Saturday, September 12, 2026
Home उत्तराखंड आंदोलन का हथियार गीत रहा लस्का कमर बांदा।

आंदोलन का हथियार गीत रहा लस्का कमर बांदा।

इस वक्त की जरूरत-‘लस्का कमर बांदा, हिम्मत क साथा’
‘बताऔ गीद कस ल्येखूं? यस ल्येखूं कि यस ल्येखूं? यौं गीद ग्वाव गानी डान्यूम/यौं गीद चुलि-चूल्यौंक छैं हो/यौं गीद छ्वर-मुया गानी/यौं गीद दिदि-भुल्यौंक छैं हो/यौं गीद कौतक्यार भौंणनी/यौं गीद झुल्यी फूल्यौंक छैं हो/छैं गीद वीक लै जैका/ख्वारन जगिया छिलकु छैं हो/मैं ल्यखुनूं हैंसिका खितकर/बगन आख्यौंक रस ल्येखूं? बताऔ गीद कस ल्येखूं?’

कवि-गिदार हीरा सिंह राणा किन लोगों के लिए गीत-कविताएं लिखते-गाते थे, उनकी उक्त कविता से स्पष्ट है। आमजन की तकलीफों और संघर्षों से ही उन्होंने कथ्य और शब्द चुने। उनकी रचनाओं में जीवन का भोगा हुआ यथार्थ है। यह संघर्ष उनका अकेला नहीं, बल्कि उस पूरे कालखण्ड का है, जिसने उनकी गीत-कविताओं को भाव-भूमि दी।’ ( अपनी बात में चारु तिवारी )

लोक कवि और गीतकार हीरा सिंह राणा के मन-मस्तिष्क पर उत्तराखण्ड की राजनैतिक और सामाजिक चेतना का प्रभाव रहा। इसी का परिणाम था कि उनके रचनायें उत्तराखण्ड में जन-आन्दोलनों को जागृत करके उसे सही दिशा की ओर गतिशील करने में महत्वपूर्ण भूमिका में रही हैं।

विगत शताब्दी में अस्सी और नब्बे के दशकों के जन-आन्दोलनों में लोक के चितेरे हीरा सिंह राणा का लिखा और गाया जनगीत ‘लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा, फिर भोला उज्याला होली, कां रोली राता।’ आन्दोलनकारियों को हिम्मत और जीतने का विश्वास प्रदान करता था। उस दौर के हर जन-आन्दोलन में यह गीत अनायास ही आन्दोलनकारियों के स्वरों से सामुहिक गूंजायमान रहता था।

जन-आन्दोलनों के जलूसों में हीरा सिंह राणाजी की खनकती आव़ाज जब ‘लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा…’ गीत को गाती थी तो आन्दोलनकारियों के उत्साह का चरमोत्कर्ष बुलंदियों पर पहुंचा होता था।

तभी तो, अस्सी के दशक में ‘‘नशा नहीं-रोजगार दो’ और नब्बे के दशक में ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन’ का यह शीर्षक गीत बन गया था।

जनपद अल्मोड़ा के डंढ़ोली गांव ( मनिला ) में 16 सितंबर, 1942 को जन्मे लोककवि हीरा सिंह राणा का बचपन अभावों में बीता। आठवीं तक की शिक्षा लेने के बाद रोजी-रोटी के लिए गांव से निकल कर कुछ वर्षों तक वे महानगरों की खाक छानते रहे। इसके लिए उनके जीवन का प्रारंभिक संघर्ष दिल्ली और कोलकता महानगरों में रहा।

प्रवासी जीवन से मन हटा तो वापस पैतृक भूमि में आकर वे लोक कलाकार बन गए। ‘गीत एवं नाटक प्रभाग’ नैनीताल और ‘नव युवक केन्द्र ताड़ीखेत’ से जुड़ कर उनके जीवन का सांस्कृतिक सफ़र शुरू हुआ। युवा अवस्था में अपनी काबलियत के बल पर गांव-इलाके के मेले-ठेलों में गाने वाले गितार से उभर कर वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के उच्च श्रेणी के कलाकार बने।

बाद में, लोकप्रिय कुमाऊंनी लोक कलाकार के रूप में देश-विदेश के मंचों पर हीरा सिंह राणा ने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दी।

अपनी किशोरावस्था में गांव-इलाकों के मेले-ठेले और रामलीला में गाने वाले हमारे प्रिय हीरा सिंह राणा जी वर्ष- 2019 में दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग के अन्तर्गत गठित ‘कुमाऊॅंनी-गढ़वाली एवं जौनसारी लोकभाषा अकादमी’ के प्रथम उपाध्यक्ष मनोनीत हुए।

