Thursday, May 14, 2026
Home entertainment भावनात्मक रूप से व्यवस्था पर चोट करती गढ़वाली फिल्म जलमभूमि

भावनात्मक रूप से व्यवस्था पर चोट करती गढ़वाली फिल्म जलमभूमि

By – Prem Pancholi

 

“जलमभूमि” गढ़वाली शब्द है। जिसे हम जन्मभूमि भी कह सकते है। इस शब्द को कहानी का रूप दिया गया है। जी हां! उत्तराखंड सिनेमा के जानेमाने अभिनेता और निर्देशक राम नेगी व अभिषेक मेंदोला की जोड़ी ने इसी शब्द पर कहानी का ताना बना जोड़ा और एक फिल्म का रूप दे दिया। जो देहरादून सहित अन्य छः शहरों में एक साथ रिलीज हो गई है।

उल्लेखनीय यह है कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या “स्वास्थ्य” है। जिसका इस फिल्म में खूब चरित्र चित्रण किया गया है। जितना दोष सरकारों का है उतना दोष हमारा भी खुद का है। इसलिए फिल्म की कहानी हमे सिखाती है कि कुछ गलतियां हमारी भी है जिस कारण पलायन हो रहा है। सवाल खड़ा करती यह फिल्म कि पहाड़ की मामूली सी खेती बाड़ी से एक विधवा ने भारी भरकम फीस चुकाकर अपने लाडले को डॉक्टर बना दिया। मगर वह भी स्वास्थ्य सेवाएं शहर में देने लग गया। इस वियोग में वह अपनी जान गंवा देती है। यह दृश्य दो तरह के ऊहापोह को स्पष्ट दिखाता है कि बेरोजगारी में भी मोटी फीस चुकाई जा सकती है। जिसके लिए हर पहाड़ी कहता है कि पहाड़ में कुछ नहीं होता। दूसरी तरफ उस मजबूरी को दिखाया गया कि किस तरह से पेशेवर गांव छोड़ देते है।

दरअसल उत्तराखंड सिनेमा की यह पहली फिल्म कही जा सकती है कि कैसे पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाएं लड़खड़ा रही है। इस तरह फिल्म का यह संदेश हो सकता है। मगर फिल्म का क्लाइमेक्स एक नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। जहां अभिनेता अभिनव चौहान और अभिनेत्री अंकिता परिहार के अत्यंत भावनात्मक अभिनय ने यह साबित कर दिखाया कि उत्तराखंडी सिनेमा ऊंचाई छूं सकता है। कहानी में किस तरह एक विधवा अपने बेटे को चिकित्सक बनाना चाहती है जिसके खातिर वे अपना सबकुछ न्योछावर कर देती है। जबकि फिल्म की कहानी तब और मजबूती के साथ आगे बढ़ती है जब समाज उसी परिवार को यानी उस विधवा के दोनों बेटों को उनका रिश्ता बताता है।

दरअसल समाज ही है जो व्यक्ति, व्यक्ति में दरार डाल सकता है जैसे कि इस फिल्म की कहानी की एक खास कड़ी बता रही है। ऐसा चूंकि समाज में होता ही है। फिल्म यह बताने में सफल रही कि समाज में बाते हर किसी के बारे में होती ही रहती है। किंतु अमुक को अपने भविष्य को कैसे सुरक्षित करना है वह निर्णय स्वयं ही लेना होता है। इसी तरह फिल्म की कहानी कभी निराश करती है कभी खुशियों की तरफ बढ़ती है। इसलिए कि कहानी की पात्र जिसे विधवा दिखाया गया उसे अपने लाडले को डॉक्टर बनाना है और गांव में ही उसके लिए एक अस्पताल बनाना है। ताकि वह गांव में रहकर स्वास्थ्य सेवाएं दे सके। डॉक्टर बनाने के लिए बड़े भाई ने भी अपने को समर्पित कर दिया और अपनी मां के साथ घर गृहस्थी में इसलिए जुट जाता है कि उसे अपने भाई को डॉक्टर जो बनाना है।

