शिक्षा व्यवस्था को सर्वप्रथम भारतीय बनना होगा–
By – Dr. Arun Kuksal
‘बाढ़ के पानी ने आकर हमारे संसार को ऐसा विच्छिन्न कर दिया है कि तुमने कई एकड़ भूमि के मालिक होते हुए भी सरकारी आफिस से चावल मांग कर खाया और मैंने आधा-पौना बीघा खेत का मालिक होते हुए भी वही खाया।…संसार का दुःख मनुष्य को एक होना सिखाता है, कोई अहंकार नहीं रखकर एक साथ जीना सीखता है, कुटिया के साथ कोठी को एक महान सहानुभूति के सेतु से बांध देता है। इस बार की बाढ़ शायद हमें यही अनुभव दे गयी है। टूटे घरों के स्थान पर जब फिर नया घर-संसार विकसित हो उठेगा, हो सकता है उस दिन हमारा हृदय अधिक निर्मल होगा, हमारी शिक्षा में अधिक विवेक के लिए स्थान होगा’(पृष्ठ, 20-21)
‘चित्त भाई’ के नाम से लोकप्रिय अध्येयता, घमुक्कड़, आलोचक, अनुवादक तथा उड़िया भाषा साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर प्रो. चित्तरंजन दास को ‘उडीसा का सुकरात’ कहा जाता है। प्रो. चित्तरंजन दास की डायरी, निबंध, समीक्षा, आत्मकथा, संस्मरण, स्तंभ, अनुवाद, पाठ्यपुस्तक तथा मोनोग्राफ विधा में कुल जमा 250 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। इसमें ज्यादातर उडिया भाषा में लिखी हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रो. चित्तरंजन दास द्वारा विगत शताब्दी के 60 के दशक में उड़िया भाषा में लिखी उत्तराखण्ड हिमालय पर केन्द्रित ‘शिलातीर्थ’ यात्रा-लेखन की श्रेष्ठ पुस्तकों में शामिल है। ‘शिलातीर्थ’ की लोकप्रियता आज भी इतनी है कि इस किताब को पढ़कर हजारों की तादाद में तीर्थयात्री, युवा और पर्यटक उत्तराखण्ड हिमालय की ओर आते हैं। नव पल्लव प्रकाशन, भुवनेश्वर ने श्रीअरविन्द आश्रम, पॉण्डिचेरी के सहयोग से वर्ष-2017 में ‘शिलातीर्थ’ यात्रा-पुस्तक को हिन्दी में प्रकाशित किया है।
प्रो. चित्तरंजन दास (1923-2011) ने शांति निकेतन (1945-50) और कोपेनहेगन विश्वविद्यालय, डेनमार्क (1950-53) से उच्च शिक्षा प्राप्त की। आगरा, फिनलैंड, जर्मनी, इजरायल में उन्होने अध्यापन कार्य किया। उनको महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर और श्रीअरविन्द के साथ काम करने का अवसर मिला। वास्तव में, प्रो. चित्तरंजन दास इन तीनों महान विचारकों की वैचारिक त्रिवेणी थे।
प्रो. चित्तरंजन दास के उडीसा के अंगुल जिले के चम्पतिमुण्डा गांव के ‘उत्तर बुनियादी शिक्षा विद्यालय’ में प्रधानाध्यापक (सन् 1954-58) के रूप में शैक्षिक प्रयोग देश-दुनिया में चर्चित रहे हैं। बुनियादी तालीम के दृष्टिगत ये प्रयोग आज भी प्रासंगिक हैं।
