Sunday, June 28, 2026
Home lifestyle कभी न भरने वाले जख्म दे गई धराली आपदा।

कभी न भरने वाले जख्म दे गई धराली आपदा।

By Pankaj Kushwah

इंसानी याददाश्त बहुत कमजोर होती है, धराली में बाढ़ आई दर्जनों मलबे में दबकर हमेशा के लिए लापता हो गए, दर्जनों होटल, भवन मलबे में दब गए। दर्जनों लोग बेघर हो गए, आजीविका का जरिया खत्म हो गया।

धराली में आई आपदा ने हर्षिल समेत पूरे इलाके में भीषण संकट पैदा कर दिया, सड़के अब तक नहीं खुली है लिहाजा रोजमर्रा की जरूरतों के सामानों की आपूर्ति भी नहीं हो पा रही।

सरकार, प्रशासन, निजी संगठन, सेना, लोग सब अपने स्तर से सब कुछ झोंक कर काम कर रहे हैं लेकिन लगातार खराब मौसम बेहद विपरित परिस्थितियां साथ नहीं दे रही है। लेकिन, धराली में जैसी आपदा आई हर कोई इस बात को स्वीकार कर रहा है कि धराली ने बेतरतीब ढंग से विस्तार लिया, नदी के बाढ़ क्षेत्र को घेर दिया और होटल, ढाबे, दुकानें, बगीचे बनाए। अब नदी ने अपना पुराना बाढ़ क्षेत्र वापस ले लिया। इन दिनों इस मामले पर हर कोई चिंता जता रहा है। सबको लग रहा है कि कुदरत को हल्के में नहीं लेना चाहिए, लेकिन यह पहली बार नहीं है।

2012 और 2013 में जब उत्तरकाशी में भागीरथी नदी और असी गंगा में भीषण बाढ़ आई तो नदी तटों को कब्जा कर बने होटल, भवन ताश के पत्तों की तरह ढह गए और उफनती भागीरथी में समा गए, तब भी लोगों ने कुदरत से पंगा न लेने पर सहमति बनाई। लेकिन, आपदा बीती, लोग भूल गए कि कुदरत को चुनौती नहीं देनी चाहिए। पहाड़ के ज्यादातर कस्बे नदी तटों, बाढ़ क्षेत्र को कब्जा कर तेजी से फैल रहे हैं, पहाड़ों को खोदकर भवन, होटल बनाए जा रहे हैं, दस बीस लाख रूपए की सुरक्षा दीवार बनाकर लोगों को लग रहा है कि उन्होंने नदी को बांध दिया है।

हर छोटे बड़े कस्बों को देखिए, प्रशासन मजबूर है, वह ऐसे निर्माण पर नोटिस जारी करता है, व्यक्ति संबंधित स्थानीय विधायक से प्रशासन पर दबाव डलवाता है या फिर खुद ही इतना प्रभावशाली होता है कि प्रशासन को घुटने टेकने पड़ते हैं।

2003 में उत्तरकाशी में वरूणावत पर्वत से भूस्खलन शुरू हो गया, पूरे शहर की तस्वीर ही बदल गई, कई मकान, होटल मलबे में दब गए। लोग डर गए, डर ऐसे गए कि लगा कि अब वरूणावत की इस घटना से सबक लेंगे। लेकिन, दो दशक के दौरान वरूणावत पर्वत की तलहटी में नियम कायदों को धता बताकर कंक्रीट के जंगल उग आए, जबकि वरूणावत यदा कदा पत्थर मलबे की बारिश करता रहता है। वरूणावत तलहटी को बफर जोन घोषित कर यहां निर्माण को प्रतिबंधित कर दिया गया था लेकिन देखिए वरूणावत त्रासदी के बाद वरूणावत की तलहटी में जहां लोगां को खाली जमीन दिखी वहीं मकान उगा दिए, विशाल मकान, बड़ा निर्माण। प्रशासन ने नोटिस दिए लेकिन नेताओं के दबाव के चक्कर में किसी पर कोई कार्रवाई न हुई। अब निर्माण इतने बड़े और वृहद पैमाने पर हो चुके हैं न तो इन्हें खाली करवाया जा सकता है न ही इन्हें विस्थापित।

ऐसे में अगर कभी वरूणावत फिर रूठा तो…

पहाड़ के हर छोटे बड़े कस्बे को उठा लीजिए, आदमी किसी से नहीं डरता, आपदा आने पर वह सरकार को कोसता है, गाली देता है कि सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए लेकिन वह गदेरे में उतरकर एक सुरक्षा दीवार लगाकर मानने लगता है कि नदी, पर्वत उसका क्या ही बिगाड़ लेंगे…

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