लेखकों के लिए प्रेरक चरित्र बने गांधी जी
Govind Prasad Bahuguna
पाश्चात्य जगत के लोगों के दिलों में और इतिहास में गांधी को उच्च स्थान दिलाने में एक साहित्यिक पहल शुरू करने का श्रेय फ्रांसीसी लेखक, इतिहासकार और रहस्यवादी चिन्तक रोमां रोलां को जाता है जिन्होंने 1915 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार हासिल किया था। पश्चिमी जगत के लोगों के वास्ते रोमां रोलां द्वारा लिखित गांधी जी की जीवनी एक अग्रगामी पुस्तक थी जिसका प्रकाशन 1924 में हुआ था और जिसने रातों -रात गांधी जी को प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया था, इतना ही नहीं गांधी के व्यक्तित्व की एक पुनर्रचना इस पुस्तक ने कर डाली। उसी वर्ष से जब से गांधी जी यह जीवनी प्रकाशित हुई थी दुनिया के कोने -कोने में गांधी की जीवनियों के प्रकाशन की भरमार हो गई। गांधी जी के दर्शन में जनतांत्रिक आस्था की स्थापना के लिए जरुरी आधारभूत तत्व- सत्य, अहिंसा,सर्वोदय और सविनय विरोध प्रकट करने के विचार ने रोमां रोलां के मन मस्तिष्क में ऐसी अमिट छाप छोड़ दी कि वह साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ खड़े हो गये।

रोमां रोलां गांधी जी से पहली बार 1931 मे इंग्लैंड में मिले थे, जब वह गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने वहां गये थे। तभी से जीवन पर्यन्त रोमां रोलां की दिलचस्पी भारत के इस आध्यात्मिक संत की गतिविधियों के प्रति बढती चली गई।
अपनी पुस्तक में रोमां रोलां एक जगह लिखते हैं कि – “उनके तौर तरीकों में कुछ भी कठोरता नहीं है ,वह बच्चों की तरह निष्पाप हंस देते हैं और बच्चों को प्यार करते भी हैं I लेकिन उनका वैराग्य संन्यासी वाला चरित्र कुछ चरम बिंदु का है। गाँधी का दर्शन कुछ इस तरह का है कि जीवन एक ऐसी तपस्या है जिसमें आप मातृभूमि के लिए उत्सर्ग करने और मृत्यु का सामना हंस कर करने का एक अनुशासन पालते हैं । उनके इसी व्रत ने बंगाल में चमत्कारी परिणाम दिखाये थे.. I
रोमां रोलां की इस टिप्पणी से गांधी जी भी कुछ कुछ सहमत दिखे। गांधी जी के सहयोग महादेव भाई ने भी इस कथन की पुष्टि करते हुए लिखा है कि “गांधी जी के बारे में रोमां रोला के ये विचार काफी हद तक उन्हें एक कवि ही नहीं बल्कि एक साधु संत बना देते हैं।
रोमां रोला ऐसे प्रगतिवाद चिन्तक और लेखक थे जिन्होंने गांधी जी के सत्य अहिंसा और सविनय अवज्ञा की शैली को साम्राज्यवाद के विरुद्ध लडने के अपने विचार के साथ जोड़ने का काम किया। इस काम के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का वातावरण तैयार करने में रोलां को गांधी की इस विचारधारा ने बड़ी मदद की।
केवल विदेशी लेखक और कवि ही गांधी जी से प्रभावित नहीं हूए बल्कि भारत में भी कई लेखक और कवि गांधी जी के विचारों से प्रेरित हुए उनमें विशेषरूप से महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द,डा0पीताताम्बरदत बड़थ्वाल तथा कविवर सुमित्रानंदन पंत मुझे सबसे पहले याद आते हैं -पंत जी की ये पंक्तियां विशेषत:हमने बचपन में पढी थी-
“तुम मांसहीन तुम रक्तहीन
हे अस्थि शेष तुम अस्थिहीन
तुम शुद बुद्ध आत्मा केवल
हे चिर पुराण हे चिर नवीन!!”







