फिल्म नीति उत्तराखंड : करोड़ों का अनुदान, पर गुणवत्ता का अभाव
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फिल्म एक ऐसा धन्धा है जिससे व्यक्ति और व्यक्तित्व के साथ साथ आपका आर्थिक विकास का निखरना लाजमी है। क्योंकि इसके लिए सबसे पहले चाहिए एक ऐसा प्राकृतिक सौन्दर्य जहां आप सभी प्रकार के दृश्यों को फिल्मा सके। जी हां! यही खजाना तो है उत्तराखण्ड के पास। प्राकृतिक सौन्दर्य का ऐसा खजाना जिसके लिए लोग भारी भरकम रकम चुकाना चाहते है। बाकि आपकी कहानी और अन्य संसाधनो पर निर्भर करता है। इसी को मध्यनजर रखते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने उत्तराखण्ड फिल्म नीति बनाई है। जिसके लिए बाकायदा पृथक से उत्तराखण्ड फिल्म विकास परिषद अस्तित्व में लाया गया है।
साहब! यह खुश करने वाली खबर नहीं है तो क्या है। 80 के दशक से उत्तराखण्डी फिल्मों का दौर जब आरम्भ होता है तो ऐसा लगता होगा कि गढवाली कुमाउनी फिल्म इण्डस्ट्री की कभी अपनी पहचान होगी। आज पहचान तो है पर उतरोत्तर वृद्धी करने में उत्तराखण्डी सिनेमा फिसड्डी ही रहा है। कह सकते हैं कि अब तक यहां की आंचलिक फिल्मों ने बहुत अधिक विकास भी नहीं कर पाया तो खराब प्रदर्शन भी नहीं कर पाया।
खबर यह है कि 2002 से 2015 तक उत्तराखण्डी फिल्में बननी बन्द हो गई थी। इसलिए कि उत्तराखण्डी फिल्मों को दर्शक न मिलने का सबसे बड़ा कारण माना गया था। यह भी देखा गया कि गढवाली कुमाउनी भाषा में बननी वाली फिल्में लोगों ने देखना बन्द कर दिया था और चित्रगीतो पर दर्शक सर्वाधीक बढने लगे। इस अन्तराल में उत्तराखण्डी सिनेमा उद्योग बहुत पिछड़ गया था। मगर साल 2015 से फिर से फिल्में बनने लगी। एक आंकड़े के अनुसार 2016 में 37, 2017 में 50, 2018 में 80, 2019 में 142, 2020 में 193 और 2021 में 217 फिल्में गढवाली और कुमाउनी भाषा में बनी। पर यह फिल्में पोष्टबॉक्स पर आकर जा गिरी। साल 2023 तक आते आते 1000 से अधिक फिल्में बन चुकी थी। परन्तु इतनी फिल्मों ने उत्तराखण्डी दर्शको को थियेटर तक लाने में कोई खास सफलता नहीं पाई है। इसके कई कारण हो सकते है। पहला कारण तो दर्शको को कोई खास मसाला नहीं मिल पाया और दूसरा कारण सरकारी संरक्षण का अभाव दिखाई दिया। जबकि 2023 से पहले भी उत्तराखण्ड फिल्म नीति थी। यह फिल्म नीति भी फिल्मकारो को नहीं लुभा पाई है।
अब 2024 की फिल्म नीति के बहाने प्रदेश सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक फिल्मों की शूटिंग उत्तराखंड में ही हो ताकि प्रदेश की ब्रांडिंग देश-विदेश में की जा सके। यह भी कितना आकर्षक है कि सरकार देश विदेश में फिल्मों के बहाने अपनी छबि बनानी चाहती है। परिणाम स्वरूप इसके जो मौजूदा फिल्म नीति है वह भी यही कहती है कि राज्य में फिल्मकारो के लिए स्वरोजगार के सााधन उपलब्ध हो, राज्य की फिल्में देश दुनियां में प्रदर्शती हो जिससे यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति लोगों का आकर्षक बढे।
माना कि 2024 की फिल्म नीति परवान चढ गई तो राज्य में दो तरह के कार्य स्वस्फूर्त हो जायेंगे। राज्य में पर्यटन व्यवसाय बढेगा और उत्तराखण्डी सिनेमा से जुड़े सभी प्रकार के लोग स्वरोजगार से जुड़ जायेंगे। यही नहीं इस प्लेटफार्म के फलस्वरूप राज्य की प्रतिभाओं को देश दुनियां में अपनी प्रतिभा को प्रदर्शन करने का अच्छा मौका मिलेगा। ऐसी सम्भावना फिल्म नीति 2024 में दिख रही है।
