Friday, March 6, 2026
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पौड़ी क्रांति के नायक जयानंद भारतीय की 145वीं जयंती पर विशेष

पौड़ी क्रांति के नायक जयानंद भारतीय की 145वीं जयंती

By Dr. Arun Kuksal

“तुम्हें पता है/ मुझे भी याद आती है/ पहाड़ी पर बसे अपने गाँव की/ लेकिन मैं तुम्हारी तरह/ वहाँ जाने को नहीं हूँ बैचैन/ क्योंकि वहाँ लौटते ही/ मैं हो जाऊँगा हलिया/ और तुम बन जाओगे जिमदार/ मुझे तो गाँव की वादी तंग लगती है/ और ज़्यादा खुला लगता है/ यह दस बाई दस का कमरा…”(हिमालय दलित है… पृष्ठ- 122)

‘‘सौणुन पैलि ढोळ चुला हिंसर्या गाडम्। पाछ वेन जैरामा गौळा बटि झंझोड़ दमौ अर च्यां चुलै द्या। ढोळ-दमौं औंदि गाड्म फूळ सि बौगि ग्येनि।… बाबा रु्वा न। अमंणि तुमऽरु हैंकु जलम ह्वेगि।’’ (सौणु ने पहले हिंसर्या गधेरे में ढोल को फेंका। उसके बाद जैराम के गले से दमौ को झंझोड़ा और तेजी से उसे भी फेंक दिया। ढोल-दमों गाड् में फूल जैसे बह गए।…. पिताजी आप रोओ मत। आज आपका नया जन्म हुआ है।) (‘डड्वार’… पृष्ठ-47)

मोहन मुक्त और महेशानन्द की उक्त रचनाशीलता में हमारे समाज में शिल्पकारों की वर्तमान स्थिति, स्तर और मिजा़ज को जाना-समझा जा सकता है। विशेषकर, शैक्षिक और आर्थिक विषमताओं से उभर रहे दलित युवा वर्ग के मन-मस्तिष्क के द्वन्द्व को इसने सार्वजनिक किया है। सच ये है कि, हमारे समाज में जातीय दंश और विभेद का बाहरी आवरण ही हटा है, उसकी आन्तरिक संरचना और मूल तत्वों में आज भी वही कठोरता, मजबूती और भरपूर ताज़गी है।

लिहाजा, इस मुद्दे पर हमारा समाज सदियों पूर्व की यथास्थिति में वहीं का वहीं जस का तस ठिठका हुआ खड़ा नजर आता है।

अतः आज शिल्पकार समाज के आन्तरिक समाजशास्त्र को गहनता, ईमानदारी और तार्किकता से समझने के लिए दलितों के दिल और दिमागों के इस मर्म और दर्द को पहले समझना जरूरी है।

कहानीकार महेशानन्द की डड्वार कहानी में सौणू अपने पैतृक व्यवसाय ढोल वादन को तिलांजलि देते हुए कहता है कि, पंडित के मंत्र और ढोळी के यंत्र ही तो पारिवारिक उत्सवों को दिव्य व भव्य बनाते हैं। पर पंडित के तो पैर पूजे जाते हैं और ढोली को पैर से धकियाया जाता है। सौणू के पुत्र जैराम का मत है कि जीवकोपार्जन के लिए पैतृक कार्य करते हुए आत्मसम्मान की अनुभूति के बजाय जातीय अपमान सहना होता है। अतः हम अन्य सब कुछ करेंगे पर इन पैतृक कार्यों को नहीं करेंगे। युवा शिल्पकार तो कदापि नहीं। जब हम इस जातिगत कु-व्यवस्था को पैदा करने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं तो इसे बनाए रखने को क्यों जिम्मेदार रहें?

