Thursday, May 14, 2026
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उमेश डोभाल पुण्य स्मृति : टिहरी की कनिका को मिला 25 हजार रूपये का नगद पुरस्कार। पढ़े पूरी रिपोर्ट।

By – Prem Pancholi

33वें उमेश डोभाल स्मृति समारोह के दूसरे दिन सम्मान समारोह से पूर्व राज्य की पत्रकारिता और जनहित के मुद्दों पर चर्चा हुई। जबकि पहले दिवस में उमेश डोभाल स्मृति स्मारिका का भी लोकार्पण किया गया।

प्रथम सत्र के दौरान वरिष्ठ रंगकर्मी जहूर आलम ने कहा कि जो समाज में बुरा हो रहा है, या जो बुरा कर रहे है उन्हें कैसे सामने लाया जाए। इस हेतु सामूहिक प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश ऐसे जगह खड़ा है जहां से आगे अंधेरा दिखाई दे रहा है। मगर कुछ “मसाले जलाई” जा रही है, कुछ “दिए जलाए” जा रहे है उनकी तरफ जाना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता पीसी तिवारी ने कहा कि आज की पत्रकारिता दिशा भटक गई है। आज जो जनता के मुद्दे है वे तथा कथित मुख्यधारा के अखबारों से गायब हो चुके है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखंड राज्य में राज्य आंदोलन के नाम पर बहुत घपला हो रहा है।
इतिहासविद पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक ने कहा कि उमेश डोभाल स्मृति ने जिन्हें सम्मानित किया है वे व्यक्तित्व है। इसलिए उम्मीद बरकरार है कि चिंगारी अभी बची हुई है। उन्होंने अपने वक्तव्य से सौ साल पहले की कुछ खास घटनाओं को याद करवाया। कहा कि जब पहला विश्व युद्ध हुआ था तब उस गर्दिश के दौर में इस हिमालय क्षेत्र के हजारों सैनिक इस युद्ध में सम्मिलित हुए। उसके तुरंत बाद अल्मोड़ा में ही एक नागरिक संगठन बना, जिसे कुमाऊ परिषद नाम दिया गया। कहा कि यही दिलचस्प है कि इस परिषद की कार्यशाला से कई नामचीन हस्तियां निकली जिन्होंने देश और दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने उदाहरण दिया कि 1920 में गोविंद बल्लभ चुनाव हार गए, क्योंकि उन दिनों अंग्रेजों और राजाओं का वर्चस्व था। सो उसके बाद जब दूसरा चुनाव हुआ तो इन्होंने राय बहादुरों को बुरी तरह पटका जो इतिहास में दर्ज है। यह भी कहा कि तत्काल हमारी पत्रकारिता एकदम धार धार थी। इसी शहर से शक्ति अखबार छपा जो सौ साल तक छपता रहा। और भी कई अखबार छपे। भले इनके संपादक सरकारी अधिकारी के परिचय में होते थे, मगर वे जनपक्ष को लिखने में चूक नहीं करते थे। उन्होंने कहा कि आज की पत्रकारिता कॉरपोरेट की हो गई है। यह समस्या पूरी दुनिया की है। राज्य के 25 सालों पर उन्होंने कहा कि यह 25 साल पराजय, अविश्वास, अविवेक के 25 साल रहे है। हेतु इस दौरान ठेकेदार, लाइजनर, यहां तक की कुछ पत्रकार, या मीडिया संस्थान खूब फल फूल गए। जब यहां के मुख्यधारा के अखबार अंकिता हत्याकांड को हेड लाइन नहीं दे पाए तो इनके बारे में और क्या कहा जा सकता है। इसके अलावा अखबारों ने कई एडिशन छापने आरंभ कर दिए। जो लोगो को बांटने का षड्यंत्रकारी पहल है। उन्होंने दुःख व्यक्त किया कि उन्हें भी 1994 में राज्य के आंदोलन से लग गया था कि इस आंदोलन में कहीं कुछ खोट दिखाई दे रहा है। जो अब सामने आ गया है। वे अल्मोड़ा को एक विचार की थाती बताते हुए कह रहे थे कि आजादी के बाद और पहले, तब सामाजिक आंदोलन में दम था, आवाज थी। यही वजह रही कि यही आंदोलन बाद के समय में राजनीतिक आंदोलन बन गए। मगर वर्तमान में
सामाजिक आंदोलन का न होना या सामाजिक आंदोलनों को नेतृत्व न मिलना यह भी खतरा तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इसीलिए हमारी राजनीति बिगड़ैल हो गई है। फिर भी उन्होंने आशा व्यक्त की है कि आज भी समाज जिंदा है, आवाज है मगर कलाकार, लेखक या पत्रकार संगठित नहीं हो पा रहे है। चूंकि सामाजिक संगठनों का ऐसे वक्त होना जरूरी है। उन्होंने उदाहरण दिया कि उत्तराखंड संघर्षवाहिनी, उत्तराखंड क्रांतिदल जब सामाजिक संगठन से राजनीतिक संगठनों की ओर बढ़े तो उसका हश्र सबके सामने आ चुका है। यह अब बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।
उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट के अध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू ने कहा कि यहां पिछले दो दिनों से चिंतन हो रहा है। कहा कि उमेश डोभाल की पत्रकारिता एकदम जनता की पत्रकारिता थी। कहा कि राज्य बनने बाद जो बदला वह सब नकारात्मक दिशा की ओर बदल रहा है, जो बेहद दुखद है। अब मीडिया संस्थानों ने वर्किंग पत्रकार एक्ट का तोड़ निकाला है कि 11 माह के अनुबंध के अनुसार अमुक पत्रकार को कार्य करना है। यह भी तय है कि अमुक को पत्रकार नहीं यह एक एजेंट या एजेंसी कार्यकर्ता होगा। उन्होंने चिंता व्यक्त की है कि उत्तराखंड सरकार ने लखनऊ के एक टैबलेट अखबार को 11 करोड़ का विज्ञापन दिया है जो अखबार कही कभी छपता होगा। किसी को मालूम नहीं। इस दौरान विभिन्न लोगों ने भविष्य के कार्यक्रम हेतु प्रस्ताव प्रस्तुत किए है।
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अंकिता भंडारी हत्या कांड में जिस व्यक्ति का नाम आया है उसकी तुरंत पूछताछ हो।
– खनन का कार्य तेजी से बढ़ा रहा है इसके लिए पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक अलग से नीति बने।
– शिक्षा स्वास्थ्य का बाजीरीकरण बंद हो।
– धार्मिक संस्थाओं पर हो रही कानूनी कार्यवाही में निष्पक्षता नहीं हो रही है। – नजूल और वन भूमि पर बसे लोगों को जबरन हटाया जा रहा है। उन्हें यथा स्थान ही मालिकाना हक दिया जाए।
– बाजपुर के पत्रकार विमल भारती के साथ हुए अमानवीय व्यवहार तथा उनके पक्ष में पत्रकार संगठनों आगे आना होगा, तथा ट्रस्ट इस ओर पहल करे। उक्त प्रस्ताव जब श्री पंत पढ़ रहे थे तो सभी प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हुए।