हालांकि यह कहानी मौजूदा दौर में आम बात है। पर फिल्म के लिए बुना गया ताना बाना समाज की उस सच्चाई को बताने में सफल रहता है जिससे समाज और परिवार टूटते है। फिल्म की कहानी का आधा हिस्सा फ्लैशबैक में चलती है। की होनहार के सामने संकट ही पैदा होते है? अतः इसी संकट का सामना भी अभावग्रस्त होनहार ही कर सकते है। जैसे इस फिल्म के पात्र सूरज यानी अभिनव चौहान ने अपने अभिनय से करके दिखाया है।

फिल्मी की मुख्य अभिनेत्री अंकिता परिहार ने मां के रूप में जो अभिनय किया वह हर दर्शको के दिल और दिमाग में छाप छोड़ चुकी है। इसी तरह मुख्य अभिनेता अभिनव चौहान ने भी अपने मंजे हुए अंदाज में मौजूद दर्शकों को भाव विभोर कर दिया है। फिल्म के सभी पात्र कहानी में अपने अपने अभिनय के मार्फत डूबे हुए दिखे। खास बात यही है कि यह फिल्म दर्शकों को मनोरंजन की तरफ ले जाती है तो वहीं हर सीन में सोचने के लिए मजबूर भी कर देती है। समाज और परिवार में टूटन, पहाड़ में चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था आदि विषयों पर बार बार चोट करती है।

इस फिल्म में सबसे बड़ी कमी यह दिखी कि न कोई राजनेता, न कोई मारधाड़ और न किसी प्रकार के अन्य धंधेबाजी। फिर भी यह फिल्म संवाद व अभिनय से दर्शकों को बांधे रखती है। जैसे फिल्म आरंभ में एक बारगी गमगीन माहौल बना देती है तो मध्य में समाज, परिवार और सुविधाओं पर चोट करती है। परन्तु अंत तक आते आते फिल्म अपनी कहानी के अनुरूप माहौल को गमगीन तो बनाती है, साथ साथ समाज में हो रही स्वास्थ्य की असुविधा के लिए भी हम स्वयं जिम्मेदार है। मगर अंत में फिल्म की कहानी संदेशपरक हो जाती है कि यदि हम चाहे तो सभी कुछ संभव है। जहां फिल्म की कहानी स्पष्ट करती है कि स्वास्थ्य की असुविधाओं को सुविधायुक्त बनाया जा सकता है। अर्थात फिल्म में कहानी के मुख्य पात्र सूरज शहर और उसकी चिकित्सक दोस्त अपने स्वास्थ्य केंद्र छोड़कर वापस अपने गांव लौटकर स्वास्थ्य केंद्र संचालित करते है। इसी के इर्द गिर्द समाज के खास पहलुओं का चरित्र चित्रण किया गया है, जो बार बार दर्शकों को कचौटता रहता है।
कुलमिलाकर औसतन एक और अच्छी गढ़वाली फिल्म कही जा सकती है। गीतों की लेंथ कम, संवाद और अभिनय पर सर्वाधिक कार्य देखा गया है। प्रेम और काल्पनिक पक्षों को सीमित मगर दमदार तरीके से चरित चित्रित किए गए। संवाद जहां साफ सुथरी गढ़वाली में थे वही हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों का भी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किए गए है। कह सकते हैं कि नॉन गढ़वाली भी फिल्म देखकर कहानी को समझ सकते है। इस तरह फिल्म अपने समय से ढाई घंटे तक दर्शकों को बांधे रखती है।

RELATED ARTICLES

यात्रा संस्मरण : जब यायावर डॉ० अरुण कुकसाल मिले जखोली की डॉ० आशा से।

जीवन के आघातों से जूझकर हासिल की कामयाबी-डा. आशा। Dr. Arun kuksal श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा, मयाली से होकर जखोली पहुँचा हूँ। ‘जखोली (समुद्रतल से ऊँचाई लगभग...

फूलचंद नारी शिल्प मंदिर गर्ल्स इंटर कॉलेज में अत्याधुनिक स्टेम लैब का उद्घाटन, विज्ञान एवं नवाचार को मिलेगा नया आयाम

फूलचंद नारी शिल्प मंदिर गर्ल्स इंटर कॉलेज में अत्याधुनिक स्टेम लैब का उद्घाटन, विज्ञान एवं नवाचार को मिलेगा नया आयाम। स्पार्क टेक्नोलॉजीज , स्पेक्स एवं...

शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत संध्या का आयोजन

शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत संध्या का आयोजन।   By - Prem Pancholi ।।13 मई, 2026 ,देहरादन।। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में भारत के लोक सेवा प्रसारक...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

यात्रा संस्मरण : जब यायावर डॉ० अरुण कुकसाल मिले जखोली की डॉ० आशा से।

जीवन के आघातों से जूझकर हासिल की कामयाबी-डा. आशा। Dr. Arun kuksal श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा, मयाली से होकर जखोली पहुँचा हूँ। ‘जखोली (समुद्रतल से ऊँचाई लगभग...

फूलचंद नारी शिल्प मंदिर गर्ल्स इंटर कॉलेज में अत्याधुनिक स्टेम लैब का उद्घाटन, विज्ञान एवं नवाचार को मिलेगा नया आयाम

फूलचंद नारी शिल्प मंदिर गर्ल्स इंटर कॉलेज में अत्याधुनिक स्टेम लैब का उद्घाटन, विज्ञान एवं नवाचार को मिलेगा नया आयाम। स्पार्क टेक्नोलॉजीज , स्पेक्स एवं...

शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत संध्या का आयोजन

शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत संध्या का आयोजन।   By - Prem Pancholi ।।13 मई, 2026 ,देहरादन।। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में भारत के लोक सेवा प्रसारक...

कथाकार राम प्रकाश अग्रवाल ‘कण’ की एक और कृति पाठकों के बीच

कथाकार राम प्रकाश अग्रवाल ‘कण’ के कथा संग्रह ‘मां जिसकी गोद में सभ्यताएं पलीं’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र देहरादून के सभागार...

ट्राइकोग्रामा एक उत्तम प्राकृतिक खेती की तकनीकी। पढ़े पूरी रिपोर्ट

ट्राइकोग्रामा एक सूक्ष्म परजीवी ततैया है जो हानिकारक कीड़ों के अंडों पर हमला करता है। यह लगभग 200 प्रकार के नुकसानदायक कीटों के अंडों...

स्मृति शेष : बलदेव सिंह आर्य -उत्तराखंड में शिल्पकार पहचान

बलदेव सिंह आर्य -उत्तराखंड में शिल्पकार पहचान   By - Vinod Arya   सामाजिक न्याय, शिल्पकार चेतना और समानता के महान अग्रदूत बलदेव सिंह आर्य जी (12 मई...

वरिष्ठ साहित्यकार राम प्रकाश अग्रवाल कण की पुस्तक का लोकार्पण।

पुस्तक लोकार्पण "मॉं जिसके गोद में सभ्यताएं पलीं" लेखक - राम प्रकाश अग्रवाल कण, प्रकाशन - समय साक्ष्य (देहरादून)   By - Neeraj Naithani ।।   लैंसडाउन चौक स्थित...

तुलसी माला को लेकर क्यों विरोध कर रहे हैं बद्रीनाथवासी? पढ़े पूरी रिपोर्ट

By - Sanjana bhagwat   बद्रीनाथ धाम में तुलसी माला को लेकर बामणी गांव के लोगों द्वारा किया जा रहा विरोध केवल एक व्यापारिक विषय नहीं,...

12 मई विशेषांक : शिल्पकारों के उत्थान के लिए लड़ते रहे बलदेव सिंह आर्य।

‘जातीय जड़ता जाने का जश्न मनायें’। उत्तराखण्ड के शिल्पकार वर्ग में सामाजिक-शैक्षिक चेतना के अग्रदूत बलदेव सिंह आर्य (12 मई, 1912 से 22 दिसम्बर, 1992)...

अक्टूबर में होगा फिल्म पुरुस्कार समारोह : उफ्तारा

अक्टूबर में होगा फिल्म पुरुस्कार समारोह। फिल्म परिषद का कार्यालय शीघ्र। सी.ई.ओ. बंशीधर तिवारी का उफतारा ने जताया आभार। दूरदर्शन और संस्कृति विभाग को...