सच ये है कि ये पूरा मामला मानवीय जीवन के आत्मसम्मान और जीवकोपार्जन का है। शिल्पकारों को अपने पैतृक व्यवसाय जातिगत दासता से ग्रसित होने के कारण हीनता का बोध कराते हैं। शिल्पकारों की नई पीढ़ी पढ़ने-लिखने के बाद स्वाभाविक रूप में वे उन्हीं जीवकोपार्जन की ओर उन्मुख हो रही है, जहाँ उनके आत्मसम्मान को किसी भी तरह से ठेस न पहुँचे।

यह संकल्प विद्रोह नहीं, पलायन भी नहीं वरन नई सामाजिक राह को दिखाता युवा संकल्प है। भले ही इससे शिल्पकारों के साथ जातीय विभेद कम होने की संभावनायें निकट भविष्य में प्रभावी होने लगेंगी, ऐसा तो अभी होने से रहा। हां इससे, लोक संस्कृति के उत्सवों में पण्डित और शिल्पकार को बराबरी का दर्जा मिले, ये सार्वजनिक प्रदर्शन और प्रसार में तो संभव है, पर जन प्रचलन में आने में इसे पीढ़ियाँ लगेंगी।

आज भी जातीय विभेद की जडें हमारे लोक समाज में इस कदर गहरी हैं कि हम चाहते हुए भी उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यह सर्वविदित है कि जातिगत विभेद के कारण संपूर्ण समाज की आर्थिकी, शिल्प और संस्कृति का तेजी से क्षरण हो रहा है। इस पर भी समाज में प्रायः बच्चों को जातीय विभेद का अनुपालन करने की सीख देने में कोई देरी नहीं करता। दूसरी ओर, प्रदर्शनों में स्थानीय आर्थिकी, लोक शिल्प और संस्कृति को बचाने के ढोल भी नित्य-प्रतिदिन और तेजी से पीटे जा रहे हैं।

वास्तविकता यह है कि आज हमारे समाज में स्थानीय आर्थिकी, लोक शिल्प एवं संस्कृति बचाने के लिए वे लोग सबसे ज्यादा सार्वजनिक दुःखी हैं, जिनकी स्वयं की दिन-चर्या में वह पहले से ही बहुत दूर जा चुके हैं। वे चाहते हैं कि उनके खेत-खलिहान बंजर और वीरान न हों। पारिवारिक एवं सामाजिक उत्सवों में औजी ढ़ोल बजाये, ओड उनकी तिबारि-डंड्यालियों का निर्माण करे। लुहार की अणसाल रीती है, टमोटा की गागर और तोली देखने को नहीं मिल रही है। चारों ओर स्थानीय आर्थिकी, लोक शिल्प एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए हे! राम, हे! राम, बचाओ…बचाओ का शोर है। पर शिल्पकार वर्ग की सामाजिक समानता का आग्रह और विषमता का विरोध उन्हें नागवार है।

ये कैसी स्थानीय आर्थिक और लोक संस्कृति है जो समाज के एक वर्ग के लिए आत्म-मुग्धता एवं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का निर्वहन करना और एक अन्य वर्ग के लिए अपमान सहते हुए जीवकोपार्जन का एक अवसर मात्र है। (हाल ही में, जनपद- चमोली (गढ़वाल) के सुभाई-चांचड़ी गाँव की घटना ने यह बताया है कि परम्परागत प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के तहत ऐसा पहले भी होता था और आज भी निर्बाध रूप में हो रहा है।)

व्यवहारिक हकीकत यह है कि डड्वार के सौणू की तरह समृद्ध शिल्पकार वर्ग आज भी, सवर्णों की जातीय मानसिकता के विभेद के कारण चाह कर भी वापस गाँवों में नहीं बसना चाहते हैं। क्योंकि, उनका कटु अतीत जीवन-भर पीछा नहीं छोड़ता। वह छुपाना चाहता है, पर छुपा नहीं पाता है। वह उसे भूलना चाहता है पर आज भी सवर्ण जातीय सामान्य व्यवहार से वह उसे और भी याद आने लगता है। और, यह द्वन्द्व प्रतिरोध का बोध कराता हुआ जीवन-भर उसे अंदर से जकड़े रहता है।

शिल्पकार वर्ग का सर्वणों की तुलना में गाँवों से तेजी से पलायन होने के बाद खाली और वीरान होते उनके घरों-भवनों से इस तथ्य को भली-भाँति समझा जा सकता है।

उत्तराखण्ड में व्याप्त सामाजिक असमानता, अस्पृश्यता, अपमान और अन्याय की चिन्ताजनक स्थिति और स्तर सभी कार्य क्षेत्रों में हैं। इससे हमारे समाज में विभिन्न क्षेत्रों में उभर रहा दलित नेतृत्व भी अछूता नहीं है।

