Sunday, September 13, 2026
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देघाट गोलीकांड की बरसी पर विशेष। वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी का यह आलेख

By – Charu tiwari

– देघाट गोलीकांड की बरसी पर विशेष।

– भारत छोड़ो आंदोलन का एक अविस्मरणीय पड़ाव।

भारत छोड़ो आंदोलन में उत्तराखंड की महत्वपूर्ण भूमिका रही। देघाट, सालम और सल्ट की क्रान्तियों ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई गति प्रदान की। पहाड़ में 1910 के बाद अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जनविरोधी कानूनों को जबरन थोपने के खिलाफ स्थानीय स्तर पर लोगों में असंतोष पनप रहा था। हालांकि इसके बीज आजादी के पहले विद्रोह 1857 में ही बो दिये गये थे। काली कुमाउं में कालू महर के नेतृत्व में हुये विद्रोह ने लड़ने का साहस पैदा कर दिया था। वर्ष 1916 में कुमाउं परिषद की स्थापना के साथ ही लोगों में व्याप्त असंतोष संगठनात्मक रूप लेने लगा और राजनीतिक चेतना भी विकसित होने लगी। इसी का परिणाम था कि 1921 में बागेश्वर में कुली बेगार आंदोलन के बाद चेतना का नया रास्ता खुला। 1929 में महात्मा गांधी जी के पहाड़ में आने के बाद इसने और व्यापक रूप लिया। वीर चन्द्र सिंह गढवाली के नेतृत्व में 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर विद्रोह और 30 मई, 1930 को तिलाड़ी गोलीकांड के बाद लोगों ने बहुत शिद्दत के साथ अपने हक-हकूकों की लड़ाई लड़नी शुरू की। अब रणनीति और राजनीतिक कार्यक्रमों के साथ आगे बढ़ने की समझ भी विकसित होने लगी। तीस के दशक में बहुत सारी राजनीतिक घटनायें ऐसी थी जिन्होंने आजादी के आंदोलन में लोगों को खुलकर आने का रास्ता तैयार किया। अगस्त, 1942 आते-आते पूरे पहाड़ का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में युवाओं ने बहुत सक्रियता से भाग लिया। देघाट, सल्ट और सालम में गोलीकांड हुये जिनमें आठ लोग शहीद हुये। आज देघाट गोलीकांड की बरसी है। आजादी के मतवालों को शत-शत नमन। इस गोलीकांड में शहीद हुये हरिकृष्ण उप्रेती और हीरामणि को कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धांजलि।

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है देघाट। अल्मोड़ा जनपद के चौकोट पट्टी का आजादी के आंदोलन में अविस्मरणीय योगदान रहा है। महात्मा गांधी के साथ 1930 में डांडी मार्च में भाग लेने वाले दो महत्वपूर्ण नाम थे- ज्योतिराम कांडपाल और भैरवदत्त जोशी। भैरव दत्त इस यात्रा में लगातार डायरी लिखते रहे। यात्रा के बाद उनका स्वास्थ्य खराब हुआ। फिर गांधीजी की सलाह पर नव 16 अप्रैल, 1930 को रानीखेत पहुंचे। कारणवश भगीरथ पांडे अंतिम समय पर यात्रा में शामिल होने से रह गये थे। नमक सत्याग्रह के बाद ज्योतिराम कांडपाल जी ने देघाट में एक उद्योग भवन की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने भूलगांव में इसे चलाया। यह क्षेत्र आजादी और जनचेतना के नये केन्द्र के रूप में पहचान बनाने लगा। कांडपाल जी की चौकोट वापसी के बाद यहां आंदोलन का नया सिलसिला चला। सामाजिक चेतना के साथ इस क्षेत्र के लोगों ने शिक्षा के प्रसार और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी उठना शुरू किया।