( यह अकादमी हमारी लोकसंस्कृति की विशालता और वैभव को देश-दुनिया में स्वीकारने का प्रतीक है। साथ ही उत्तराखंड में आयी-गई सरकारों पर तीख़ा प्रहार भी है। )

कुमाऊंनी लोकगीत-संगीत के पुरोधा हीरा सिंह राणा जी का दिल्ली में 13 जून, 2020 को निधन हुआ।

किशोरावस्था से ही लोक संस्कृति के दीवाने हीरा सिंह राणा ने लोकगीत-संगीत को ही अपने जीवन का ओढ़ना-बिछौना बनाया। जीवन में घनघोर मुश्किलें भी आई पर उनको दरकिनार करने की ‘लोक ताकत’ उनके मन-मस्तिष्क में हर समय विराजमान रही।

जीवन की विकटता और आपा-धापी पर ‘मन का लोक प्रेम’ उनमें हर समय जीवंत रहा।

उम्र के आखिरी पड़ाव में अस्वस्थ शरीर होने के बावजूद भी उनकी आवाज में जबरदस्त ख़नक, जोश और ताज़गी बऱकरार थी।

वे मानते थे कि मन तो ‘लोक’ का हुआ, जो कभी पुराना और परेशानियों से परास्त नहीं होता।

हीरा सिंह राणाजी के रचना संसार में कविता गीत संग्रह- ‘प्योली और बुरांस’ ( 1971 ), ‘मानिलै डानि’ ( 1976 ) और ‘मनखों पड्यौव में’ ( 1987 ) प्रकाशित हैं। गीत कैसेट- ‘रगिंल बिन्दी’ ( 1986 ), ‘सौ मनों की चोरा’ ( 1991 ), ‘रंगदार मुखड़ि’ ( 1994 ), ‘हाई कमाल’ ( 1996 ), ‘त्येरि आंखि’ ( 2000 ), ‘अहा रे जमाना’ ( 2002 ) और ‘हंसनि मुखिम’ ( 2007 ) बाजार में आये और बहुत लोकप्रिय हुए।

हीरा सिंह राणा ने 4 नाटक ‘ग्वैल लीला’, ‘स्वाधीनता आन्दोलन में उत्तराखण्ड का योगदान’, ‘उत्तराखण्ड: एक संघर्ष यात्रा’ और ‘कुमाऊं की बारादौली सल्ट’ को लिखा।

(महत्वपूर्ण है कि, सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ सल्ट के खुमाड़ गांव के 4 आन्दोलनकारी शहीद हुये थे। महात्मा गांधी ने इसे ‘कुमाऊं की बारादौली’ कहा था।)

यह महत्वपूर्ण है कि इन चारों नाटकों का समय-समय पर देश के विभिन्न शहरों में सफलतापूर्वक मंचन किया गया। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य कई प्रकाशित और अप्रकाशित गीत और कवितायें हैं।

कुमाऊंनी लोक गीत-संगीत के नायक हीरा सिंह राणा के ‘आ ली ली बाकिरी’, ( लालबहादुर शास्त्री जी के सम्मुख सन् 1962 में एक अवसर पर ‘आ ली ली बाकरी ली ली छू…छू’ गीत गाने का उन्हें मौका मिला था। ) ‘नोली पराणा’,‘त्यर पहाड़, म्यर पहाड़, रौय दुःखों को ड्यर पहाड़, ‘मेरी मानिल डानी’, ‘धना धना’, ‘रंगीली बिंदी, घाघर काई, धोती लाल किनर वाई, हाय हाय हाय रे मिजाता, हो हो होई रे मिजाता’ जैसे सदाबहार गीत राणाजी को हमेशा युवा मन का बनाये रखे हुए थे।

प्रस्तुत पुस्तक- ‘लस्का कमर बांदा’ ( कवि-गिदार हीरा सिंह राणा समग्र ) का कुशलता और आकर्षक कलेवर के साथ संकलन एवं सम्पादन चारु तिवारी ने किया है। चारु तिवारी जी विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशकों तक लेखन और संपादन कार्य करने के बाद विगत कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में हिमालयी जनजीवन विशेषकर उत्तराखण्ड के सम-सामयिक एवं नीतिगत मुद्दों पर अनेक जन-आन्दोलनों में अग्रणी भूमिका निभाते हुए राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन से भी जुड़े हैं।
उत्तराखण्ड पर केन्द्रित कई डाॅक्यूमेंटरी, फिल्मों और नाटकों में स्क्रिप्ट लेखन तथा निर्देशन के क्षेत्र में उन्होने महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय योगदान दिया है। हिमालय की पारिस्थिकीय वन्यता और हिमालयी समाज के इतिहास, संस्कृति, राजनीति, साहित्य तथा रंगमंच के अध्येयता के रूप में उनका गहन अनुभव और अध्ययन है।

