उत्तराखण्ड की संस्कृति केवल मंदिरों और देवभूमि की पहचान में ही नहीं, बल्कि उन लोक पर्वों और रीति-रिवाजों में जीवित है, जो पीढ़ियों से गाँव-गाँव के जीवन का हिस्सा बने हुए हैं। इन्हीं में से एक है घी त्यार और टेक्टा—ये पर्व उत्तराखण्ड की आत्मा हैं, जहाँ गोरस, अन्न और लोकविश्वास मिलकर जीवन की सहजता और सौंदर्य का गीत रचते हैं।
घी त्यार : स्वाद और अपनत्व का संगम
कुमाऊँ अंचल में भादों मास की संक्रांति को लोग घी त्यार कहते हैं। इस दिन घर-आँगन पकवानों की खुशबू से महक उठते हैं। उड़द की दाल भिगोकर सिलबट्टे पर पीसी जाती है, उसमें हींग-अजवाइन और अदरक मिलाकर बड़े बनाए जाते हैं। आटे की लोई में भरकर ये पूरी या लगड़ बनते हैं। सबसे खास पकवान है – बेडुआ रोटी। इसे चूल्हे की धीमी आँच पर सेंका जाता है और ऊपर से घी की परत चुपड़ दी जाती है। सीपालू महिलाएँ बिना बेलन-चकले के हाथों से ही रोटी को इस तरह पाथ देती हैं कि भीतर मसाला बराबर बंटा रहे और बाहर सुनहरा रंग उभरे।
इस दिन बच्चों के सिर पर भी मक्खन या घी चुपड़ा जाता है, मानो यह केवल भोजन का नहीं बल्कि स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि का भी पर्व हो।
ओलुक की परंपरा : रिश्तों की डोर
घी त्यार केवल खाने-पीने का उत्सव नहीं, बल्कि भाईचारे का प्रतीक है। लोग अपने इष्ट-मित्रों को ओलुक भेंट करते हैं—जिसमें घी, दही, फल, सब्जी, मूली, पिनालू की पत्तियाँ और पकवान शामिल होते हैं। शिल्पकार अपनी बनाई वस्तुएँ भेंट करते हैं, तो ब्राह्मणों व पुरोहितों को पकवान और अनाज दिए जाते हैं। विवाहित बेटियाँ अपनी ससुराल से मायके के लिए ‘ओल’ लेकर आती हैं—यह परंपरा रिश्तों में मिठास और अपनत्व का पुल बनाती है।
टेक्टा : पितरों का स्मरण
गढ़वाल की जलकुर घाटी में इसी संक्रांति को टेक्टा कहा जाता है। यहाँ भी दूध-दही-घी का महत्व है, पर इसका केंद्र पितरों का स्मरण है। घरों की सफाई होती है, खीर और लगड़ बनाए जाते हैं। रात को घर के बाहर लकड़ियाँ जलाई जाती हैं, पत्तलों में खीर, अर्जुना घास और हुक्का-चिलम रखे जाते हैं। लोकमान्यता है कि पितर इन पकवानों का आस्वादन करेंगे और चिलम गुड़गुड़ाएँगे।
यहाँ टेक्टा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि स्मृति और कृतज्ञता का उत्सव है—जहाँ हम अपनी जड़ों, अपने पुरखों और अपने अतीत से जुड़ते हैं।
इन पर्वों का असली संदेश यही है कि जीवन केवल जीने के लिए नहीं, बल्कि मिल-बाँट कर जीने के लिए है। घी त्यार और टेक्टा हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति, पशुधन, अन्न और रिश्ते—सभी का आदर करना ही सच्चा धर्म है।
उत्तराखण्ड की आत्मा इन्हीं पर्वों में बसती है। यहाँ हर पकवान केवल स्वाद नहीं, बल्कि श्रम, अपनत्व और संस्कृति का प्रसाद है। हर ओलुक केवल भेंट नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास का प्रतीक है। और हर टेक्टा केवल रीति नहीं, बल्कि स्मरण है कि हम अपने पुरखों की परंपरा की जड़ों से जुड़े हुए हैं।
घी त्यार और टेक्टा उत्तराखण्ड की वह धड़कन हैं, जो आज भी लोक जीवन में संस्कृति की लौ जलाए हुए हैं।
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