एक तरह से यह दौर आजादी के आंदोलन के चरम पर था। 1939 से 1942 तक पूरा चौकोट आजादी के आंदोलन में शामिल रहा। व्यक्तिगत सत्याग्रह में 1941 में बहुत सारे लागों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। जब 9 अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन’ का उद्घोष हुआ तो यहां आंदोलनकारी नये तेवरों के साथ इस आंदोलन से जुड़ गये। इसी की पृष्ठभूमि में मई, 1942 को खुशाल सिंह मनराल के नेतृत्व में चैकोट की तीनों पट्टियों के केन्द्र उदयपुर गांव में एक विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में कुमाउं-गढ़वाल के अलावा बड़ी संख्या में बाहर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भी भागीदारी की थी। इस सम्मेलन की अध्यक्षता आर्चाय नरेन्द्रदेव जी को करनी थी। किन्ही कारणों से वह नहीं आ पाये। उस समय कांग्रेस के जाने-माने नेता दामोदर स्वरूप ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। इसमें हजारों की संख्या में कार्यकार्ताओं ने भाग लिया। विनोद नदी के किनारे विशाल मैदान में बने भव्य पांडाल को कमला नेहरूनगर नाम दिया गया। इससे पहले इस तरह के सम्मेलन द्वाराहाट के उभ्याड़ी और चिलियानौला में हुये थे। इनमें भी आर्चाय नरेन्द्र देव और दामोदर स्वरूप शामिल हुये थे।

उदयपुर का यह सम्मेलन एक तरह से देघाट क्रान्ति की पूर्व पीठिका थी। इसकी सफलता के बाद इस क्षेत्र के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नये जोश का संचार हुआ। इसी का परिणाम था कि जो दबी हुई चिंगारी थी उसने ज्वाला का रूप लिया और आंदोलनकारी देघाट में अंग्रेजी हुकूमत के दमन की परवाह किये बिना विद्रोह पर उतर आये। ज्योतिराम कांडपाल के बाद इस क्षेत्र में सक्रिय आंदोलनकारी खुशाल सिंह मनराल ने ज्योतिरराम कांडपाल के संकल्प को याद दिलाते हुये ‘करो या मरो’ की तर्ज पर तीब्र आंदोलन की चेतावनी सरकार को दी। इसी के तहत 19 अगस्त, 1942 को सुबह दस बजे आंदोलनकारियों ने विनोद नदी के समीप देवी के मंदिर में एक विशाल सभा के आयोजन की घोषणा की। खुफिया विभाग ने भिकियासैंण पुलिस को रिपोर्ट दी कि चौकोट में अंग्रेजी हुकूमत खतरे में है। प्रशासन ने 18 तारीख की रात से ही 25 पुलिस के सिपाही, एक हेड कांस्टेबल, एक कानूनगो और तीन पटवारियों को देघाट भेजा।

दूसरे दिन जब मंदिर के पास लगभग पांच हजार की जनता जुटी तो पुलिस-प्रषासन ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया, लेकिन वह सत्याग्रहियों को पकड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं। आंदोलनकारी सुबह दस बजे से दोपहर दो बजे तक अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’, ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ आादि नारे लगाते रहे। इन नारों से बौखलाकर प्रशासन ने आंदोलनकारियों से सरकारी कार्यालय से दूर जाने की चेतावनी दी। इस चेतावनी से आंदोलनकारी और गुस्से में आ गये। प्रशासन ने एक चाल चली। आंदोलनकारियों के नेता खुशाल सिंह मनराल को वार्ता के बहाने बुलाया और उन्हें पुलिस चौकी में बंद कर दिया। यह खबर पूरे चौकोट में फैल गई। कुछ ही देर में देघाट के समीपवर्ती गांवों से हजारों की संख्या में लोग आंदोलन स्थल पर पहुंच गये।