प्रो. चित्तरंजन दास ने प्रधानाध्यापक रहते हुए अपने उक्त अभिनव प्रयासों के अनुभवों को शैक्षिक डायरी के रूप में उडिया भाषा में लिपिबद्ध किया। उनकी यह शैक्षिक डायरी ‘जंगल चिठ्ठी’ लेखमाला के नाम से ‘साप्ताहिक ग्राम सेवक’ उडिया समाचार पत्र, भुवनेश्वर से सन् 1960 में प्रकाशित हुई थी। साथी निकेतन प्रकाशन, भुवनेश्वर ने सन् 1971 में इस लेखमाला को ‘जंगल चिठ्ठी’ पुस्तक का आकार देकर प्रकाशित किया था। इसका दूसरा संस्करण सन्- 1997 में प्रकाशित हुआ था।
‘जंगल चिठ्ठी’ लेखमाला का हिन्दी अनुवाद प्रखर अध्येयता डॉ. अर्चना मोदी ने किया है। जो कि, पुस्तक के रूप में ‘जंगल स्कूल- एक शैक्षिक प्रयोग’ नवपल्लव प्रकाशन, भुवनेश्वर एवं श्रीअरविन्द आश्रम, पॉण्डिचेरी से वर्ष- 2021 में प्रकाशित हुई। पुनः डॉ. अर्चना मोदी द्वारा अनुवादित यही किताब ‘जंगल चिठ्ठी’ के नाम से अप्रैल, 2023 में पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित हुई है।
प्रो. चित्तरंजन दास डेनमार्क से सन् 1953 में उच्च शिक्षा प्राप्त करके देश में महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा के विचार को व्यवहार में लागू करने के कार्य में जुट गए थे। उन्हें शिक्षण से बेहद प्रेम था, इसके लिए वे शिक्षक बनना चाहते थे। इसी समर्पण के तहत वे अंगुल जिले के चम्पतिमुण्डा गांव के ‘उत्तर बुनियादी शिक्षा विद्यालय’ में सन् 1954-58 तक प्रधानाध्यापक रहे।
ये दोनों पुस्तकें ‘उत्तर बुनियादी शिक्षा विद्यालय’ चम्पतिमुण्डा में प्रधानाध्यापक के रूप में 4 सालों तक शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न प्रयोग करते हुए उनकी एक शैक्षिक डायरी हैं। इन पुस्तकों के दो भाग हैं। प्रथम भाग में प्रो. चित्तरंजन दास की इन 4 सालों में लिखी डायरीनुमा 24 चिठ्ठियां हैं। द्वितीय भाग में 10 वर्ष बाद 6 भागों में चम्पतिमुण्डा गांव के ‘उत्तर बुनियादी शिक्षा विद्यालय’ में विविध विषय प्रयोगों पर समीक्षात्मक आलेख हैं।
‘उत्तर बुनियादी शिक्षा-संस्थान’ चम्पतिमुण्डा गांव (उडीसा) के जंगल में 26 अगस्त, 1954 में 24 बालक और 2 बालिकाओं से प्रारम्भ हुआ था। चित्तरंजन दास अपनी शुरुआती चिठ्ठी में लिखते हैं कि ‘तीन अस्थायी कमरे और एक तंबू में हमारे विद्यालय का संसार विकसित हो रहा है। सवेरे हम ईटें बनाते हैं और जंगल से ईंटा-भट्टी के लिए लकड़ियां इकठ्ठा करने जाते हैं। दोपहर को कमरों के पास एक महुआ के पेड़ के नीचे पढ़ाई होती है। यहां रात को बहुत ठंड होती है, अंगुल से भी अधिक। बच्चों के पास आवश्यकतानुसार गर्म कपड़े नहीं हैं। प्रतिदिन जंगल से लौटते समय हम सूखे पेड़ों की जड़ें और शाखाएं ले आते हैं। रात को आंगन के बीच आग जलायी जाती है। जब रात को ठंड के कारण नींद टूट जाती हैं, तब बच्चे आंगन में आकर आग सेंकते हैं।’ (पृष्ठ-1)
