भारी भूस्खलन और जंगलों की आग ने राज्य का बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन खत्म कर दिया है – प्रो॰ पाठक
साल 1974 में पहली बार प्रसिद्ध पर्यवारणविद् सुंदरलाल बहुगुणा की पहल पर असकोट से आराकोट तक की यह पैदल यात्रा आरंभ की गई थी। इस वर्ष यात्रा का छठवां पड़ाव था। तब से यह यात्रा हर 10 साल के अंतराल में होती गई। इस यात्रा से अपने पर्यावरण और अपने लोगो के संकट, जन विकास की योजनाओं को समझना है। इसीलिए यह यात्रा हर 10 साल के अंतराल में होती है। 2024 की छटवी इस यात्रा में अलग अलग स्थानो पर लगभग 300 लोगों ने हिस्सा लिया है। और 250 से भी अधिक गांवो से यह यात्रा गुजरी है। जबकि एक दर्जन से भी अधिक लोग असकोट से आराकोट तक निरन्तर इस यात्रा के सहभागी रहे है। जिसमें प्रमुख रूप से पत्रकार, लेखक, फोटो जर्नलिस्ट, शोधार्थी और अन्य समाजविज्ञानी, इतिहासकार आदि शामिल रहे है। यात्रा दल के प्रमुख और वरिष्ठ इतिहासकार, यायावर व पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक ने अपने अनुभव में खतरनाक तथ्य प्रस्तुत किए है। उन्होंने बताया कि 25 साल उत्तरप्रदेश के हिस्सा और 25 साल अलग उत्तराखंड राज्य यानि 50 साल की इन छः यात्राओं में कई जन संकट सामने आए है। पहली यात्रा में जहां स्कूलों में मात्र गिनती की लड़कियां दिखती थी, अब स्कूलों में बालिकाएं स्कूल जाती दिखाई दी है। पिछली यात्राओं में जहां सड़क नहीं थी वहां सड़क तो पहुंचाए गई, पर जन यातायात की समुचित व्यवस्था अब तक नही बन पाई है। अधाधुंध सड़क निर्माण, जल विद्युत परियोजनाओं ने उत्तराखंड का पर्यावरण ही बदल दिया है, भारी भूस्खलन और जंगलों की आग ने राज्य का बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन खत्म कर दिया है। इसके इतर आज भी समाजो में जातिवाद का दंश कूट कूटकर नजर आता है। इन सभी विषयो पर पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक ने खुलकर बातचीत की है। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश –








