का बंधन रिश्ता भाषा गढ़वाली फिल्म “मीठी” ने।

जबसे उत्तराखंड सरकार ने फिल्मों को वापस लेने की घोषणा की तब से उत्तराखंडी सिनेमा के दिन दिखाई दे रहे हैं। पिछले छह महीने में लगभग एक घटिया क्लासिक फिल्म सिनेमा हॉल तक पहुंच चुकी है और ऐसी ही एक फिल्म अगले तीन महीने में रिलीज होने के लिए तैयार है। इसके फिल्मकारों और उत्तराखंडी फिल्मों से जुड़ी सभी की नजरें भी बदल चुकी हैं। अब वे आकर्षक मनोरंजक और व्यावसायिक फिल्में बनाने लगे हैं। यहां हाल ही में रिलीज हुई गढ़वाली फिल्म “मीठी – मां कू आशीर्वाद” का जिक्र किया जा रहा है।
हालांकि कल्चरल लवर्स को गढ़वाली फिल्म “मीठी – मां कू आशीर्वाद” की कहानी पसंद नहीं आई, लेकिन यह कह सकते हैं कि इस फिल्म ने अपने जहां पर व्यावसायिक रूप तो ले ही लिया है।

वैसे भी संस्कृतिप्रेमियों को खुशी ही होनी चाहिए, इस फिल्म में एक पहाड़ी वाद्ययंत्र को वैश्विक मान्यता दी गई है। यानी फिल्म का रॉकेट उत्तराखंड के द्वीपों के साथ-साथ ग्रिड रोटेशन भी है। कई बार मिलेट ईयर की चर्चा, कई अन्य उत्सवों का भोजन उत्सव कंडाली कू सागा और झंगोरे की खेड के सामने नकली अभिनेत्री नजर आती हैं। एक का भाषा न होना कुछ अंतर्मुखी फिल्म की कहानी में भटकती हुई नजर आती है। वॉट्सऐप का कहना है कि इस गढ़वाली फिल्म में 30 फीसदी ही क्लासिक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इस सफल निर्देशक ने ही कहा था कि तीन तीन सागरों के समुद्र तट के अलावा भी गढ़वाली भाषा को जो प्रमुखता मिली, उसने पहली बार यह एक जैसी फिल्म बनाई है।
गढ़वाली फिल्म “मीठी – मां कू आशीर्वाद” फिल्म निर्माण में फिल्मकारों ने तकनीकी का उत्कृष्ट उपयोग किया है। इस निर्माण में बम्बईया तामझाम का बहुत अधिक उपयोग नहीं किया गया, पर अधिक प्रयास किया गया है। कंडाली कू सागा और झंगोरे की खेड जैसे व्यंजनों के अंत में गिर बुनी गई फिल्म की कहानी में इस पेड़ की भरसक कोशिश की गई कि पहाड़ में उगने वाली बिच्छू घास भी औषधीय गुणों से भरपूर है और इसकी सब्जी लाजवाब है। फिल्म की कहानी में “स्वाद भारत प्रतियोगिता” केफ मार्ट बिच्छू घास यी कंडाली का सागा और पहाड़ी अनाज अनाज झंगोरा की खेड ने जब औषधीय गुणों की शुरुआत की तो ठोस भी दांतो की मजबूत उंगली चबाने लगे। यानी पहाड़ी अनाज और पहाड़ में पैदा होने वाले औषधीय मसालों को इस फिल्म में बहुत ही सलीके से पेश किया गया है। जबकि कुछ लोग इस फिल्म से इत्तेफाक न रहे येही आदर्शों की कहानी में और कलाकारों को भी शामिल किया जा सकता है, पर यह पहली उत्तराखंडी फिल्म है जिसका अर्थ है उत्तराखंड की कहानियों वाले देवताओं के स्मारक गिरजाघर। हां यह भी पहली फिल्म है जिसमें समुद्र का कोई बंधन नहीं है। गढ़वाली, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में बोली के मिश्रण का बहुत ही सलीके से पटकथा और संवादों में पिरोने का सफल प्रयास किया गया है।