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इस दौरान शिक्षक और जल योद्धा मोहन कांडपाल ने अपनी घर वापसी की कहानी बताते हुए कहा कि 1990 में ही वे कानपुर शहर से वापस अपने गांव सुरईखेत आ गये। उन्हीं दिनों उन्होंने वही के इंटर कॉलेज में पढ़ाना आरम्भ किया। जब वह अपने आस पास देख रहे थे तो पानी की समस्या यदाकदा दिखती थी। सो वे स्कूली बच्चों और आस पास की महिला, युवा संगठनों के साथ हो लिए और जल संरक्षण की पहल आरंभ कर दी। वर्तमान में एक छोटी नदी जीवित हो उठी। पिछले 30 सालों में वृहद जंगल तैयार किया गया। उन्होंने कहा कि उन्होंने इस कार्य के वनस्पत 36 सालों तक एक ही स्कूल में पढ़ाया है। पिछले 30 सालों का फलसफा है कि 27 नौलों में पानी वापस आ गया है।यह एक सामूहिक प्रयास था जो सफल हो रहा है। उन्होंने कहा कि नदियों के कैचमेंट एरिया में ही जल संरक्षण के कार्य हो। ताकि सभी प्राकृतिक धाराएं सरसब्ज रहे। यह भी कहा कि राष्ट्रीय नदी के बारे में बड़े बड़े नारे श्लोक है, अपने पास के जल धारे को हम नहीं जानते। हमने ऐसा करके दिखाया कि सुरईखेत के आस पास 62 गांवों की महिला समूह इस कार्य में लगे हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि गांव को सुनाने मत जाइए, गांव को सुनने जाएं। तभी आप किसी मोड़ पर पहुंच सकते है।

