथा लुप्त हो गई है। लुहार की अणसाल रीती है, टमोटा की गागर और तोली देखने को नहीं मिल रही है। चारों ओर लोक शिल्प एवं संस्कृति के लिए हे! राम, हे! राम, बचाओ…बचाओ का शोर है।… पर इस शोर का सामाजिक जीवन में सकारात्मक बदलाव से नाता हो ये वे आवश्यक नहीं समझते हैं।

इस कहानी के माध्यम से महेशानन्द साफ संदेश देते हैं कि ‘‘मी बि ब्वाद कि ढोळ-दमों बजंण चयेंणा छन। एक सगंढ संसकिरति छ ये ढोळा पैथर। धुकधुकि यां कि छ कि, भला मनिखू जन ईजत तुम स्अीपन फ्यौळ थैं दींणा छंया वन्नि यूं ढोळ बजांण बळों थैं किलै नि दीणां छव् अर दैळा त अगनै कि पीढ़ी दर पीढ़ी कन नि बजऽळू ढोल सगार।

महेशानन्द का कहना है कि जब तक सवर्ण अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक उत्सवों में शिल्पकारों को समानता का दर्जा नहीं देंगे तब तक लोक शिल्प और संस्कृति की बातें बचकानी ही कही जायेंगी। ये कैसी लोक संस्कृति है जो समाज के एक वर्ग के लिए आत्म-मुग्धता और एक अन्य वर्ग के लिए अपमान सहते हुए जीवकोपार्जन का एक अवसर मात्र है। इन्हीं उत्सवों में एक को सर आँखों पर और दूसरे के औसत दर्जे के खाने-पीने का इंतजाम करना तो दूर उस पर विचार ही नहीं किया जाता है। उस वर्ग को अपने कार्य को ही सम्मानजनक तरीके से लोग करने दें, ये ही बहुत बड़ीअ बात है। इन उत्सवों में शामिल शिल्पकार आस लगाये रहते हैं कि कब उन्हें खिलाया जायेगा और आराम करने को कहा जायेगा।

पंडित के मंत्र और ढोळी के यंत्र ही तो पारिवारिक उत्सवों को दिव्य व भव्य बनाते हैं। पर पंडित के तो पैर पूजे जाते हैं और ढोली को पैर से धकियाया जाता है। सीधी सी बात जिस रोजगार में कार्य करने वाले को आत्मसम्मान की अनुभूति नहीं होगी उसे वह मन-मस्तिष्क से स्वीकार नहीं करेगा। युवा शिल्पकार तो कदापि नहीं।

सच ये है कि ये पूरा मामला मानवीय जीवन के आत्मसम्मान और जीवकोपार्जन का है। शिल्पकारों को अपने पैतृक व्यवसाय जातिगत दासता से ग्रसित होने के कारण हीनता का बोध कराते है। शिल्पकारों की नई पीढ़ी पढ़ने-लिखने लायक हो गई तो स्वाभाविक रूप में वे उसी जीवकोपार्जन की ओर उन्मुख होंगे, जहाँ उनके आत्मसम्मान को किसी भी तरह से ठेस न पहुँचे।

‘‘इना सूणदि! हम यूं कऽ भला-बुरा कारिजुम् सब्यूं स्ये अग्वड़ि रंदा। हम यूं कऽ ऊज-हर्स थैं चौगुणा कै दिंदा अर खांदि-पींदी दां यि हम थैं कुक्कुर स्ये बि पिछ्वड़ि धिकै दिंदन। जन बिर्ति औजी, ल्वार अर मिस्त्री छ, तन्नि पंडा जी कि बि त छ। कंटऽळू, नाळी-पाथी वूं बि दियेंद, डड्वार वू बि मंगदन। वूं दगड़ि क्वी भिन्न-भौ न हूंद।…हम सल्लि छां, जंणगूर छां, हमऽरि बिजूत! डड्वारै एक सुप्पि नाजम् हमऽरि खलड़ि खिंचणान्। कुल्लि काम कर्द मोरि ग्या हमऽरु।’’ (डड्वार: पृष्ठ-46)