वास्तविकता तो यह है कि उत्तराखण्ड में राजनैतिक और सामाजिक संगठनों में अभी तक दलित नेतृत्व मात्र ‘शो पीस’ के स्तर तक ही पहुँचा है। राजनैतिक पार्टियों में दलित प्रतिनिधि अपने नेताओं की पिछलग्गू छवि से आगे नहीं बढ़ पाये हैं। राजनैतिक दलों के नेताओं ने भी चतुराई से आरक्षित सीटों पर ऐसे दलितों को टिकट दिया जो उनके ही अनुयायी बने रहें। दूसरी ओर आरक्षित सीट की आम जनता वोट देने में उदासीन भाव रखती है। अन्य विधानसभा क्षेत्रों से आरक्षित सीट पर सामान्यतया कम मतदान इस तथ्य की पुष्टि करता है। उस सीट पर सामान्य वोटर की मनोदशा योग्य और अनुभवी प्रत्याशियों को चुनने के बजाय उनके हितकारी बने दलित विधायक बनाने की रही है। लिहाजा, अक्सर उच्च शिक्षित, बुद्धिजीवी, शासन-प्रशासन में अनुभवी और चर्चित दलित व्यक्तित्व इन सीटों पर नहीं जीत पाये। यही कारण है कि, विधायक बने दलित नेता अपने राजनैतिक नेतृत्व और विधायी पटल के सम्मुख दलित हितों एवं अन्य तथ्यों को तर्कशील और पुरजोर तरीके से नहीं रख पाते हैं।

उत्तराखण्ड बनने के इन 24 सालों में विभिन्न राजनैतिक दलों और सामाजिक संगठनों के दलित नेता किसी सामान्य हित के मुद्दों पर आपसी आम राय नहीं बना पाये हैं। राज्य विधानसभा में 15 सीटें आरक्षित वर्ग की हैं। परन्तु, दलित मुद्दों और उत्पीडन की घटनाओं को लेकर वे कभी एक साथ प्रतिरोध करते दिखे हो ऐसा नहीं देखा गया है। अगर ऐसा कभी हुआ भी हो तो वो किंचित मात्र अपवाद ही होगा। असल बात तो यह है कि वे अपने राजनैतिक खोल से कभी बाहर आये ही नहीं हैं। अनावश्यक डरी हुई राजनैतिक मजबूरी उन्हें स्वतन्त्र चिंतन और साहस से रोकती है।

यही कारण है कि दलित उत्पीडन की घटनाओं का विरोध उतना असरकारी नहीं हो पाता है जितना अन्य वर्ग की घटनाओं का। उत्पीड़न किसी भी वर्ग का हो वह हर नागरिक को व्यथित करता है। उसका हर वर्ग द्वारा विरोध भी किया जाता रहा है। परन्तु, उस उत्पीड़न के विरोध की ध्वनि कितनी असरकारी होती हैं, यह उस वर्ग के जागरूक नागरिकों और उनके अग्रणी सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व की क्षमता पर निर्भर करता है।

सितम्बर, 2022 में उत्तराखण्ड में घटित दो अत्यन्त दुखःदाई घटनायें यथा- जगदीश (अल्मोड़ा) और अंकिता (हरिद्वार) की हत्या इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इन दोनों घटनाओं पर न्यायिक प्रक्रिया गतिमान है। परन्तु, अंकिता हत्याकांड का एक व्यापक जन दबाव आज भी है, जबकि जगदीश हत्याकांड पर चर्चा भी नहीं हो पाती है।

दलित वर्ग एवं उसके राजनैतिक और सामाजिक नेतृत्व के हाशिए पर होना इसका प्रमुख कारण है।

यह माना ही जाना चाहिए कि, उत्तराखण्ड में प्राकृतिक एवं मानवीय आपदाओं, जल विद्युत परियोजनाओें, विकास एवं निर्माण कार्यों तथा अन्य कारणों से अपने घरों एवं भूमि से बेदखल शिल्पकारों की स्थिति सर्वणों से ज्यादा पीड़ादायक होती है, परन्तु उनकी इस विशेष पीड़ा को कोई समझने को तैयार नहीं है। यही नहीं, जातीय एवं महिला उत्पीडन, मन्दिर प्रवेश, मिड डे मील में भेदभाव, ट्राइसम योजना, जन जातीय क्षेत्रों में अनुसूचित जाति की दयनीय स्थितियाँ, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनों में शिल्पकारों के योगदान की उपेक्षा जैसे विषयों पर अधिकांष दलित जन-प्रतिनिधियों की चुप्पी आहत करती हैं।