प्रधानाध्यापक चित्तरंजन दास का कहना था कि ‘भीड भरे पथ पर बहुत लोग जा रहे हैं, केवल इस कारण से हम उस पथ पर नहीं जायेंगे, यह निर्णय करने के पश्चात ही हम इस अरण्य पथ पर आये हैं।’ (पृष्ठ-38) ‘हम सभी वस्तुओं से, सभी क्षेत्रों से सीखेंगे, परन्तु किसी एक के बंदी होकर नहीं रहेंगे। हम समग्र जीवन से सीखेंगे, हममें से प्रत्येक अपने-अपने ग्रहणपात्र को प्रस्तुत करेगा।’ (पृष्ठ-106) ‘अन्न या वस्त्र का स्वावलंबन किसी भी शिक्षा का साधन है, परन्तु वह उसका ध्येय नहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो शिक्षा को धन कमाने की शिक्षा कह सकते हैं, पर सुशिक्षा नहीं कह सकते हैं। विकार-मुक्ति, विचार-स्वतंत्रता और निर्भीकता ही हमारी शिक्षा का ध्येय होना चाहिए।’’(पृष्ठ-33) ‘मेरा उद्वेश्य यह है कि जब शिक्षा समाप्त करके हमारे विद्यार्थी बाहर जायेंगे, तब वे लोग वर्तमान के अन्यायपूर्ण दुष्ट समाज को कदापि सिर झुका कर शिष्ट पुरुष बनकर सहन नहीं करेंगे।’ (पृष्ठ-190)
प्रो. चित्तरंजन दास के उक्त विचारों और प्रयासों के मूल में बच्चों को नौकरीपयोगी पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के क्रूर प्रहारों से बचाना था। उनका मत था कि भारत में प्रचलित शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को अभी तक संपूर्ण शिक्षा के केन्द्र में नहीं रखा गया है। वे चाहते थे कि अपने ही प्रयासों से बनाए गये विद्यालयों में बच्चे वो बन जाते हैं जो वो जीवन में बनना चाहते हैं। उन्होने प्रयास किया कि उनका विद्यालय बच्चों में नौकरी की मानसिकता को पनपाने वाला कारखाना न होकर विकार और अहंकार से दूर किसान के घर जैसा बने। जहां वे सरकारी विभागों के प्यादे के बजाय स्वावलम्बी जीवन और जीविका के मालिक बने।
शिक्षाविद जॉन होल्ट की तरह चितरंजन दास मानते हैं कि ‘हमने बच्चों को संपूर्ण मनुष्य की स्वच्छ दृष्टि से देखना नहीं सीखा है। उसके जीवन का संपूर्ण विचार अभी तक नहीं किया है। हम बच्चे के मस्तिष्क को जान गये हैं, परन्तु उसके हृदय के विषय में संपूर्ण रूप से अनभिज्ञ हैं। किन्तु जो शिक्षक बच्चे के हृदय को पहचानता है, जिसने उसके हृदय के सूक्ष्म तंतु पर प्रभाव डालना सीखा है, वही बच्चों के जीवन के प्रति सबसे अधिक न्यायपूर्ण विचार कर सकता है।’(पृष्ठ-8)
वे कहते कि मुझे शिक्षण से प्रेम था इसलिए मैं मूल रूप से शिक्षक हूं। किसी घटना या मजबूरी या कहीं और नौकरी न मिलने के कारण शिक्षक नहीं बना। उनका मत था कि शिक्षक बनने के लिए सर्वप्रथम यही अर्हता होनी चाहिए। तभी, हमारे शिक्षक पूर्ण स्वतंत्रता और निर्भीकता से बच्चों को शिक्षण प्रदान करने में दक्ष हो पायेंगे। जबकि, वास्तविकता यह है कि हमारे देश में जिनको बच्चों को सर्वागींण विकास और मानवीय बनाने की जिम्मेदारी है, उस शिक्षक की सामाजिक स्थिति एवं मान-सम्मान सेवक से भी दीन हीन है। फिर भला, जो स्वयं डरा हुआ है, वह निडर होने की शिक्षा कैसे दे सकता है?
