जब ”नाकपति” के कारण सरस्वती को भी लज्जित होना पड़ा

Govind Prasad Bahuguna
तुलसीदास जी पहुंचे हुए समीक्षक थे l बुद्धिजीवी लोग राजनीतिक हालत पर सीधा कुछ न कहकर कहानियों के बीच अपने मन की बात बोलने के कुशल खिलाड़ी होते हैं -समय कोई भी रहा हो, रामायण काल हो या महाभारत काल या फिर आजकल का समय -तुलसीदास जी भी उन्हीं बुद्धिजीवियों में थे l उनकी टिप्पणी आज की परिस्थितियों में भी उतनी ही सटीक और सच लगती है जो उनके समय में सत्ताधारियों के चरित्र में दिखाई देती थी ।
पावर पालिटिक्स का खेल सबने खेला है, तब चाहे वे “देवेन्द्र” रहे हों या कोई नरेन्द्र- , नाम में क्या रखा है ? चरित्र और सोच में तो कोई अन्तर नहीं है। रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास जी ने यह टिपण्णी सरस्वती देवी के हवाले से देवताओं के सन्दर्भ में उस समय की थी जब इन्द्र ने अयोध्या में तख्ता पलट करने का प्लान बनाया था और इस काम में सरस्वती को लगा दिया, उसकी खूब तारीफ की, प्रलोभन दिए होंगे -बेचारी सरस्वती को अपनी नौकरी बचाने के लिए देवताओं के षड्यंत्र में शामिल होना पड़ा लेकिन मन ही मन वह कुढ़ती रही -कि मैं कहाँ आकर फंस गयी !!
-“बार बार गहि चरन संकोची।चली बिचारि बिबुध मति पोची।ऊंच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।” “इन्द्र” सत्तासीन देवता का पदनाम होता था I धार्मिक साहित्य में इस बात के प्रमाण है कि “इंद्र” का चरित्र कभी उज्जवल नहीं रहा है – उसने स्त्रियों का यौन उत्पीड़न किया और उनके साथ छेड़खानी की -अपने समय के प्रतिष्ठित एक गुरुकुल के आचार्य गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या का प्रकरण सबको पता है , वनवास अवधि में इन्द्र के साहबजादे “जयंत” ने सीता जी के साथ अश्लील हरकत करने की कोशिश की थी जिसके परिणामस्वरूप उसको अपनी एक आँख गवांनी पड़ी थी I सत्ताधारियों का चरित्र आज भी वैसा ही है जिसका तजा उदाहरण उत्तर पूर्व कै प्रदेशों में घटित घटनाएं हैं I
इसी तरह का एक अन्य उल्लेखनीय प्रसंग रामचरितमानस में राजा “एकतनु” का है जिसमें उसने कपटमुनि का वेश धारण कर एक नेक राजा प्रताप भानु को अपने षड्यंत्र का शिकार बनाया I यह “एकतनु” भी सांकेतिक नाम है – एकतनु का मतलब “अकेला छडा आदमी” उस छद्मवेशी मुनि ने कपट में डुबोकर बड़ी युक्ति के साथ प्रताप भानु को अपना परिचय इस प्रकार दिया -“कपट बोरि बानी मृदल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥” आप देखिये कि वर्तमान राजनीतिक चरित्रों में भी ऐसे अनेक कपट मुनि आपको मिल जाएंगे ——- धार्मिक साहित्य में आप देखते हैं कि प्राचीन ऋषि – मुनि डर के मारे यज्ञ में पहली आहुति (यज्ञ भाग) देवताओं के राजा”इन्द्र” को देते थे और उसके नाम का मंत्रोच्चार कर उसका आह्वाहन करते थे , उसका गुणगान करते थे – ” ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः—” “ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्
ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:”जब जरा ध्यान दीजिये कि आज भी इन्द्र को “आहुति” देने यानी उसका हिस्सा (share) देने का प्रचलन बरक़रार है I इसको इस तरह समझिये कि -“यज्ञ” का अर्थ होता है किसी शुभ कार्य का प्रारंभ ,किसी नये “उद्योग” , अभियान आदि की शुरुआत करना I अंग्रेजी में बोलें तो इसका मतलब opening a Project, Enterprise,installation of Industrial Plant, Business etc जिसको शुरू करने से पहले निवेशक पूंजीपति पहले “इन्द्र” के दरवार में हाजिरी लगाकर उसका यज्ञ भाग (शेयर) उसको पहुंचा देते हैं ताकि लाइसेंस लेने में कोई दिक्कत न आये, तब कोई काम शुरू हो पाता है I संस्कृत में स्वर्ग को “नाक” कहते हैं ( “”न नाकपृष्ठं, न च पारमेष्ठ्यं, न सार्वभौम, न रसाधिपत्यम्।न योगसिद्धिर्पुनर्भवम् वा,समंजसत्वा, विरहय्य कांक्षे ॥(श्रीमद्भागवत स्कन्ध ६ -वृत्रासुर द्वारा विष्णु की स्तुति ) तो इस प्रकार स्वर्ग का मालिक नाकपति यानी इन्द्र हुआ I मनोविश्लेषक कहते हैं कि “नाकपति” उसको कहते हैं जिसकी “नाक” ऊंची होती है और जो Egoist और घमंडी स्वाभाव के आदमी होते है I
ऐसे व्यक्ति के अंदर हीन भावना भी बसी होती है जिसको वह अपने अहंकार के भीतर छिपाए रखता है I जहाँ उसके अहं को चोट पहुँचने का खतरा होता है ,वह उसकी जड़ खोदने में लग जाता है, यही आदत इन्द्र की भी थी I वह समय -समय पर मृत्युलोक के भ्रमण पर रहता था कि देखें कौन ऋषि मुझसे मेरे “इन्द्रपद” छीनने के खातिर तपस्या कर रहा है, उनकी तपस्या भंग करने के लिए वह अप्सराओं को भेजता था- आज भी ऐसे स्केण्डल सत्तासीन दलों द्वारा अपने विरोधियों को फंसाने के लिए अंजाम दियै जाते हैं अथवा सरकारी मशीनरी के जरिये उन्हें परेशान किया जाता हैं— ।