स्थिति यह है कि आज किसी भी राजनैतिक दल के विचार-पत्रकों और चुनावी घोषणा पत्रों में दलितों के मुद्दों को प्रमुखता से स्पष्ट और प्रभावी तौर पर नहीं उठाया गया है। इनमें सबने गोलमाल बातें ही कही हैं। इसीलिए, दलितों के कल्याण और उत्थान के लिए कोई ठोस एजेण्डा अभी तक सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आ पाया है।

उत्तराखण्ड के दलित विमर्श में यह एक गम्भीर एवं चिन्ताजनक प्रश्नचिन्ह हैं।

हमारे राज्य की विडम्बना यह है कि राज्य बनने के बाद गर्व करने वाली बातों को हमने सबसे पहले भुलाया है। अतीत में अपने समाज के नायकों के सकारात्मक प्रयोगों को हम आगे नहीं बढ़ा पाये हैं। कारण स्पष्ट है कि ऐसे प्रयासों को जनसामान्य और जन प्रतिनिधियों का समर्थन लम्बे दौर तक नहीं मिल पाता है। दलित विमर्श के संदर्भ में एक उदाहरण पेश है-हम सब जानते हैं कि 26 जनवरी, 1950 को आजाद भारत का संविधान लागू हुआ था। परन्तु यह बहुत कम लोग जानते हैं कि इसी दिन देश के सबसे पिछड़े इलाकों में शामिल उत्तराखण्ड की भिलंगना घाटी के पट्टी-थाती कठूड के बूढाकेदार में एक अप्रत्याशित और क्रांत्रिकारी पहल से एक नई सामाजिक संरचना का भी शुभारम्भ हुआ था।

हुआ यह कि इसी दिन जातीय बंधनों को तिलांजलि देते हुए एक पंडित, एक क्षत्रिय और एक शिल्पकार परिवार ने एक साथ रहने का फैसला लिया था। धर्मानंद नौटियाल (सरौला ब्राह्मण, थाती गांव), बहादुर सिंह राणा (थोकदार क्षत्रिय, थाती गांव) और भरपुरू नगवान (शिल्पकार, रक्षिया गांव) ने मय बाल-बच्चों सहित एक साझे घर में नई तरह से जीवन-निर्वाह की शुरूआत की थी।

अलग-अलग जाति के मित्रवत भाईयों के इस संयुक्त परिवार में बिना भेदभाव के एक साझे चूल्हे में मिल-जुल कर भोजन बनाना, खाना-पीना, खेती-बाड़ी और अन्य सभी कार्यों को आपसी सहभागिता से निभाया जाने लगा। यह देखकर स्थानीय समाज अचंभित था। इनके लिए सर्वत्र सामाजिक ताने, उलाहना, कहकहे और विरोध होना स्वाभाविक था। स्थानीय लोगों में दबी जुबान से इनके साहस और समर्पण की प्रषंसा भी हो रही थी। परन्तु प्रत्यक्ष तौर से इनका साथ देने का साहस किसी के पास नहीं था। यह बेहद महत्वपूर्ण है कि उक्त त्रिजातीय साम्ययोगी परिवार की रचना में किसी प्रकार का आपसी दबाव और प्रलोभन नहीं था। अपने अन्तःकरण के भावों की सहर्ष स्वीकृति ही इस अभिनव संयुक्त परिवार का आधार था।

उक्त तीनों महानुभावों ने इस साझेघर की प्रत्येक गतिविधि को सामाजिक चेतना का प्रेरक और वाहक बनाने का प्रयास किया। अस्पृश्यता को मिटाने के लिए समय-समय पर सभी जातियों का सामुहिक भोज, दलितों के मंदिरों में प्रवेश और विवाह में डोला-पालकी का समान अधिकार, सामुहिक उद्यमशाला का संचालन, सार्वजनिक पुस्तकालय, भू-दान, प्रौढ़ शिक्षा, बलि प्रथा को रोकना, उन्नत खेती और पषुपालन आदि के लिए रणनीति बनाने और उसे व्यवहार में लाने के प्रयासों का संचालन केन्द्र यह साझाघर बन चुका था।