‘इस देश में शिक्षकों को किसी से भी आदर प्राप्त नहीं होता है। अधिकारीगण अनेक नियम और कानून का शोधन कर बोझ ढोने और अनुशासित बैल की तरह शिक्षक का उपयोग करने में कभी भी कुंठित नहीं होते हैं। शिक्षक भी अपने अधिकारी से डरता है। शिक्षक समझते हैं कि, हमारा दाना-पानी जिसकी दया या उपकार पर निर्भर करता है, उससे डरकर उसी के इच्छानुसार कार्य कर, उसे ही प्रसन्न रखने का सबसे अधिक सुरक्षित मार्ग है।… हमारे देश में शिक्षा का गृह सरस्वती के हाथों में नहीं है, अब तक लक्ष्मी के हाथों में ही है। लक्ष्मी के वाहन ही शिक्षा के क्षेत्र में प्रमत्त होकर शासन कर रहे हैं।’ (पृष्ठ-67) ‘…शिक्षा को एक सरकारी विभाग में परिणत कर उसको चलाने वाले कार्यकर्ता आजकल अधिक अमंगल कर रहे हैं और अधिक बधिर हो गये हैं, ऐसा लगता है।…शिक्षा के प्रति सरकारी साधुता का भी अत्यंत स्पष्ट रूप से ह्रास हुआ है। राजनीतिक इच्छा-शक्ति भी बिल्कुल हाथी-पॉंव जैसी हो गयी है। (भूमिका)
यह किताब महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा और प्रचलित शिक्षा प्रणाली के बीच का द्वन्द्ध को बताती है। बुनियादी शिक्षा के बजाय नौकरीपयोगी प्रचलित शिक्षा को अधिक बड़ावा देने की सरकार की मंशा पर लेखक सवाल उठाते हैं। उनका मत है कि, इससे अभिजात्य गुणों के वशीभूत बच्चे शारीरिक श्रम को गौंण मानने लगे हैं। और, शारीरिक श्रम की महत्वा से ज्यादा किताबी ज्ञान को बढ़ावा देना बेहद घातक है।
लेखक की इन चिठ्ठियों में शिक्षा, शिक्षार्थी और शिक्षक के केन्द्र में भारतीय सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था से उभरे धर्म, संस्कृति, भाषा, साहित्य, जातिगत विभेद, वर्ग विभेद, पर्यावरण आदि पर गहन चिन्तन-मनन है। यह भारत की आजादी के बाद के पहले दशक के परिदृश्य का एक हिस्सा भी है। उस दौर में देशभर में सरकारी और गैरसरकारी विचार और योजनायें अपना आकार ले रहे थे, उसका विहंगम अवलोकन भी इन चिठिठ्यों में है। ये किताब, उस दौर की शुरुआती सार्वजनिक कमियों की ओर इशारा करती है।
तब हमारे योजनाकार अग्रेजों की छोड़ी अंग्रेजियत को छोड़ने को तैयार नहीं थे। वरन वो उसकी भौंडी नकल करके अपने रुतबे को स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। और, उसी को ही विकास समझ रहे थे। इसी का परिणाम यह है कि विद्यालयों में बुनियादी तालीम के विचार को नहीं पनपने दिया गया। आज स्थिति यह है कि, जो मेहनत करके जीवन जी रहा है, वास्तव में वह भूखे रहने के भय से मजबूरन मेहनत कर रहा है। निश्चित रूप में वह भी श्रम से घृणा करता है।
‘उत्तर बुनियादी शिक्षा-संस्थान’ चम्पतिमुण्डा के विद्यालय में बेहद गरीब परिवारों के ही बच्चे थे। सरकारी उपेक्षा और लापरवाही के कारण निर्धन के लिए बुनियादी शिक्षा और सम्पन्न के लिए प्रचलित शिक्षा का स्पष्ट भेद पनपने लगा था। देश में नीति-नियंताओं की अदूदर्शिता के कारण सामाजिक सेवा के लिए बुनियादी शिक्षा और नौकरी के लिए प्रचलित शिक्षा का विचार आकार ले रहा था। चित्तरंजन दास ने इस प्रवृत्ति को रोकने के प्रयास भी किए। उनका दृडमत था कि गरीब और सम्पन्न के लिए अलग-अलग शिक्षा की व्यवस्था बाद में बहुत समस्याओं का कारण होगी। प्रो. चितरंजन दास के प्रयास भले ही सफल नहीं हुए परन्तु वो निर्मूल साबित भी नहीं हुए।
