Thursday, May 14, 2026
Home अल्मोड़ा परम्परागत घराट उद्योग और पर्यावरण संतुलन

परम्परागत घराट उद्योग और पर्यावरण संतुलन

परम्परागत घराट उद्योग

………….…

Book
Book

वस्तुतः घराट को परम्परागत जल प्रबंधन, लोक विज्ञान और गांव-समाज की सामुदायिकता का अनुपम उदाहरण माना जाता है। सही मायने में ये घराट ग्रामीण आत्मनिर्भरता और पर्यावरण सम्मत कुटीर उद्योग के प्रतीक हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में इस परम्परागत घराट का प्रचलन सदियों पूर्व से चलता आया है। उस दौरान कई स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका इसी घराट से चला करती थी। घराट चलाने वाले को अनाज पिसाई के बदले थोड़ा बहुत अनाज मिल जाता है जिससे उसकी दैनिक रोजी-रोटी चलती है। जल शक्ति से चलने वाले इन घराटों से ग्रामीण जन स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले आनाजों यथा गेहूं, जौं, मडुवा तथा मक्का की पिसाई करके उसका शुद्व आटा प्राप्त किया करते हैं। प्रमुख बात यह है कि अब गांवों में अवस्थापना विकास सुविधाओं में बढ़ोतरी होने से विद्युत अथवा डीजल चालित चक्कियों का प्रचलन हो गया है। साथ ही साथ नदियों में आने वाली बाढ़ के प्रकोप से कई घराट नष्ट हो गये हैं। प्राकृतिक आपदाओं से कुछ नदियों की प्रवाह दिशा भीपरिवर्तित हो गई है। यही नहीं पर्यावरण असन्तुलन से कई गाड़-गधेरों में जल की मात्रा भी कम हो गई है। इन तमाम कारणों का प्रतिकूल प्रभाव इन परम्परागत घराटों पर पड़ने लगा है।
फलस्वरुप घराटों के उपयोग में तीव्र कमी आने लगी है और इनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। कुछ गिनती भर गांवों में ही वहां के स्थानीय लोग आज किसी तरह इन परम्परागत घराटों की विरासत को अपने प्रयासों से बचाये हुए हैं। उत्तराखण्ड के कोसी नदी घाटी, गगास नदी घाटी सहित कमल सिराईं पनार, गौला, लधिया, नयार, पश्चिमी रामगंगा, बालगंगा, लाहुर, बालखिला व पुंगर नदी सहित अनेक गाड़-गधेरों में स्थित घराट आज भी आंशिक तौर पर संचालित होते हुए दिखाई देते हैं।

