Sunday, June 28, 2026
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‘परियों के देश खैट पर्वत में’

‘परियों के देश खैट पर्वत में’
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Dr. Nandkishor Hatwal

8 साल के दीपक के पिता की टीबी के कारण मृत्यु हो गई। चाचा और मां भी बीमार रहने लगे। बीमारी की डर से गांव वाले कोई उनके निकट नहीं जाते। एक दिन मुंह अंधेरे दीपक की मां अपने दो बेटों को लेकर गांव से निकल गई और बेस हास्पिटल, श्रीनगर (गढ़वाल) पहुंच गई।

संयोग से वहां समाजसेवी विभोर बहुगुणा अपने साथियों के साथ पहुंच गए। उन्होंने देखा अस्पताल की गैलरी में एक महिला अपने दो बच्चों को सीने से चिपकाये चुपचाप बैठी है। उन्होने पूछा तो महिला रोने लगी। विभोर ने उनको चाय-बिस्कुट खिलाया, मदद का आश्वासन दिया। तब महिला ने अपनी आप-बीती सुनाई।

विभोर ने महिला को अस्पताल में भर्ती करा दिया। उसका लम्बा इलाज और बच्चों की पढ़ाई को देखते हुए विभोर ने अपने गांव बलोड़ी में स्थित पंचतत्व आश्रम में उनके रहने-खाने और बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था कर दी। यह आश्रम श्रीकोट से मात्र 15 किमी. की दूरी पर बुघाणी और सुमाड़ी के पास है।

Pariyo ke desh khait paravat men
Pariyo ke desh khait paravat men

मां का इलाज होने लगा और बच्चों की पढ़ाई। लेकिन, नियति को कुछ और मंजूर था। कोशिशों के बावजूद मां स्वस्थ नहीं हो सकीं और जनवरी, 2017 को अस्पताल में ही उनका देहान्त हो गया। दीपक और देवेन्द्र अनाथ हो गए।

मृत्यु से पहले मां ने विभोर को अपना धर्म भाई बना लिया था और अपने बच्चों की जिम्मेदारी सौंप दी थी। बच्चे पंचतत्व आश्रम में पढ़ रहे थे। विभोर ने दोनो बच्चों की जिम्मेदारी ले ली। वे छुट्टियों में विभोर के घर आते-जाते। लेकिन काल की क्रूरता थमी नहीं। उधर गांव में दीपक के चाचा की और इधर दीपक के बड़े भाई देवन्द्र की भी बीमारी से मौत हो गई।

8 साल का दीपक अब इस दुनिया में नितांत अकेला हो गया था।

आगे दीपक के साथ क्या हुआ? अभी वो कहां है? क्या कर रहा है? कैसे जी रहा है? यह जानकारी आपको डॉ. अरुण कुकसाल की पुस्तक ‘परियों के देश खैट पर्वत में’ में मिलेगी।

दीपक की पूरी कहानी उक्त पुस्तक के अंतिम अध्याय ‘दीपक का खैनोली गांव’ शीर्षक के अर्न्तगत दी गई है।

डॉ. अरुण कुकसाल द्वारा लिखित उक्त पुस्तक यात्रा वृतान्त है। लेखक ने अपनी यात्राओं को छः शीर्षकों में विभाजित किया है- 1. नीति-माणा की ओर 2. बादल जहरीखाल के 3. सेम-मुखेम के नागराज कृष्ण 4. परियों के देश खैट पर्वत में 5. शिव-पार्वती का विवाह स्थल त्रियुगीनारायण और 6. दीपक का खैनोली गाँव।

लेकिन यह किताब सिर्फ यात्रा वृतान्त नहीं है। यह इन क्षेत्रों का सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक वृतान्त भी है तो मानव जीवन का अध्ययन भी। वस्तुतः यह तीर्थ और पर्यटन स्थलों की यात्राएं नहीं, गांवों की यात्राएं हैं। इसमें सिर्फ पहाड़ के सौन्दर्य और विमुग्धकारी दृश्यों का वर्णन नहीं बल्कि यहां के गांवों और लोगों की कठिनाइयों और चुनौतियों के ब्योरे भी हैं। यह यात्रा वृतान्त पहाड़ी गांवों के अतीत और वर्तमान की पड़ताल करते हुए भविष्य की तस्वीर भी है।

पुस्तक में टूरिस्ट की भावुक, रोमांचक, मनोरंजक और सुकून पहुंचाने वाली दृष्टि नहीं, बैचेन करने वाली चिंताएं और सवाल भी हैं। ये विवरण पर्यटकों को आकर्षित करें न करें पर उनको सचेत जरूर करते हैं।

पुस्तक में हिम मंडित शिखर, कल-कल, छल-छल करती नदियां, ठण्डी पवन, झरने, झील, ताल, खूबसूरत बुग्याल, देवदार के वन, देवभूमि, तीर्थ-मंदिरों के साथ चिकित्सा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, रोजगार, पलायन, खेती-किसानी के तीखे सवाल भी हैं। इन विवरणों में इतिहास, मंदिरों के विवरण-शिल्प, स्थापत्य कलाएं, रोचक परम्पराएं, किस्से, किंवदंतियां, मान्यताएं, लोकविश्वास और कच्ची रोड़, टूटी सड़कें, जाम, फिसलते पहाड़, ऊपर से गिर रहे पत्थर, उन पर चल रहे यात्री वाहन, कठिन पगडंडियां, भू-धंसाव, भू-स्खलन और खड़ी चढ़ाई साथ-साथ चलते हैं।

इन यात्रा वृतान्तों में लेखक के साथ यात्रा करते हुए आपकी कई लोगों से मुलाकात भी होती है। जैसे उर्गम घाटी के लक्ष्मण नेगी, जिन्होने उस इलाके में सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति, विकास और पर्यावरण चेतना की अलख जगायी है, जोशीमठ के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे अतुल सती और अध्येता प्रो. चरणसिंह ‘केदारखंडी’, उद्यमी एवं अन्वेषक राजेन्द्र प्रसाद पुरोहित तो श्रीनगर के विभोर बहुगुणा जो समाजसेवा के अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं। पुस्तक में लैंसडौन की खूबसूरती, गढ़वाल राइफल, भर्ती और वहां प्रो. वाचस्पति और हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन का 75 वां जन्म दिन भी है तो खैट पर्वत की परियों के किस्से-किंवदन्तियां भी हैं।

ये सभी यात्राएं लेखक ने 11 दिसम्बर, 2021 से 17 जनवरी, 2024 तक की अवधि में की हैं तथा पुस्तक में इन्हें कालक्रमानुसार, रेखाचित्रों की सुसज्जा के साथ दिया गया है। इन गांवों की उक्त समयावधि की वास्तविक तस्वीर देखने के लिए ‘परियों के देश खैट पर्वत में’ पुस्तक जरूर पढ़ी जानी चाहिए।

डॉ. नंदकिशोर हटवाल

‘परियों के देश कैट पर्वत में’ यात्रा-पुस्तक अमेजॉन-
लिंक-https://amzn.in/d/aO2LoeF पर भी उपलब्ध है।

पुस्तक का नाम : परियों के देश खैट पर्वत में
लेखक : डॉ. अरुण कुकसाल
पृष्ठ संख्या : 111
मूल्य : ₹ 150
प्रकाशक एवं
मुद्रक : समय साक्ष्य, 15 फालतू लाइन, देहरादून -248001
दूरभाष : 0135-2658894ठ

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