Friday, March 6, 2026
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केदारनाथ विधानसभा उप चुनाव : कम मतदान के कारण राष्ट्रीय पार्टी भाजपा चिंता में।

केदारनाथ विधानसभा उप चुनाव : कम मतदान के कारण राष्ट्रीय पार्टी भाजपा चिंता में।

Manoj rawat and aasha nautiyal
Manoj rawat and aasha nautiyal

केदारनाथ विधानसभा में 20 नवम्बर को जनता ने जो मतदान किया है वह निराशाजनक है। इस मतदान पर सभी राजनीतिक पार्टीयों को गम्भीरता से सोचना चाहिए। सवाल उठता है कि क्यों सोचना है। मतदान तो हुआ है। बस यही सोचने वाली बात है और लोकतन्त्र के इस पर्व में इतने कम मतदान का होना सवाल खड़ा होना लाजमी है।
पहला सवाल तो यही है कि जनता ने इतने कम मतदान क्यो किया है। दूसरा सवाल यही है कि आजादी के बाद से लगातार सभी राजनीतिक पार्टीयां हर चुनाव में जोर शोर से चुनाव प्रचार करती है फिर मतदान अपेक्षा से कम होता है। तिसरा सवाल है कि क्या सताधारी पार्टीयों ने विकास के कामो में कोताही की है। इन सभी सवालों के जबाव पूर्व की और मौजूदा सत्ताधारी पार्टी ही दे सकती है।
अभी हाल ही में केदारनाथ विधानसभा में उप चुनाव हुआ है। चुनाव प्रचार के दौरान लग रहा था कि जब मतदान होगा तो इस बार का मतदान पिछले रिकार्ड तोड़ देगा। मगर जब हम केदारनाथ के पिछले चुनाव पर नजर डालेगे तो इस उप चुनाव में उससे से भी बहुत कम मतदान हुआ है। बता दें कि केदारनाथ विस में कुल 90875 मतदाता हैं, जिसमें 44919 पुरुष और 45956 महिला मतदाता पंजीकृत हैं। ऐसा बताया जाता है कि इस बार के चुनाव में महिलाओं ने बढ चढकर मतदान किया है। इस तरह 20 नवम्बर को शाम के पांच बजे तक 58.25 फीसदी मतदान हो पाया है। यदि हम पिछले चुनाव पर नजर दौड़ाये तो इस बार का मतदान बहुत ही निराशाजनक हुआ है।
इससे पहले वर्ष 2017 के चुनाव में 64.94 प्रतिशत मतदान हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस के मनोज रावत को पहली बार पुरूष प्रत्याशी के रूप में जीत मिली थी। जबकि इससे पहले वर्ष 2012 के चुनाव में 63.04 प्रतिशत मतदान हुआ। इसी विधानसभा में वर्ष 2007 के चुनाव में 63.04 प्रतिशत मतदान हुआ। इस दौरान भाजपा के टिकट पर आशा नौटियाल ने जीत दर्ज की थी। इस बार वे पुनः भाजपा के टिकट पर मैदान में है। वहीं वर्ष 2002 के चुनाव में सबसे कम मतदान हुआ था। तब 54.09 प्रतिशत वोट पड़े थे। इस चुनाव में भी भाजपा के टिकट पर आशा नौटियाल को विजयी हासिल हुई थी। वर्ष 2024 के उप चुनाव में केदारनाथ विधानसभा में छह प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें भाजपा की आशा नौटियाल, कांग्रेस के मनोज रावत, उक्रांद के आशुतोष भंडारी, पीपीआई (डेमोक्रेटिक) के प्रदीप रोशन रूडिया और निर्दलीय त्रिभुवन चौहान व कैप्टेन आरपी सिंह शामिल हैं। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में 13 प्रत्याशी मैदान में थे फिर भी मतदान का आंकड़ा आशाजनक नहीं कहा जा सकता। देखा जाये तो केदारनाथ विस में महिला मतदाता हमेशा से निर्णायक रहे हैं। वर्ष 2002 से 2022 तक हुए विस चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या अधिक रही है जो इस बार भी दिखाई दी है।
यदि हम कालान्तर पर नजर दौड़ाये तो इस बार के चुनाव में कहीं न कहीं वही स्थिति सामने दिखाई दे रही है। केदारनाथ विस उपचुनाव ने वर्ष 1982 में गढ़वाल लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव की यादें ताजा कर दी हैं। 42 वर्ष पूर्व लोस उप चुनाव पर देश की नजर थी, आज वहीं स्थिति केदारनाथ विस की है। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है और दिल्ली तक इसकी गूंज हो रही है। तब वर्ष 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में गढ़वाल सीट से हेमवती नंदन बहुगुणा विजयी हुए थे। मगर तत्काल की प्रधानमंत्री इन्दिरागांधी से श्री बहुगुणा आहत होकर उन्होंने लोकसभा की सदस्यता और कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वह 1982 में गढ़वाल संसदीय सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें बहुगुणा ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। यह उपचुनाव, कई मायनों में आज भी याद किया जाता है।
तब कांग्रेस और बहुगुणा के बीच सीधा मुकाबला था। बहुगुणा का एक ही नारा था कि पहाड़ मुझे हारने नहीं देगा। केंद्र सरकार ने तब, अपने सारे संसाधन इस चुनाव में झोंक दिए थे। खास बात यह है कि इस चुनाव में तब युवा नेता के तौर पर भरत सिंह चौधरी (भाजपा नेता व रुद्रप्रयाग विधायक) बहुगुणा के खास हुआ करते थे। गांव-गांव प्रचार का जिम्मा उन्होंने ले रखा था। उपचुनाव में हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस के प्रत्याशी चंद्र सिंह नेगी को हराया था।
आज, ठीक 42 वर्ष बाद केदारनाथ विस उपचुनाव से एचएन बहुगुणा और भरत सिंह चौधरी का सीधा संबंध है। बहुगुणा के पौत्र सौरभ बहुगुणा बतौर जिला प्रभारी मंत्री के तौर पर प्रचार में उतरे हैं। वहीं, रुद्रप्रयाग के विधायक भरत सिंह चौधरी को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केदारनाथ विस का संयोजक बनाया है। इन दिनों दोनों नेताओं ने भाजपा प्रत्याशी आशा नौटियाल के लिए गांव-गांव जाकर वोट मांगे हैं।
अब देखना यह होगा कि तब एचएन बहुगुणा ने कांग्रेस को हराने के तमाम षडयन्त्र रचे। आज भी उनके पौत्र सौरभ बहुगुुणा कांग्रेस को हराने के लिए खूब जोर अजमाईश कर गये। मगर तब और अब में काफी कुछ बदलाव हो गया है। तब लोकसभा का चुनाव था और आज विधानसभा का उप चुनाव है। तब जनता बनाम कांग्रेस थी अब कांग्रेस और भाजपा बनाम जनता है।
कुलमिलाकर जिस तरह से इस बार मतदान हुआ है उससे यही लगता है कि एक तो रजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार प्रसार में कोई कमी की है, दूसरा यह मालूम होता है कि जनता जनप्रतिनिधियों से काफी खपा है। यदि जीत के आंकड़े पर नजर दौड़ायें तो जिसके पक्ष में आठ प्रतिशत मददान हुआ है वही जीत का शेहरा पहन सकता है। क्योंकि 50 फिसदी मतदान हमेशा राजनीतिक पार्टीयों से जुड़े कार्यकर्ताओं के हिस्से जाता है। यदि मतदान 70 प्रतिशत या उससे अधिक होता है तो हम उसे जनता का माईंडेट कह सकते है।

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