Saturday, March 14, 2026
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पाइन पीट रोकेगा उत्तराखंड में जंगलों की आग, और बहुत कुछ।

पाइन पीट रोकेगा उत्तराखंड में जंगलों की आग, और बहुत कुछ।

 

By – Prem Pancholi

अब नहीं लगेगी जंगलों में आग, यह पंक्ति अटपटी लग रही है न? लेकिन ऐसा होने जा रहा है। यदि सब कुछ ठीक ठाक रहा तो आने वाले समय में उत्तराखंड के जंगलों का दुश्मन चीड़ के पत्ते “पीरूल” को बहुउपयोगी बनाया गया है। यह एक तरफ रोजगार का साधन होगा और दूसरी तरफ पीरूल के कारण जंगलों में कभी भी आग नहीं लगेगी। जी हां! ऐसा करके दिखाया है प्रेमनगर स्थित Institute of Agriculture Training and Research (IATR) ने।

 

बता दें कि पाइन नीडल्स (पिरूल) आधारित सब्सट्रेट, पाइन पीट एवं पाइन ऑर्गेनिक कंपोस्ट पर मशरूम कल्टीवेशन की क्रांतिकारी तकनीक को ईजाद किया है कृषि प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान ने ऐतिहासिक एवं पर्यावरण-अनुकूल नवाचार के रूप में यह नायब तरीका ढूंढकर निकला है। कह सकते हैं कि अब यह कार्य सामाजिक उद्यमिता के माध्यम से ग्रामीण सशक्तिकरण, रोजगार सृजन एवं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

 

उल्लेखनीय है कि पिछले 2 वर्षों से निरंतर चल रहे गहन अनुसंधान एवं विकास के बाद, पाइन नीडल्स (चीड़ की सुइयाँ/पिरूल) को सब्सट्रेट के रूप में उपयोग करके ऑयस्टर, मिल्की, बटन एवं गैनोडर्मा जैसे उच्च गुणवत्ता वाले मशरूम की सफल खेती की तकनीक विकसित की गई है। साथ ही, पाइन पीट (Pine Peat) एवं पाइन ऑर्गेनिक कंपोस्ट का उत्पादन भी शुरू किया गया है। जो पारंपरिक कृषि में विशाल क्रांति ला सकता है।

 

खास बात यह है कि यह पहल सामाजिक उद्यमिता (Social Entrepreneurship) का सफल उदाहरण है, जो पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने एवं स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने पर केंद्रित है।

 

चूंकि उत्तराखंड एवं अन्य हिमालयी पहाड़ी क्षेत्रों में चीड़ के जंगलों से प्रतिवर्ष लाखों टन पिरूल (pine needles) गिरती हैं, जो अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण गर्मियों में वनाग्नि (forest fires) का प्रमुख कारण बनती हैं। इस नवाचार से न केवल इन अपशिष्ट पदार्थों का मूल्यवान उपयोग होगा, बल्कि किसानों की उत्पादन लागत में भी 30 प्रतिशत तक की कमी आ रही है, अतः महंगे स्ट्रॉ (पराली) की जगह पिरूल का उपयोग किया जा सकता है।

 

Institute of Agriculture Training and Research के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित उपाध्याय ने बताया कि इस सफलता के पीछे IATR की समर्पित रिसर्च एवं डेवलपमेंट टीम मनमोहन सिंह बिष्ट (वन विभाग के पूर्व सब-डिविजनल ऑफिसर)

डॉ. आदित  बिष्ट, नवीन नौटियाल, डॉ. भवना, वैशाली थापा, गुरसिमरन आदि का अथक परिश्रम है। श्री उपाध्याय ने आगे बताया कि वे अब सफलतापूर्वक पाइन से Perul Compost, Pine Peat तैयार कर रहे हैं और पाइन नीडल्स पर मशरूम ग्रो कर रहे हैं। कहा कि यह केवल शुरुआत है। भविष्य में इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने की योजना वे बना रहे हैं। इससे हजारों ग्रामीण किसान लाभान्वित होंगे, स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण संरक्षण में ठोस योगदान होगा। उन्होंने बताया कि IATR का मिशन भी यही है कि कृषि को कौशल, नवाचार एवं उद्यमिता से जोड़कर ग्रामीण भारत को सशक्त बनाना है।

 

@इस नवाचार के प्रमुख लाभ – 

 

1 – वनाग्नि रोकथाम यानी ज्वलनशील पिरूल का उपयोग करके जंगलों में आग का खतरा कम करना l

2 – लागत में कमी अर्थात स्ट्रॉ की जगह पिरूल, जिससे मशरूम उत्पादन अधिक किफायती होता है।

3 – रोजगार सृजन बावत पहाड़ी गांवों में महिलाओं, युवाओं एवं स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के लिए नए अवसर।

4 – ऑर्गेनिक उत्पाद, जिनमें प्रमुख रूप से पाइन पीट एवं कंपोस्ट से जैविक खेती को बढ़ावा।

5 – सतत विकास हेतु अपशिष्ट से मूल्य सृजन, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा।

@आइएटीआर क्या है – 

 

Institute of Agriculture Training and Research (IATR), Dehradun NSDC एवं MSDE, भारत सरकार से संबद्ध एवं Agriculture Skill Council of India द्वारा मान्यता प्राप्त संस्था है। जो कृषि कौशल विकास, उद्यमिता एवं अनुसंधान के क्षेत्र में कार्यरत है। IATR सामाजिक उद्यमिता की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जहां कृषि संबंधी कौशल विकास, उद्यमिता, शोध कार्यों के साथ-साथ समाज एवं पर्यावरण का उत्थान सर्वोपरि है। IATR सभी किसानों, युवाओं एवं हितधारकों को इस तकनीक को अपनाने  के लिए आमंत्रित करता है।

…………

संपर्क – Amit Upadhyay, 8868885884

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