यह उल्लेखनीय है उसी दौर में इसी बूढाकेदार क्षेत्र में सर्वणों द्वारा समय-समय पर दलितों को मंदिर प्रवेश से रोकना, उनके पारिवारिक विवाह में डोला-पालकी का विरोध करना और अन्य तरह की सामाजिक प्रताड़नायें भी प्रचलन में थी। इसी इलाके के अध्यापक दीपचंद शाह की बारात को डोला-पालकी की वजह से 21 दिनों तक जंगलों में भटकते हुए रहना पड़ा था। दीपचंद ने बाद में अघ्यापकी छोड़कर पटवारी बनना कबूल किया ताकि वे ज्यादा मजबूती से सामाजिक अन्याय का विरोध कर सके।

तीन मित्रों का उक्त सहजीवन लगभग 12 साल तक बिना किसी कटुता के निर्बाध रूप में चला। जैसे भाई-भाई आपस में एक समय के बाद एक दूसरे से अलग परिवार बना लेते हैं, उसी प्रेमपूर्वक तरीके से यह संयुक्त परिवार भी 12 साल बाद जुदा हुआ था। परन्तु उनकी अन्य सभी सामाजिक कार्यां में पारिवारिक साझेदारी आगे भी चलती रही। और, आज़ भी जारी है। इन अर्थों में यह अभिनव प्रयास किसी भी दृष्टि से असफल नहीं था।

यह उल्लेखनीय है कि भरपूरू नगवान के सुपुत्र बिहारी लाल ने अपने पिता के कार्यों को आगे बढ़ाया। सर्वोदयी विचारधारा के अग्रणी कार्यकर्ता बिहारी लाल ने बूढ़ाकेदारनाथ में वर्ष 1977 में ‘लोक जीवन विकास भारती’ संस्था का गठन किया था। इस संस्था के अन्तर्गत अन्य समाजोपयोगी कार्यक्रमों के साथ एक स्कूल का संचालन इस विचार के साथ प्रारंभ किया कि खुशहाल एवं लोकोपयोगी जीवन के लिए बुनियादी तालीम की समझ बच्चे सीखें एवं व्यवहारिक जीवन में उसे आत्मसात करें। बिहारी लाल जी ने स्थानीय संसाधनों और अवसरों के बेहतर उपयोग के लिए स्वरोजगार की कई योजनायें संचालित की। आश्रम में संचालित स्वःनिर्मित 50 किलोवाट का पन बिजलीघर की चर्चा सर्वत्र हुई। इसी तरह उनके षैक्षिक एवं सामाजिक प्रयोग सफल रहे। वर्तमान में, इस आश्रम से जीवनीय शिक्षा प्राप्त करके सैकड़ों विद्यार्थी देश-दुनिया में बेहतर कार्य कर रहे हैं।

दुखःदाई यह है कि विगत 4 दशकों से सामाजिक चेतना के विस्तार और विकास का यह मातृस्थल मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों के अभाव से ग्रस्त था। उस पर अभी हाल में आई विपदा के उपरान्त इसके अस्तित्व को ही बचाना मुश्किल हो गया है।

बेहतर होता कि पूर्व में हमारे समाज में हुए ऐसे प्रयासों को अधिक से अधिक प्रभावी माध्यम से सार्वजनिक किया जाता। हमारे विद्यालयी और विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में इसे शामिल किया जाता।

समाज की वर्जनायें तभी टूटती जब हर वर्ग और जाति में धर्मानन्द नौटियाल, बहादुर सिंह राणा और भरपुरू नगवान जैसे जागरूक और साहसी लोग अपनी सामाजिक सक्रियता और सेवाभाव से समाज का नेतृत्व करते।

परन्तु खेदजनक तथ्य यह है कि जन प्रतिनिधियों, नीति-नियंताओं और बुद्धिजीवियों ने बूढ़ाकेदार की इस ऐतिहासिक घटना को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में कोई दिलचस्पी अभी तक भी नहीं ली है।

जबकि, इस क्षेत्र से पूर्व से लेकर आज तक आरक्षित जनप्रतिनिधि उत्तराखण्ड विधानसभा में बतौर विधायक आते रहे हैं।