पत्रकार दिनेश उपाध्याय ने अपनी एक कविता इस तरह प्रस्तुत करते हुए कहा कि 25 साल, बेमिसाल, विज्ञापन पर करोड़ों फुक डाले, जनता बजाए गाल,

पत्रकार गुंजन ने कहा कि 25 सालों में पत्रकारिता में ढांचागत स्थितियां अधिक बढ़ी है। मीडिया में “चेन ऑफ वर्क” टूटता दिखाई दे रहा है। जिस कारण कई समस्या सामने आ रही है। जैसे जनप्रतिनिधि भय रहित हो गए हों। उन्होंने कहा कि श्रमजीवी पत्रकारों के सामने आजीविका का सवाल भी तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला ने कहा कि सरकार भी बड़ा जश्न मना रही है कि राज्य को बने 25 साल हो गए है। कहा कि शहरों का विकास होना एक बात है पर संस्थानों को बिगाड़ना बहुत खतरनाक है। यानी हर मेडिकल कॉलेज से मरीज को रेफर किया जा रहा है। यह 25 सालों का सफर बता रहा है। इसलिए कि सरकारी अस्पताल का चिकित्सक सरकारी सेवा छोड़कर प्राइवेट अस्पताल में सेवा दे रहा है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बहुत तेजी से गिरी है।
इसी तरह मीडिया का भी हाल है। कहा कि मुख्यधारा का मीडिया एकदम सत्ता का चाटुकार बन गया है। उन्होंने उदाहरण दिया कि देहरादून में राजधानी आने से ऐसा हुआ कि जितने वे जिला स्तर के पत्रकार थे वे राज्य स्तर की जिम्मेदारी निभाने लग गए। अर्थात कमजोर जानकारी के अभाव में भी स्थितियां बिगड़ी है।
वरिष्ठ पत्रकार शंकर भाटिया ने कहा कि मुख्यधारा के अखबारों में स्वतंत्रता खत्म हो गई है। तात्पर्य यही है कि मीडिया संस्थानों की गाइडलाइन के अनुसार ही खबरें लिखनी होती है। इसलिए यह कहना गलत है कि मुख्यधारा का पत्रकार है।
अच्छा हो कि वैकल्पिक मीडिया या स्वतंत्र पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सामूहिक कार्य हों।
सामाजिक कार्यकर्ता रमेश मुमुक्षु ने कहा कि खेती किसानी सिमटती जा रही है। जंगली जानवरों का खतरा बढ़ा है। इसके लिए जो सफल कार्य हुए है उन पर मुख्यधारा के अखबार खबर नहीं लिखते है। पत्रकार सूरज कुकरेती ने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थान नीरस बनते जा रहे है। अच्छा हो कि यहां के उच्च शिक्षण संस्थानों को गुणवत्तापूर्ण बनाया जाए। वैशाली ने उमेश डोभाल की कविता बसंत दस्तक दे रहा है से अपनी बात रखी। कहा कि वह इस विषय के लिए एकदम नई है। आंदोलनकारी व पत्रकार ओ. पी. पांडे ने कहा कि राज्य में जितनी गड़बड़ियां हो रही वह कम होने का नाम नहीं ले रही है। राज्य के आंदोलन में रहे वरिष्ठ नागरिक अपने को ठगा सा महसूस कर रहे है। इस विकास की यात्रा में 25 सालों का आउटपुट कुछ भी नहीं है। मात्र सड़क खोद देना संपूर्ण विकास नहीं कहा जाएगा। उन्होंने कहा कि मौजूदा मीडिया कहीं अन्य जगह से संचालित हो रहा है। अच्छा हो कि राहुल कोटियाल के बारामासा जैसे वैकल्पिक मीडिया तैयार करना होगा। यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं या उनके रिश्तेदारों की नियुक्तियां की जा रही है।
राज्य आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी ने कहा कि राज्य में सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक मूल्यों में बहुत गिरावट आई है। यह खतरा इसलिए बढ़ा कि लोग राजनीतिक हस्तक्षेप से बचना चाहते है।
वरिष्ठ पत्रकार रमेश पांडे कृषक ने कहा कि उमेश डोभाल की हत्या से पहले तीन महीने तक उनकी खबर लापता बताइ गई। जबकि उन्हें तब तक उस शराब माफिया ने मार दिया था। उन्होंने कहा कि राज्य के दूरस्थ गांव की हालत नहीं सुधरी बजाय उनके हाथों से उनके संसाधन लुटे जा रहे है। जिसका हस्र यह है कि राज्य बनने के बाद पंचायती वन व्यवस्था को ग्राम वन पंचायत के नाम से सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया है। कहा कि 25 सालों से गांव गांव पुलिस का पहरा बढ़या गया।
उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट के सचिव नरेश नौडियाल ने कहा कि ट्रस्ट से जुड़े और अब दिवंगत है उनके नाम पर भी स्मृति समारोह होता है। उन्होंने कहा कि अखबार के मालिक वे है जो सरकार के लाभार्थी है। लेकिन पत्रकार नागरिकों के सहयोगी है। उन्होंने आशा जताई कि आज वैकल्पिक मीडिया मौजूद है। इसे ही हम सभी लोग प्रोत्साहित करें। ट्रस्ट के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के पास सीमित संसाधन है इसलिए कार्यक्रम भी सीमित हो पाते है।

