“मस्तानी अलमस्त” शराबी बैठी अपने खाने में।
Govind P. Bahuguna
कवि मोलाराम मुसब्बर खैंची यह तस्वीर रिझाने में”-GPB
चित्रकला के इतिहास में गढ़वाल का नाम दर्ज करवाने का श्रेय सुप्रसिद्ध कला समीक्षक और कला प्रेमी स्वर्गीय मुकन्दी लाल जी बैरिस्टर को ही दिया जाता है, जिन्होंने इस विषय पर एक बहुत सुंदर पुस्तक The Garhwal Paintings टाइटल देकर लिखी थी I मुकंदीलाल जी ने लगभग ५० वर्षों के अथक परिश्रम ,लगन और शोध कार्य के पश्चात्, उपेक्षा और गैरजानकारी की खोह में दबी हुई चित्रकार मोलाराम की प्रतिभा को उजागर कर उनकी अद्भुत कलाकृतियों को कलाप्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत करने के साथ ही भारतीय चित्रकला के इतिहास में “गढ़वाली शैली* को भी प्रतिष्ठापित करके निःसंदेह एक ऐतिहासिक कार्य किया है I
उनकी इस पुस्तक का प्रकाशन भारत सरकार द्वारा वर्ष १९६९ में किया गया था और इस ऐतिहासिक कृति पर उन्हें भारत सरकार द्वारा पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। मैंने तो यह पुस्तक सन १९८४ में * गौरी पुस्तकालय, मालवीय उद्यान, कोटद्वार, गढ़वाल की लाइब्रेरी में पढ़ा था। फिर उसी पुस्तक के आधार पर मेरी एक रेडियो वार्ता आकाशवाणी नजीबाबाद द्वारा भी प्रसारित की गई थी।
चित्रकार और कवि मोलाराम तोमर के पूर्वज मुग़ल सम्राट शाहजहां के बेटे दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह के १७ ‘सिपह-सालार ( सैन्य सलाहकारों ) के साथ १६५८ ई में श्रीनगर गढ़वाल पहुंचे , जहां उन्होंने गढ़वाल नरेश पृथ्वीपत शाह से शरण मांगी क्योंकि दिल्ली की सल्नत के खातिर औरंगजेब और दाराशिकोह में संघर्ष चल रहा था और औरंगजेब के गद्दीनशीन होने की पूरी संभावना बन रही थी I
सुलेमान शिकोह के १७ सलाहकारों में मोलाराम के पूर्वज शामशाह और हरदास पिता-पुत्र भी शामिल थे। गढ़वाल नरेश पृथ्वीपत शाह ने पिता पुत्र दोनों को अपने दरबार में मुसब्बर (चित्रकार) के रूप में नियुक्ति देकर शरण दी, इसी घटना से गढ़वाल में चित्रकला की नीव पड़ी I
मोलाराम अद्भुत चित्रकार ही नहीं कवि भी थे।
मोलाराम ने अपने पिता से मुग़ल शैली में पोर्ट्रेट बनाने सीखे लेकिन उन्होंने अपने चित्रों के साथ भाव गीत भी जोड़ दिये , जिसके कारण उनकी ख्याति अन्य कलाकारों की तुलना में बढ़ती चली गई ।
उनकी एक प्रसिद्ध पेंटिंग “मस्तानी “के साथ उनका यह भावगीत बहुत चर्चित हुआ-
“मस्तानी अलमस्त शराबी बैठी अपने खाने में
सुने राग झुकि झुकि झांक रही सखि प्याला दे दस्ताने में
पीवत भर भर ,फिर फिर मांगत है तरातर दोनों में
कवि मोलाराम मुसब्बर खैंची यह तस्वीर रिझाने में”
१७९८ में मोलाराम कांगड़ा गए और वहां उन्होंने पहाड़ी शैली की चित्रकला सीखी यहीं से पहाड़ी शैली का प्रभाव उनके चित्रों में स्पष्ट दिखने लगा और उनका मौलिक सृजन प्रारंभ हुआ I
मोलाराम की मौत के बाद उसके उत्तराधिकारियों ने उसकी बनाई पेंटिंग्स बेच बेच कर अपना पेट पाला। नतीजा यह हुआ की उनकी असंख्य कलाकृतियाँ विदेशी संग्रहालयों और राजघरानों की बैठकों पहुँच गए I राजा रवि वर्मन की तरह मोलाराम ने भी कुछ धार्मिक चित्र बनाये थे, जिनमें गोवर्धन धारण,कालिया दमन ,मत्स्यवतार ,नरिसिंहावतार , राधा कृष्ण,कृष्ण रुक्मिणी मिलन आदि प्रसिद्ध हुए I एक ब्रिटिश सिविल सर्वेंट Mr आर्चर ने मोलाराम के कई चित्र हासिल किये और इंग्लैंड ले गए I
चलते- चलते The Garhwal Paintings के लेखक बैरिस्टर मुकंदीलाल जी के बारे में भी दो शब्द विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं । कला गुरु आनंद कुमारस्वामी और अजित घोष ने मुकंदी लाल जी को बहुत प्रभावित किया उन्हीं के कारण उनकी रुचि चित्र कला पर शोध करने में वे प्रवृत हुए। लेकिन मुकंदीलाल जी की दखल राजनीति में भी रही जिसकी वजह से उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने उनकी “भीष्म पितामह” कह दिया था वे १९६२ से ६७ तक वह लैंसडौन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रहे। उनका जन्म सं १८८५ में चमोली जिले में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में पूरी करने के बाद उन्होंने इलाहाबद यूनिवर्सिटी से BA प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर दानवीर घनान्द खंडूड़ी जी द्वारा प्रदत्त छात्रवृति पर इंग्लैंड चले गए, जहाँ से उन्होंने बैरिस्टर की डिग्री हासिल की और तत्पश्चात टिहरी रियासत में जज के पद पर भी कार्य किया –उनके बारे में कई दिलचस्प तथ्य हैं लेकिन आज फिलहाल इतना ही ।
लेखक गांधी विचारक है।