उत्तराखंड में आजादी से पूर्व का दलित नेतृत्व आज के दलित नेतृत्व से ज्यादा प्रभावकारी और दूरदर्शी दिखाई देता है। देश के स्वाधीनता आन्दोलन में जहां सवर्ण राजनैतिक आजादी के सवाल पर मुखर था, वहीं उस समय का दलित वर्ग आजादी के साथ उन पर हो रहे परम्परागत सामाजिक उत्पीड़न और नागरिक अधिकारों को हासिल करने के लिए भी संघर्षरत था। डॉ. अम्बेडकर के संपूर्ण जीवनीय संघर्ष को देष में शिल्पकारों के इस दोहरे संघर्ष के प्रतिनिधि विचार के रूप में बेहतर और आसानी से समझा जा सकता है।

हरिप्रसाद टम्टा, खुशीराम आर्य, बालक राम प्रज्ञाचक्षु, लक्ष्मी देवी, टम्टा, बची राम आर्य, जयानंद भारती से लेकर बलदेव सिंह आर्य जैसे कई अन्य व्यक्तित्वों ने शिल्पकार वर्ग में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, शैक्षिक और आर्थिक चेतना को उभारा था। वैसा, वैचारिक पैनापन आज दलित नेताओं नहीं दिखता है। उस समय के दलित नेताओं ने देश की स्वाधीनता और स्थानीय समाज में अपनी समान हिस्सेदारी के लिए प्रबल संघर्ष किया था। और, उसमें वे सफल भी हुए थे।

समाज-सुधारक हरिप्रसाद टम्टा ने लिखा कि ‘सन् 1911 में जार्ज पंचम के अल्मोड़ा आगमन पर आयोजित समारोह में उन्हें और उनके साथ अन्य शिल्पकारों को शामिल नहीं होने दिया गया था। लोगों ने यहाँ तक कह दिया था कि अगर मुझ जैसे दरबार में शामिल होंगे तो बलवा हो जायेगा।…..इन्हीं बातों के बदौलत मेरे दिल में इस बात की लौ लगी थी कि मैं अपने भाईयों को दुनिया की नजरों में इतना ऊंचा उठा दूंगा कि लोग उन्हें हिकारत की निगाहों से नहीं बल्कि मुहब्बत और बराबरी की नजरों से देखेंगे…’ (डॉ. मुहम्मद अनवर अन्सारी, पहाड़-4, सन् 1989)

उत्तराखंड के शिल्पकार वर्ग में सामाजिक-शैक्षिक चेतना के अग्रदूत बलदेव सिंह आर्य ने सन् 1930 में 18 वर्ष की किशोरावस्था में निरंकुश बिट्रिश सत्ता का सार्वजनिक विरोध करके 18 महीने की जेल को सहर्ष स्वीकार किया। यह उनके अदम्य साहस और दीर्घगामी सोच का ही परिणाम था। उन्होने ‘डोला पालकी आन्दोलन’ में भाग लेकर भेदभावपूर्ण तत्कालीन सामाजिक परम्परा को खुली चुनौती दी थी। सन् 1942 में उनके संपादन में तैयार ‘सवाल डोला पालकी’ रिपोर्ट देश भर में चर्चित हुई थी। इस रिर्पोट से प्रेरणा लेकर उस दौर में देष के अन्य क्षेत्रों और समुदायों के दलित और जागरूक लोगों ने सामाजिक पक्षपात के विरुद्ध आवाज उठाई थी।

देश के स्वाधीन होने के बाद एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में बलदेव सिंह आर्य की ख्याति रही है। उत्तराखण्ड में वन और वनवासियों की स्थिति तथा सुधार के दृष्टिगत बलदेव सिंह आर्य की अध्यक्षता में ‘कुमाऊँ जंगलात जांच समिति-1959 (कुजजास)’ का गठन किया गया था। समिति ने जंगलों पर स्थानीय निवासियों के परम्परागत हक-हकूकों को स्वीकारते हुए महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। यह गौरतलब है कि यदि ‘कुमाऊँ जंगलात जांच समिति-1959’ के सुझावों को तत्कालीन सरकार गम्भीरता से लागू कर देती तो संभव था कि हम ‘वन संरक्षण अधिनियम-1980’ के दुष्परिणामों की जकड़ में नहीं जकड़े होते। आज उत्तराखण्ड की वन्यता की बेहतर स्थिति और देखभाल होती।