Book
Book

स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक पुराने समय में पर्वतीय क्षेत्र की सदानीरा छोटी नदियों और गाड़-गधेरों के तट पर स्थापित ये घराट पानी की छलछलाहट और घटवारों (घराट को चलाने व उसकी देखरेख करने वाले व्यक्ति) की उपस्थिति से जीवंत बने रहते थे। तब घटवारों को अनाज पिसाई के रुप में पिसाई वाले अनाज की मात्रा को देखते हुए निर्धारित हिस्सा मिला करता था और घटवार उस प्राप्त अनाज से ही राजकोष को कर दिया करता था। इस तरह की सामाजिक विनिमय प्रणाली से तब तत्कालीन दौर की अर्थव्यवस्था चलती रहती थी। पन्द्रहवीं सदी में कुमाऊं में चंद राजाओं के शासन काल में घराटों का महत्वपूर्ण अस्तित्व रहा करता था। उस दौर के कई पुराने ताम्रपत्र अभिलेखों में भी घराटों के विवरण का उल्लेख मिलता है। बिट्रिशकार में अंग्रेजों ने घराटों के निर्माण व रखरखाव हेतु बकायदा शासन स्तर पर नि पत्र जारी किये थे। निर्धारित प्रावधानों के मुताबिक तत्कालीन समय में घराट की स्थापना करने में डिप्टी कलेक्टरों की अनुमति को अनिवार्य घोषित किया हुआ था। वर्ष 1917 व 1930 के कुमाऊँ वाटर रूल्स के आधार पर बिट्रिश शासन द्वारा घराटों पर नियंत्रण करते हुए इन पर वार्षिक टैक्स भी लगाया हुआ था। इन तथ्यों से साफ पता चलता है कि पुराने समय में इन घराटों की गांव समाज के लिए कितनी अधिक उपयोगिता रही होगी। सामान्य तौर पर घराट की बनाबट बहुत साधारण होती है। इनका निर्माण स्थानीय क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से ही किया जाता है। घराट के शिल्प कौशल में पर्वतीय लोक विज्ञान की छाप पूरी तरह दिखाई देती है। उच्च शिखरों से आने वाली जलधाराओं को कंकड, पत्थर व मिट्टी का बंध बनाकर उसके प्रवाह का रुख मोड़ दिया जाता है।
बंध से इस प्रवाह को एक छोटी गूल के जरिए लाकर उसे ऊंचाई वाली जगह से लकड़ी के पतनाले से तीव्र ढाल देकर नीचे पंखाकार गोल चकी में गिराया जाता है। जल के इस तीव्र वेग से जब चक्री घूमने लगती है तो उपर लगे घराट के पाट भी घूमने लगते हैं। घराट के पाटों के उपर शंकु आकार का एक पात्र लटका रहता है जिसमें आनाज भर दिया जाता है। पाट को स्पर्श करती हुई लकड़ी की चिड़िया धीरे-धीरे अनाज को पाट के छिद्र में गिराते जाती है। इस तरह पत्थर के पाट में दबकर अनाज की पिसाई होने लगती है। एक अनुमान के आधार पर एक परम्परागत घराट से 24 घण्टे में तकरीबन दो मन अर्थात 80 किग्रा. आटे की पिसाई हो सकती है।
निश्चित तौर पर उत्तराखंड के घराट स्थानीय समुदाय द्वारा संचालित सामूहिक व परम्परागत जल प्रबंधन की एक बेहतरीन व्यवस्था है। यह पुरातन जन व्यवस्था हमारे समाज को प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और प्रबंधन सरल व सहज तरीके से उपयोग करने का संदेश देती है। हिमालय क्षेत्र की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर यहां के ग्रामीण जनों ने जिस तरह प्रकृति प्रदत्त साधनों का दीर्घकालिक उपयोग करने की संस्कृति को विकसित करने का नायाब प्रयास किया है उसे समझने की नितांत जरुरत है। घराट जैसी बेहतरीन सामाजिक परंपराओं को पुर्नजीवित करते हुए हमें नवीनतम वैज्ञानिक सुधार के साथ इन्हें अधिक उपयोगी बनाने के प्रयास करने चाहिए।

(लेखक चंद्रशेखर तिवारी की पुस्तक ‘उत्तराखंड का प्राकृतिक भूगोल : प्राकृतिक व सामाजिक संदर्भ’ (Doon Library & Research Centre) से साभार)

RELATED ARTICLES

संस्मरण : राहुल सांकृत्यायन को पढ़ना दुनिया को समझना है, बता रहे है वरिष्ठ पत्रकार चारू तिवारी।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन: घुमक्कड़ी जिनकी वृत्ति नहीं धर्म था।   By - Charu Tiwari   हमारे पाठ्यक्रम में एक निबंध था- 'अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा।' लेखक थे- राहुल सांकृत्यायन।...

उमेश डोभाल पुण्य स्मृति : टिहरी की कनिका को मिला 25 हजार रूपये का नगद पुरस्कार। पढ़े पूरी रिपोर्ट।

By - Prem Pancholi 33वें उमेश डोभाल स्मृति समारोह के दूसरे दिन सम्मान समारोह से पूर्व राज्य की पत्रकारिता और जनहित के मुद्दों पर चर्चा...