जब ऐसा है तो हम उत्तराखण्ड फिल्म नीति 2024 पर बात कर ही लेते है। इस नीति में बताया गया है कि उत्तराखंड में शूटिंग के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस है और उत्तराखंड में बनने वाली फिल्मों की शूटिंग फीस भी माफ की गई है। जबकि क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के लिए उत्तराखंड में व्यय की गई राशि का 50 प्रतिशत या 2 करोड़ तक की सब्सिडी तय है, तब जब फिल्म का निर्माण राज्य के भीतर किया जाता है। पहले यह अनुदान 25 लाख रुपये तक ही मिलता था। इसके अलावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ओटीटी फिल्म बनाने पर अब 30 प्रतिशत की सब्सिडी भी मिलेगी। इस नीति में यह भी प्राविधान है कि राज्य में बच्चों के लिए फिल्म बनती है तो इसके लिए 10 प्रतिशत अतिरिक्त अनुदान दिया जायेगा। यही नहीं एक और खास बात है कि फिल्मों में राज्य के कलाकारों को मुख्य भूमिका में शामिल करने पर अतिरिक्त 10 लाख रुपये का अनुदान फिल्म मेकर को दिया जायेगा।

अभिनय और फिल्म बनाने तक की बात यह नीति करती है तो फिल्म में जाने के लिए क्या क्या प्रशिक्षण लेना होता है उसके लिए भी इस नीति में विशेष प्राविधान है। अर्थात फिल्म ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में एससी, एसटी वर्ग के बच्चों की पढ़ाई पर 75 प्रतिशत फीस भी सरकार वहन करेगी। कह सकते हैं कि यह नीति फिल्म विकास के लिए सभी कार्यो को सम्पन्न करने के लिए कटीबद्ध है। पर्वतीय इलाकों में सिनेमा हॉल बनाने पर भी 25 लाख रुपये का अनुदान देने की बात इस नीति में बताई गई है। साथ साथ राज्य में फिल्म सिटी बनाने के लिए भी 50 लाख रुपये तक का अनुदान है। राज्य में फिल्म बनाने के लिए पोस्ट प्रोडक्शन लैब बनाने वाले को भी 25 लाख रुपये का अनुदान मिलेगा। जबकि यह नीति बताती है कि हिन्दी फिल्म जिसका बजट 50 करोड़ या इससे अधिक हो की शूटिंग राज्य में की जाती है और राज्य के उन स्थानों के नाम यथा रूप में संवादो में बताये जाते हैं तो ऐसी फिल्मों के लिए भी तीन करोड़ का अनुदान है।
कुलमिलाकर इस नीति में छोटे कलाकार से लेकर बड़े उद्योग पति को लुभाने के लिए सभी रास्ते दिखाये गये है। लाख से लेकर करोड़ तक के अनुदान उत्तराखण्ड फिल्म नीति की सिफारिश है। यही वजह है कि 2024 में धड़ले से आंचलिक फिल्मे बन रही है। उत्तराखण्ड की जितनी भी फिल्मे अब तक सिनेमा हॉल में प्रदर्शित हुई है वे दर्शको को लुभाने में सफल भी नहीं हुई है और असफल भी नहीं हुई है। कुछ फिल्में तो अनुदान के चक्कर में रहकर फिल्म नीति की रिक्वायरमेंट को पूरी करते दिखाई दी है। ऐसा समय नहीं आ पाया है कि हर उत्तराखण्डी को आने वाली गढवाली और कुमाउनी फिल्म का इन्तजार हो। और ना ही इन फिल्मों में अभिनय करने वाले कलाकारो ने व्यक्तिगत रूप से दर्शको के दिल में जगह बना पाई है।
मगर फिल्म नीति को जब हम पढेंगे तो पायेगे कि अनुदान के जो सपने दिखाये गये हैं वे इसलिए पूरे होंगे कि फिल्म बनानी है। फिल्म का जो क्रेज देश के अन्य आंचलिक फिल्मो में वहां के लोगों में दिखाई देता है वह आज भी 45 वर्षीय उत्तराखण्डी सिनेमा ने उत्तराखण्डीयों के दिल में नहीं बना पाया है। इस नीति में यही खास है कि जो सुविधा आंचलिक फिल्मकारो के लिए है वही सुविधा हिन्दी और अन्य फिल्मकारो के लिए भी है। अब देखना यह है कि जो छाप घरजवैं, चक्रचाल, तेरी सौं जैसी फिल्मों ने उत्तराखण्डियों के दिल में बनाई है क्या इतनी सुविधा के बाद ऐसी कोई गढवाली कुमाउनी फिल्म बन पायेगी। जिसका इन्तजार आज भी है।