कैमरा या अन्य तकनीकी अध्ययन की इस फिल्म में कोई कोर कसर नहीं थी, जब प्रदर्शन, गढ़वाली से हिंदी और अंग्रेजी में प्रदर्शित हो रहे थे तो ठेठ उत्तराखंडी दर्शक इस दौरान कहानी को एक सूत्र में नहीं पा रहे थे। मगर फिल्म का क्लिक मैक्स ग्लोबल स्तर और मनोरंजन के बाजार में अपने को जरूर शामिल कर रहा था।
उल्लेखनीय तो यही है कि रोमांस और मारधाड़ के बिल्कुल विपरीत निर्मित यह गढ़वाली फिल्म निर्देशक की विशेष चतुराई का कमाल माना जाएगा, जो जीवंत और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर संवाद दर्शकों को बांधने में सफल हो रही है। यही नहीं अधिकांश वक्त में कई दर्शकों की नजरें फूलों पर भी टिकी हुई हैं।
फिल्म का अधिकांश भाग उत्तराखंड के कश्मीर कहे जाने वाले खूबसूरत स्थान जखोल गांव में ही फिल्म बनाई गई है। इस फिल्म में कुछ व्यावसायिक कलाकारों का न होना ही कभी-कभी अभिनय की कमी दर्शकों को बांधने में लाती रही है, पूरे तीन घंटे तक पहाड़ी आदर्शों की महत्ता प्रशिक्षु और पलायन की एक महीन मजबूरी कि पहाड़ में शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा का अभाव दर्शकों को बार बार भाव विभोर कर रहा था।
असल में यह पहली गढ़वाली फिल्म है जिसमें भाषा का कोई बंधन नहीं रखा गया है। गढ़वाली के अलावा अंग्रेजी और अंग्रेजी का मिश्रण भी उपलब्ध है। हो सकता है कि फिल्मकार ने पहाड़ी अनाज को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर लेने के लिए इस गढ़वाली फिल्म की कहानी का ताना बाना हिंदी और अंग्रेजी के साथ बनाया हो।
फिल्म की कहानी को बहुत ही मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। कई बार दर्शकों की आंखे नम हुई। निर्देशक के लिए यह बहुत कडीन हो जाता है कि अगर फिल्म में मारधाड़ और रोमांस जैसी मसाला फिल्म न हो तो वह मनोरंजन करने में असफल हो सकती है। “मीठी – मां आशीर्वाद कू” फिल्म में कुशल निर्देशन का कमाल कहा जाएगा कि एक भी क्षण अभिनय, संवाद और भावभंगिमा दर्शकों को नहीं मिलती।
यानि एक ऐसी विपदभरी पहाड़ी कहानी जिसके ऊपर से उठती है मां बाप का साया। वह खुद और उसकी छोटी बहन किशोर अवस्था में है। पूरी ज़िम्मेदारियाँ मिस्ट्री एक्टर्स (मेघा खुगसाल) को ही निभाना होता है। मिष्ठान्न विपदभरी लड़की के चरित्र के साथ पूरी फिल्म सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
फिल्म में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई है कि उत्तराखंड में पर्यटन, पहाड़ी उत्पाद कंपनियों के बेहतरीन स्रोत हैं। कुलमिलाकर भाषा का बंधन यह गढ़वाली फिल्म वैश्विक मंच पर उत्तराखंडी पहचान के नायकों को दे सकती है।
“स्वाद भारत” का जैसे नारों के बीच जब कंडाली (बिच्छू घास) की सब्जी, झंगोर की खेड की रोटी ही नहीं जाती बल्कि संवाद और भाव भंगिमा से इसमें कोई कंजूसी नहीं होती कि पहाड़ के यह उत्पाद सुपाच्य के साथ शुद्ध जैविक भी है. पीडीएफ कोरोना काल का उदाहरण बताया गया है।
यह फिल्म मनोरंजन से लेकर, राज्य के मुद्दे और विषय वस्तु तक दर्शकों को अपनी कहानी से रु-ब-रु फिल्म में सफल रही है। इस फिल्म में 50 प्रतिशत कल्पनाओं का सहारा लिया गया तो 50 प्रतिशत से जरूरी और सच्ची कहानियों की कहानी का हिस्सा बनाया गया है। यह भी कह सकते हैं कि “मीठी – मां कू आशीर्वाद” गढ़वाली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर व्यवसाय में भी सबसे आगे रही है। फिल्म का निर्देशक उत्तराखंडी सिनेमा के जानेमाने का निर्देशन खूबसूरत कांता प्रसाद ने किया है जबकि अभिनेत्री मेघा खुगसाल ने फिल्म में बेहद अहम किरदार निभाया है। फिल्म निर्माण में सहयोगी रेजिडेंट वैभव गोयल ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।