सन् 1942 में ‘सवाल डोला पालकी’ रिर्पोट के अन्तिम पैरा में बलदेव सिंह आर्य ने लिखा कि ‘डोला-पालकी समस्या को सुलझाने में हमें देश के बडे़-बड़े नेताओं का नैतिक और क्रियात्मक सहयोग बराबर मिल रहा है और उस समय तक मिलता रहेगा जब तक शिल्पकारों के इस नागरिक अधिकार को समस्त बिठ (सर्वण) जनता स्वेच्छा से स्वीकार न कर लें। वे जब तक इस बात को अनुभव न कर लें कि शिल्पकार भी अपने ही भाई हैं और उनकी उन्नति करना भी हमारा फर्ज है।… बिठ जनता को तो यह स्वयं अनुभव कर लेना चाहिए कि यदि हमारा एक अंग अधिकार से वंचित रहता है तो यह हमारी राष्ट्रीय अयोग्यता है और जब तक यह दूर न होगी तब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता है।’ (उत्तराखण्ड में दलित चेतना, पृष्ठ-14, उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट, वर्ष-2006)

देश के स्वाधीनता के बाद यह बात दीगर है कि उत्तराखण्ड में हुए आन्दोलनों यथा- सर्वोदय, वन (चिपको), नशा नहीं रोजगार दो, बांध विरोधी और राज्य निर्माण आन्दोलनों में शिल्पकार वर्ग की भागेदारी और योगदान को समय के अंतराल ने नेपथ्य डाल दिया है। इन आन्दोलनों की पड़ताल पर लिखे गए अथाह लेखों और शोध-पत्रों में दलित योगदान का जिक्र चलते-चलते ही हुआ है। आन्दोलनों में महत्वपूर्ण भूमिकायें निभाने वाले कई अनाम दलित नायक हैं, जिन्हें भुला दिया गया। यही इन आन्दोलनों की असफलता एवं अधूरेपन का प्रतीक और प्रमाण भी है।

यह अच्छी तरह समझा जाना चाहिए कि हजारों सालों से लेकर आज तक उत्तराखण्ड के ग्रामीण समाज की सामाजिकता और आर्थिकी को जीवंत करने में शिल्पकार बन्धुओं की प्रमुख भूमिका रही है। आज भी जो कुछ लोक का तत्व हमारे समाज में दिखाई और सुनाई दे रहा है उसका प्रमुख संवाहक शिल्पकार वर्ग ही है।

संक्षेप में, उत्तराखण्ड में दलित नेतृत्व को समझना होगा कि वर्तमान में शिल्पकार वर्ग एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। वह अपनी पैतृक विरासत, हुनर और अवसरों को बचाये रखने के लिए ही कड़ी बाहरी प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है। उसके लिए जीवन के नवीन जीवकोपार्जन के अवसरों को हासिल करना और भी कठिन होता जा रहा है। उनके प्रति सामाजिक असमानता और राजनैतिक उपेक्षा का भाव अभी भी प्रभावी है।

अतः उसे एक सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनैतिक सामुहिक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है।

आज के कठिन समय की यह चुनौती हर वर्ग को स्वीकारनी होगी। तभी हम आज की सामाजिक दायित्वशीलता को निभाने वाले जिम्मेदार एवं दूरदर्शी नागरिक और नेतृत्वकारी साबित होंगे।

संदर्भ साहित्य-

01. मध्य हिमालय की अनुसूचित एवं पिछड़ी जातियाँ (परंपरा, शिल्प और उद्यम), महेश्वर प्रसाद जोशी, वर्ष- 2011, अल्मोड़ा बुक डिपो, अल्मोड़ा।

02. उत्तराखण्ड की आर्य शिल्पकार विभूतियाँ (दिवंगत)- कुमार दिनकर, वर्ष-1993, स्व. श्री गिरधारी लाल आर्य साहित्यिक अकादमी, लखनऊ।

03. भरपुरू नगवान (जीवन और संघर्ष)- बिहारी भाई, वर्ष- 2018, समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून एवं लोक जीवन विकास भारती, बूढ़ाकेदानाथ।

04. उत्तराखण्ड में शिल्पकार बनाम पिछड़ी जाति बनाम आरक्षण, बी. एल. दनोसी, वर्ष- 2011, रुबि निकुंज, पौड़ी (गढ़वाल)।

05. हिमालय दलित है- मोहन मुक्त, वर्ष- 2022, समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून।