33वां उमेश डोभाल स्मृति समारोह 24-25 मार्च को अल्मोड़ा में संपन्न।

- 33वां उमेश डोभाल स्मृति समारोह 24-25 मार्च को अल्मोड़ा में संपन्न। - सुप्रसिद्ध साहित्यकार कपिलेश भोज को दिया गया "उमेश डोभाल स्मृति सम्मान। By -...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

यात्रा संस्मरण : जब यायावर डॉ० अरुण कुकसाल मिले जखोली की डॉ० आशा से।

जीवन के आघातों से जूझकर हासिल की कामयाबी-डा. आशा। Dr. Arun kuksal श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा, मयाली से होकर जखोली पहुँचा हूँ। ‘जखोली (समुद्रतल से ऊँचाई लगभग...

फूलचंद नारी शिल्प मंदिर गर्ल्स इंटर कॉलेज में अत्याधुनिक स्टेम लैब का उद्घाटन, विज्ञान एवं नवाचार को मिलेगा नया आयाम

फूलचंद नारी शिल्प मंदिर गर्ल्स इंटर कॉलेज में अत्याधुनिक स्टेम लैब का उद्घाटन, विज्ञान एवं नवाचार को मिलेगा नया आयाम। स्पार्क टेक्नोलॉजीज , स्पेक्स एवं...

शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत संध्या का आयोजन

शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत संध्या का आयोजन।   By - Prem Pancholi ।।13 मई, 2026 ,देहरादन।। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में भारत के लोक सेवा प्रसारक...

कथाकार राम प्रकाश अग्रवाल ‘कण’ की एक और कृति पाठकों के बीच

कथाकार राम प्रकाश अग्रवाल ‘कण’ के कथा संग्रह ‘मां जिसकी गोद में सभ्यताएं पलीं’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र देहरादून के सभागार...

ट्राइकोग्रामा एक उत्तम प्राकृतिक खेती की तकनीकी। पढ़े पूरी रिपोर्ट

ट्राइकोग्रामा एक सूक्ष्म परजीवी ततैया है जो हानिकारक कीड़ों के अंडों पर हमला करता है। यह लगभग 200 प्रकार के नुकसानदायक कीटों के अंडों...

स्मृति शेष : बलदेव सिंह आर्य -उत्तराखंड में शिल्पकार पहचान

बलदेव सिंह आर्य -उत्तराखंड में शिल्पकार पहचान   By - Vinod Arya   सामाजिक न्याय, शिल्पकार चेतना और समानता के महान अग्रदूत बलदेव सिंह आर्य जी (12 मई...

वरिष्ठ साहित्यकार राम प्रकाश अग्रवाल कण की पुस्तक का लोकार्पण।

पुस्तक लोकार्पण "मॉं जिसके गोद में सभ्यताएं पलीं" लेखक - राम प्रकाश अग्रवाल कण, प्रकाशन - समय साक्ष्य (देहरादून)   By - Neeraj Naithani ।।   लैंसडाउन चौक स्थित...

तुलसी माला को लेकर क्यों विरोध कर रहे हैं बद्रीनाथवासी? पढ़े पूरी रिपोर्ट

By - Sanjana bhagwat   बद्रीनाथ धाम में तुलसी माला को लेकर बामणी गांव के लोगों द्वारा किया जा रहा विरोध केवल एक व्यापारिक विषय नहीं,...

12 मई विशेषांक : शिल्पकारों के उत्थान के लिए लड़ते रहे बलदेव सिंह आर्य।

‘जातीय जड़ता जाने का जश्न मनायें’। उत्तराखण्ड के शिल्पकार वर्ग में सामाजिक-शैक्षिक चेतना के अग्रदूत बलदेव सिंह आर्य (12 मई, 1912 से 22 दिसम्बर, 1992)...

अक्टूबर में होगा फिल्म पुरुस्कार समारोह : उफ्तारा

अक्टूबर में होगा फिल्म पुरुस्कार समारोह। फिल्म परिषद का कार्यालय शीघ्र। सी.ई.ओ. बंशीधर तिवारी का उफतारा ने जताया आभार। दूरदर्शन और संस्कृति विभाग को...