Sunday, September 13, 2026
Home उत्तराखंड हिमालय के ढोल की आत्मा बताता डा० नंदकिशोर हटवाल का यह शोधपत्र

हिमालय के ढोल की आत्मा बताता डा० नंदकिशोर हटवाल का यह शोधपत्र

Awardi prem hindwal
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हिमालय का लोक बाध्य यंत्र पर यह पहला अध्ययन सामने आया है कि ढोल जन्म से लेकर मरण तक हमारे साथ रहता है। यह शोध वरिष्ठ साहित्यकार डा० नंदकिशोर हटवाल ने दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में खचाखच भरे लोगो के सामने प्रस्तुत किया है।

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इस दौरान उन्होंने अपने पावर प्रजेंटेंशन के मार्फत बताया कि उत्तराखण्ड हिमालय के वाद्य यंत्र ‘ढोल, कलावंत और संस्कृति’ यहां के लोगो के जीवन का एक विशेष यंत्र है। उन्होंने कहा कि ढोल उत्तराखण्ड हिमालय का लोकवाद्य है। यहाँ के ग्राम्य जीवन में ढोल की जड़े़ं गहरी समाई हैं। यह उत्तराखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय वाद्ययंत्र है। इसके बगैर यहाँ का लोक और सामाजिक जीवन अधूरा है। यहाँ के लोकजीवन की खुशियों और हर्षोल्लास के केन्द्र में ढोल है। बिना ढोल के कोई भी समारोह ‘सुन्नपट्ट’ लगता है। ढोल है तो छोटे आयोजन बहुत बड़े हो जाते हैं। ढोल को उत्तराखण्ड हिमालय के लोक में देववाद्य, मांगलिक वाद्य, शगुन वाद्य, द्यो बाजणु भी कहा जाता है। संगीत की भाषा में इसे अवनद्ध वाद्य, चर्मवाद्य, खाल वाद्य, ताल वाद्य या थाप वाद्य भी कह सकते हैं।

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उन्होंनेआगे बताया कि उत्तराखण्ड के लोकवाद्यों में ढोल सर्वाधिक जरूरी, महत्वपूर्ण, सुलभ और उपलब्ध वाद्य है। यहाँ ढोल सर्वत्र है। शायद ही कोई गाँव हो जहाँ ढोल न गूंजता हो। शायद ही कोई उत्तराखण्ड हिमालय का निवासी हो जिसने ढोल की अनुगूंज न सुनी हो। गाँवों के खलिहानों, खेतों, मंदिरों, पूजा, कथा, भागवत् जलजात्रा, आस्था-विश्वास, धार्मिक-सामाजिक परम्पराओं, मान्यताओं, जन्म-मृत्यु,  रीति-नीति आदि कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जहाँ ढोल का प्रयोग न किया जाता हो। ढोल की भूमिका सिर्फ नृत्य या ताल वाद्य के रूप में ही नहीं होती, ढोल लोकदेवताओं की पूजा-अनुष्ठान का अहम् हिस्सा भी होता है। नृत्य, नृत्योत्सव, यथा-बगड्वाल, पाण्डव, छोलिया, पौंणा, मंडाण, चक्रव्यूह, रम्माण, तांदी और जागरों की प्रस्तुति में ताल वाद्य के रूप में ढोल का ही प्रयोग होता है। सोलह संस्कार यथा-जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, जनेऊ, शादी, मृत्यु, शवयात्रा के कर्मकाण्डों में ढोल गहराई से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि यहाँ ढोल बजाने पर प्रतिबंध का मतलब है अपशकुन या मातम का समय। इसे अबाजा कहा जाता है। यहाँ बाजे का मतलब ढोल-दमाऊं ही होता है। तेरहवीं के दिन ढोल वादकों को बुला कर अबाजे को तोड़ने की भी परम्परा है। हर महीने की संक्रांति का शुभारम्भ ढोल से होता है। किसी प्रियजन, अतिथि, वी.आई.पी., नेता-मंत्री का मन से स्वागत और अतिशय सम्मान प्रकट करना हो तो ढोल बजाया जाता है। उन्होंने उत्तराखण्डी लोकसंगीत और निस्पादक लोक कलाओं में ढोल की महत्ता को बताते हुए कहा कि ढोल उत्तराखण्ड में चेतना, जागृति और आन्दोलनो का वाद्य भी रहा है। इस संदर्भ में उन्होंने उत्तराखण्ड के आन्दोलन में ढोल वादकों की भूमिका की भी चर्चा की। उन्होंने लोकसाहित्य में ढोल तथा ढोल सागर की भी चर्चा करते हुए लोकमंचों से आधुनिक मंचों और माध्यमों तक पहुंचने तक की ढोल की यात्रा को विस्तार से प्रस्तुत किया है। यथा ढोल की कला के संरक्षण तथा संवर्द्धन को लेकर कोई ठोस रणनीति बनानी होगी तथा ढोल को रोजगार से जोड़ना होगा।