चारु तिवारी मानते हैं कि इस पुस्तक का उद्धेश्य लोक के चितेरे हीरा सिंह राणा ने जितना भी रचा उसे एक सूत्र में बांधना है। इस कार्य के लिए उन्होने और उनके मित्रों ने विभिन्न स्त्रोतों से अथक परिश्रम से सामाग्री को एकत्र किया है।

इस पुस्तक में हीरा सिंह राणा के तीनों गीत संग्रह अपने मूल स्वरूप में है। पहले अध्याय में ‘प्योली और बुरांस’ ( 1971 ) के प्रथम भाग- मिट्टी का मोह, द्वितीय भाग- कसकता जीवन और तृतीय भाग- घाटी गूंजी, जीवन झूमा में कुल 31 गीत शामिल हैं। दूसरे अध्याय में गीत संग्रह- ‘मानिलै डानि’ ( 1976 ) में 13 गीत हैं। तीसरे अध्याय में गीत संग्रह-‘मनखों पड्यौव में’ ( 1987 ) में 36 गीत प्रकाशित हैं। संकलन के चौथे अध्याय में हीरा सिंह राणा की अन्य प्रकाशित और अप्रकाशित रचनायें शामिल हैं।

हीरा सिंह राणा की गहरी वैज्ञानिक दृष्टि का बोध कराती विज्ञान विषयक रचनायें गीत-कविताओं के रूप में पांचवें अध्याय में हैं। कुमाऊं के लोक ज्ञान-विज्ञान को उन्होने अपनी रचनाओं का आधार बनाया।

महत्वपूर्ण है कि, विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली के संयोजन ‘उत्तराचंल के लोक साहित्य में विज्ञान के संदर्भ’ संकलन में राणाजी की विज्ञान विषयक रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी।

छटे अध्याय में हीरा सिंह राणा द्वारा गाए लोक प्रचलित गीतों को शामिल किया गया है। अधिकांशतया हीरा सिंह राणा ने अपने लिखे ही गीत गाये। परन्तु किन्हीं संदर्भों में कुछ लोक गीतों को उन्होने अपना स्वर भी दिया। साथ ही, उसमें आवश्यकतानुसार बदलाव भी किया है। कहना न होगा कि, उनके गाए लोक गीतों ने और भी लोकप्रियता हासिल की।

सातवें अध्याय में हीरा सिंह राणा लिखित चार नाटकों को शामिल किया गया है। हीरा सिंह राणा मूलतः गीतकार और कवि थे। लेकिन, सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित और इतिहास बोध ने उन्हें नाटक लेखन के लिए प्रेरित किया।

पुस्तक के अन्त में परिशिष्ट में हीरा सिंह राणा की रचनाओं में शब्द चयन, शब्दों का प्रयोग, बिम्ब, रूपक, प्रतीक, मुहावरे और लोकोक्तियां तथा कविताओं में व्यक्ति और गांव का विश्लेषणात्मक अध्ययन को उल्लेखित किया गया है।

निःसंदेह, मित्र चारु तिवारी ने कवि-गिदार हीरा सिंह राणा के समग्र रचना संसार को एक पुस्तक शामिल करने का बहुउपयोगी और महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस कार्य को एक कुशल अध्येता के रूप में करके उन्होने इसे महत्वपूर्ण शोधपरक पुस्तक का आकार प्रदान किया है। शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक एक संदर्भ ग्रन्थ है।

हीरा सिंह राणा ने अपना संपूर्ण जीवन कुमाऊंनी लोक विधाओं को जीवंत करने के लिए समर्पित किया था। इसी से प्रेरित होकर चारु तिवारी ने अप्रीतम लोककलाकार हीरा सिंह राणा जी के इह लोक विदा होने के बाद उनके संपूर्ण रचना संसार को जानने और समझने के लिए सर्वसुलभ बनाया है।

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पुस्तक- ‘लस्का कमर बांदा’ ( कवि-गिदार हीरा सिंह राणा समग्र )
संकलन एवं सम्पादन- चारु तिवारी
आवरण- शशि मोहन रवांल्टा
हिमांतर प्रकाशन, देहरादून
वर्ष- 2022, 458 पृष्ठ
मूल्य- जनसंस्करण- 550, संस्थागत- 950

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‘लस्का कमर बांदा’ ( कवि-गिदार हीरा सिंह राणा समग्र ) पुस्तक प्राप्त करने के लिए हिमांतर प्रकाशन, देहरादून ( मोबाइल नंबर- 8860999449 ) अथवा श्री चारु तिवारी ( मोबाइल नंबर- 7011960502 ) से संपर्क करें।

…………………….

अरुण कुकसाल
ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौं-246163
पट्टी- असवालस्यूॅं, जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखंड

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