डड्वार कहानी के मुख्य पात्र सौणू का पढ़ा-लिखा पुत्र जैराम जिन्दगी भर की अपने पिता की कुगत के कारणों को तर्कों से उन्हें समझाता है। आखिर में, सौणू अपने कंधे में रखे ढ़ोल को हिंसरया गाड में बहा कर सदियों की दासता से मुक्त होने के परम आनन्द की अनुभूति महसूस करता है।

‘‘सौणुन पैलि ढोळ चुला हिंसर्या गाडम्। पाछ वेन जैरामा गौळा बटि झंझोड़ दमौ अर च्यां चुलै द्या। ढोळ-दमौं औंदि गाड्म फूळ सि बौळि ग्येनि।… बाबा रु्वा न। अमंणि तुमऽरु हैंकु जलम ह्वेगि।’’(पृष्ठ-47)

डड्वार कहानी में सौणू के अपने पैतृक व्यवसाय ढोल वादन को तिलांजलि देने के संदेश को सभी को गम्भीरता से समझा जाना चाहिए। उसकी नई पीढ़ी का इसके प्रति कितना अलगाव है यह समझना और भी महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि, जब हम इस कु-व्यवस्था को पैदा करने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं तो इसे बनाए रखने को क्यों जिम्मेदार रहें? तभी तो, सौणू के पुत्र जैराम का मत है कि हम अन्य सब कुछ करेंगे पर ये नहीं करेंगे। मतलब, दासता से उपजे अपमान का सूचक ढोल नहीं बजायेंगे।

युवा जैराम का यह जीवनीय संकल्प विद्रोह नहीं, पलायन भी नहीं वरन मानवीय जीवन को नई राह दिखाता दृड-संकल्प है। लेकिन, इससे शिल्पकारों के साथ जातीय विभेद कम होने का संदेश निकट भविष्य में तो प्रभावी होने से रहा। लोक संस्कृति के उत्सवों में पण्डित और शिल्पकार को बराबरी का दर्जा मिले ये सामाजिक प्रदर्शन और प्रसार में तो संभव है, पर प्रचलन में आने में पीढ़ियाँ लगेंगी।

व्यवहारिक हकीकत यह है कि डड्वार के सौणू की तरह समृद्ध शिल्पकार जातीय मानसिकता के अपमान से बचने के लिए चाह कर भी वापस अपने पैतृक गाँवों में नहीं बसना चाहते हैं। शिल्पकार वर्ग के गाँवों में तेजी से खाली और वीरान होते घरों को देखकर इस तथ्य को भली-भाँति समझा जा सकता है।

निःसंदेह, महेशानन्द का साहित्यिक लेखन दमित समाज के भोगे गए यथार्थ को जीवंतता से उद्घाटित करता है। उसे पढ़कर आज की पीढ़ी यह उच्चारित करती है कि ‘क्या वाकई में ऐसा हुआ होगा’? इसके सटीक उत्तर के लिए साहित्यकार महेशानन्द के समग्र साहित्य को समाज में सामाजिक चेतना के विकास के लिए गम्भीरता से पढ़ा जाना चाहिए। विशेषकर नई पीढ़ी को सामाजिक विसंगतियों के असल सच को जानना-समझने लिए यह बहुत जरूरी है।

पुस्तक- ‘डड्वार’ (गढ़वाळि कहानी संग्रह)
कहानीकार- महेशानन्द
संपादन- राकेश मोहन
आवरण- विमल पोखरियाल
वर्ष- 2014, पृष्ठ-182, मूल्य-200
प्रकाशक- खबरसार प्रकाशन, पौड़ी

डाॅ. अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौ- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, ब्लाक- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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