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दरअसल लंबे समय से उत्तराखंड में यह चर्चा सरेराह है कि ढोल वादकों की सम्यस्याओं पर भी विचार किया जाना जितना जरूरी है उनता ही लोगों के बीच सामाजिक न्याय के प्रति चेतना और जागरूकता जरूरी है।

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दून पुस्तककालय के संस्थापक व कुमाऊ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.बी के जोशी ने कहा कि  ढोल पर्वतीय समाज का प्रमुख परम्परागत वाद्य यंत्र है।  ढोल सागर  पर अभी भी  बहुत कुछ बुनियादी कार्य किये जाने की जरूरत है ताकि इस कला का इतिहास विकास  पर गहन जानकारी प्राप्त होने के साथ ही इन्हें बजाने वाले कलाकारों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सके। उन्होंने कहा कि कला को रोजगार से जोड़ा जाय तो उसके जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है। प्रोग्राम एसोसिएट चन्द्रशेखर तिवारी ने भी उत्तराखण्ड हिमालय की ढोल वादन परम्परा को एक सांस्कृतिक धरोहर को अनमोल निधि बताते हुए यहां के कलावन्तों को भी राज्य सरकार द्वारा प्रश्रय दिए जाने की बात कही।

इस अवसर पर उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध लोक कलाकार प्रेम हिंदवाल और जगमोहन का शाॅल ओढ़ाकर सम्मान किया गया है। सोनिया गैरोला ने प्रेम हिंदवाल के सम्मान पत्र का वाचन किया तथा दून घाटी के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी सतीश धौलाखण्डी  व अन्य साथियों ने प्रेम हिन्दवाल और जगमोहन के सम्मान में ढोल वादन प्रस्तुत किया।

इस दौरान लोक कलाकार प्रेम हिंदवाल ने कहा कि वे किशोरावस्था से ढोल वादन का कार्य कर रहे हैं तथा उन्होंने अपने गांव से लेकर राष्ट्रीय मंचों पर इस कला का प्रदर्शन किया है। उन्होंने अपनी मुश्किलों और संघर्षों के बारे में भी बताया। उन्होंने अपने सम्मान के लिए दून लाइब्रेरी का आभार प्रकट करते हुए कहा कि आज इस कला के माध्यम से उनको मान-सम्मान भी मिल रहा है और यह उनकी आय का जरिया भी है।

व्याख्यान के बाद ढोल पर एक चर्चा भी आयोजित की गई। कार्यक्रम के दौरान  डॉ.योगेश धस्माना, बीना बेंजवाल, निकोलस हॉफलैण्ड, सुंदर बिष्ट, रमाकांत बेंजवाल, जितेंद्र नौटियाल सहित अनेक संस्कृति कर्मी, लोक कलाकार, लेखक, साहित्यकार, युवा पाठक, छात्र  उपस्थित रहे है। कार्यक्रम में हिमवाल सोसायटी की महासचिव दीपिका डिमरी ने भी कलाकार जनों का आभार ज्ञापित किया है।

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