वरिष्ठ पत्रकार चंद्र मोहन पपनै ने कहा कि उम्मीद और संगठन बहुत जरूरी है। रामनाथ गोयनका की जीवनी लिखते वक्त उन्होंने कई चीजें समझी है। कालांतर में पत्रकारिता का अर्थ हुआ करता था, पर आज यह अर्थ अनर्थ होता जा रहा है। पत्रकारों को संगठित रहना ही होगा।
वरिष्ठ पत्रकार नवीन बिष्ट ने कहा कि कही कोई चिंगारी है, जो हमें बचाकर रखनी है। निराश होने की कोई चिंता नहीं है। जबकि समारोह को वयोवृद्ध दयाशंकर टम्टा ने भी संबोधित किया है।
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– सम्मान –
उमेश डोभाल पुरस्कार वरिष्ठ साहित्यकार कपिल भोज को, गिरीश तिवाड़ी गिर्दा सम्मान रंगकर्मी यमुनाराम, राजेंद्र रावत सम्मान किशन सिंह मलाणा को जबकि पत्रकारिता और सोशल मीडिया सम्मान विजय सिंह रावत को दिया गया है। इधर राजू साजवान को भी पत्रकारिता और सोशल मीडिया। शंभू राणा को लंबे समय से लेखन और पत्रकारिता के लिए सम्मानित किया गया है।
दूसरी ओर अनिरुद्ध जोशी सम्मान टिहरी के कनक राज, मोनिका पंवार को इसमें इन्हें 25- 25 हजार की धनराशि दी गई है। ये मेधावी छात्र है।

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