शाम होते-होते महरौली, तल्ला चैकोट, पैठाना, उदयपुर से बड़ी संख्या में नौजवान लाठियों और डंडों के साथ देघाट पहुंच गये। युवा ‘भारत माता की जय’, ‘महात्मा गांधी की जय’, ‘खुशाल सिंह मनराल की जय’ के नारे लगाने लगे। रात के अंधेरे में डंडे और लाठियों को देखकर स्थानीय प्रशासन को लगा कि अब आंदोलनकारी काबू से बाहर हो जायेंगे। पेशकार बचे सिंह ने पुलिस व पटवारियों को हवा में गोली चलाकर भीड़ को तितर-बितर करने को कहा। इसी बीच गोलियां चलने से भगदड़ मच गई। पुलिस और पटवारी ने कुछ दूरी पर बैठे लोगों पर गोली चला दी। जिन लोगों को गोली लगी उनमें भेलीपार गांव में हरिकृष्ण उप्रेती तथा खलडुवा गांव के हीरामणि थे। इन दोनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। इस गोलीकांड में भेलीवार के रामदत्त घायल हुये। तीसरे दिन बदरीदत्त कांडपाल को भी गोली लगी। पुलिस ने गोली रात के लगभग नौ बजे चलाई थी। आधे घंटे में ही गोलियों के आतंक से पता नहीं चला कि कौन कहां गया। इस प्रदर्शन के समय उपस्थित कांग्रेस कार्यकर्ता डीआईआर के तहत गिरफतार कर दिये गये। इनमें भगत सिंह रावत, गंगाासिंह रावत, बाग सिंह बंगारी, हर्षदेव बहुगुणा, लाल सिंह बंगारी, खीमानन्द चैबे, नन्दराम, दीवान सिंह कठायत, बचे सिह साह, देव सिंह जीना, जोधा सिंह मनराल, गमाल सिंह बोरा आदि घायल हुये थे। घायल अवस्था में ही उन्हें जेल में ठूंस दिया गया।

पेशकार, पटवारी और पुलिस वाले आंदोलन के मुखिया खुशाल सिंह मनराल, सभी बंदी कार्यकर्ताओं, दो मृतक व्यक्तियों जो नंगी खाटों में बंधे थे को लेकर पैदल 20 अगस्त की सुबह उदयपुर के बाणेश्वर महादेव के पास पहुंचे। जब यह काफिला विनोद नदी के किनारे पहुंचा तो उदयपुर गांव के सैकड़ों महिला-पुरुष एवं बच्चों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाये। दूसरे दिन अफवाह फैली कि खुशाल सिंह मारे गये। लेकिन जब लोगों ने उन्हें जिन्दा देखा तो राहत की सांस ली। गांव वालों ने देघाट जैसा दृश्य पहले न कभी देखा था और न सुना था। उन दिनों रानीखेत तक पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। 20 अगस्त को पूरा काफिला अगले पड़ाव के रूप में सिनौड़ा पहुंचा। पुलिस ने दोनों शहीदों का देघाट से 29 किलोमीटर दूर सिनौड़ा में अंतिम संस्कार कर दिया। 21 अगस्त को बंदी बनाये गये आंदोलनकारियों को रानीखेत अदालत में पेश करने ले जाया गया। रास्ते में प्रशासन और पुलिस को जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ा।

दो-तीन दिन रानीखेत के हवालात में रखने के बाद उन्हें अल्मोड़ा जेल भेज दिया गया। एक सप्तााह के बाद सभी बंदियों को संयुक्त प्रांत की विभिन्न जेलों में भेज दिया गया। एक सप्ताह बाद पुलिस दल फिर देघाट पहुंचा और गांव के निवासियों को देघाट बुलाकर बेतों से पीटा गया। चैकोट में ऐसा दर्दनाक अत्याचार कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। आजादी के आंदोलन का जब भी जिक्र आयेगा देघाट के प्रतिकार को हमेशा याद किया जायेगा। इस गोलीकांड में शहीद हुये हरिकृष्ण उप्रेती और हीरामणि सहित उन सभी नाम-अनाम आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि जिन्होंने हमारे बेहतर कल के लिये अपना स्वर्णिम भविष्य दांव पर लगाया।

संदर्भः
1. स्वतंत्रता की रजत जयन्ती स्मारिकाः अल्मोड़ा
2. दिवंगत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लेखकः जीसी जोशी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।

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