06. बिहारी लाल का जीवन, संघर्ष, कार्य- सुरेश भाई, वर्ष- 2021, विनसर पब्लिशिंग क., देहरादून।

07. डूबता शहर- बचन सिंह नेगी, वर्ष- 2004, देहरादून।

08. A Bundle Of Burdens – B. L. Danosi, Year-2011, Wnsar Publishing Co. Dehradun.

09. डड्वार- महेशानन्द, वर्ष- 2014, खबरसार प्रकाशन, पौड़ी।

10. बिहारी लाल के रचनात्मक कार्य एवं संस्मरण- सुरेश भाई, वर्ष- 2021, विनसर पब्लिशिंग क., देहरादून।

11. कसक की कसौटी- प्रेम पंचोली, वर्ष- 2022, समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून।

12. गढ़वाल के शिल्पकारों का इतिहास- बी.एल. दनोसी, वर्ष- 2006, विनसर पब्लिशिंग क., देहरादून।

13. मेरा जीवन प्रवाह- चमन लाल प्रद्योत, वर्ष- 2008, देहरादून।

14. उत्तराखण्ड के शिल्पकार- चमन लाल प्रद्योत, प्रवीण भट्ट एवं अरुण कुकसाल, वर्ष- 2012, विनसर पब्लिशिंग क., देहरादून।

15. उत्तराखण्ड में दलित चेतना- वर्ष- 2006, उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट, पौड़ी (गढ़वाल)

16. भारत में जातिप्रथा एवं जातिप्रथा-उन्मूलन- बाबासाहेब डॉ. अम्बेडर, वर्ष- 2019, डॉ़ अम्बेडर प्रतिष्ठान, भारत सरकार, नई दिल्ली

अरुण कुकसाल,

ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौं-246163, पट्टी- असवालस्यूं, 

विकासखण्ड- कल्जीखाल, जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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2017 तक स्टार्टअप की संख्या थी शून्य। वर्ष 2025 में बढ़कर हुई 1750

- 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ₹ 3,81,889 करोड़ का रहा - 2021-22 के मुकाबले जीएसडीपी में आया डेढ़ गुना से ज्यादा...

एक साधारण व्यक्ति में असाधारण व्यक्तित्व की जीवन्त जीवन जीने की शब्द-यात्रा है – BARLOWGANJ AND BEYOND

- साधारण व्यक्ति का असाधारण व्यक्तित्व : प्रो. बी. के. जोशी। - प्रो. बी. के. जोशी जी के जीवनीय आत्म-संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक 'BARLOWGANJ...

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान

विकास के नए आयाम स्थापित करती ग्राम पंचायत भगवन्तपुर की ग्राम प्रधान   By - Harishankar saini   कभी गड्ढों, कीचड़ और टूटे किनारों से जूझती सलान गाँव...

होली विशेषांक : खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर।

- खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर। - दून पुस्तकालय में संगीताजंलि की शानदार होली प्रस्तुति दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के एम्फीथियेटर में आज संगीतांजली शास्त्रीय...

बर्लोगंज एंड बियोंड पुस्तक का लोकार्पण

पुस्तक : बर्लोगंज एंड बियोंड   By - Dr. Yogesh dhasmana   देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो बी के जोशी के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक बर्लोगंज एंड बियोंड...

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में।

विज्ञान दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में। By - Neeraj Uttarakhandi पुरोला विकासखंड के अंतर्गत राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्देली में राष्ट्रीय...

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी।

स्पैक्स संस्था ने होली के प्राकृतिक रंगों पर दून पुस्तकालय में बच्चों को दी जानकारी। .......... दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘स्पेक्स’ संस्था के सहयोग...

जनगणना की पूरी तैयारी, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी जनगणना

जनगणना-2027 की डिजिटल तैयारियां शुरू, देहरादून में 25-27 फरवरी तक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू चार्ज अधिकारियों से लेकर सेन्सस क्लर्क तक, सभी ले रहे डिजिटल...

एक स्वस्थ परंपरा है स्कूल ऑफ थॉट्स – प्रो० पंवार

स्कूल ऑफ थॉट्स, श्रीनगर (गढ़वाल), भारतीय-हिमालयी ज्ञान परंपरा,  मुख्य वक्ता- प्रो. मोहन पंवार। भारतीय : हिमालय ज्ञान परंपरा पर अपनी बात शुरू करते हुए मुख्य...