इस किताब में प्रो. चितरंजन दास अपने विदेशों (प्रमुखतया डेनमार्क, इजरायल और फिनलैंड) में अध्ययन और अध्यापन के दौरान के अनुभवों के आधार पर सरकारी तंत्र को बार-बार सावधान करते हैं। इन देशों की तरह स्थानीय परिवेश और काम-धन्धों के हिसाब से स्कूल का टाईम टेबिल बनाने और उनके प्रयासों और उपलब्धियों से सीख लेने का सुझाव वे बार-बार देते हैं। आज शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में ये देश हमारे देश से कहीं आगे हैं।
प्रो. चित्तरंजन दास के बुनियादी शिक्षा (तालीम) के अपने अनुभवों की यह किताब देश-दुनिया में शिक्षा के क्षेत्र में बहुचर्चित प्रयासों और उन पर आधारित किताबों की याद दिलाती है।
बीसवीं शताब्दी के 20वें दशक में सच्ची घटना पर आधारित चंगीज आइत्मातोव का विश्व चर्चित उपन्यास ‘पहला अध्यापक’ का नायक दूइशेन सोवियत संघ के किरगीजिया पहाड़ी इलाके के कुरकुरेव गांव में इसी तरह के प्रयोगों को करता है।
इसी काल में ‘होम स्कूलिंग मूवमैंट’ के अग्रणी सर्मथक और बहुचर्चित किताब ‘एस्केप फ्रॉम चाइल्डहुड’ के लेखक अमरीकी शिक्षाविद जॉन होल्ट ने ‘ग्रोइंग विदाउट स्कूलिंग’ विचार पर केन्द्रित अपनी पुस्तक ‘एस्केप फ्रॉम चाइल्डहुड’ और ‘हाउ चिल्ड्रन लर्न’ में बच्चों के बुनियादी शिक्षा और अधिकारों पर अपने व्यवहारिक अनुभवों को उजागर किया था। जॉन होल्ट की तरह प्रो. चित्तरंजन दास ने बच्चों की संपूर्ण स्वतंत्रता के केन्द्र में शिक्षा प्रदान करने की वकालत की थी।
हमारे देश में गीजुभाई बधेका ने सन् 1916-36 तक भावनगर (गुजरात) में ऐसे ही बुनियादी शिक्षा प्रदान करने के सफल प्रयास किए थे। अपने इस दौर के अनुभवों को उन्होने ‘दिवास्वप्न’ और ‘कठिन है माता-पिता बनना’ पुस्तक में उजागर किया था।
शिक्षाविद मित्र प्रो. अनन्त गंगोला के वर्ष- 1991-93 तक मध्य प्रदेश के नीलगढ़-धुंधवानी के मध्य में स्थित अभिनव प्रयोगों का ‘चिकनिक स्कूल’ इसी कड़ी का उल्लेखनीय प्रयास था। ‘सब मज़ेदारी है! कथा नीलगढ़’ संस्मरणात्मक चर्चित पुस्तक में अनन्त गंगोला ने इन तीन साल के अनुभवों को लिपिबद्ध किया है।
यह किताब बताती है कि, शिक्षा का प्रत्यक्ष परिणाम व्यक्ति के जीवन प्रवाह और प्रभाव से है। उसकी जीवनीय सफलता तभी फलीभूत होगी जब वो स्थानीय और परिवेशीय वातावरण के अनुकूल विकसित होगी। इसीलिए, भारतीय शिक्षा व्यवस्था को भारतीयता के अनुकूल बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। याने, भारत की शिक्षा को सर्वप्रथम भारतीय बनना होगा।
शिक्षा से जुड़े मित्रों के लिए यह एक मार्गदर्शी पठनीय किताब है। वे जरूर जानें कि, आज नई से नई शिक्षानीति में जो बताया जा रहा है वो ही पचास के दशक में भी कुछ समझदार लोगों ने बताया ही नहीं था, करके भी दिखाया था। तब उनकी बातें, बातें ही रह गई और प्रयास धूमिल हो गये। काश! शिक्षा के संदर्भ में अबकी बातें केवल बातें न रह जाएं।
पुस्तक- जंगल स्कूल: एक शैक्षिक प्रयोग, लेखक- चित्तरंजन दास
अनुवादक- अर्चना मोदी, आवरण- रमेश गुमानसिंह, वर्ष- 2021
प्रकाशक- नवपल्लव, भुवनेश्वर, श्रीअरविन्द आश्रम, पॉण्डिचेरी
पुस्तक- जंगल चिठ्ठी, लेखक- चित्तरंजन दास,
अनुवादक- अर्चना मोदी, वर्ष- अप्रैल, 2023,
प्रकाशक- पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद
आत्मीय धन्यवाद, मित्र Shri Bipin Barik एवं
प्रो. चरण सिंह ‘केदारखण्डी’ ये किताब उपलब्ध कराने के लिए-
अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौ-246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड







