Thursday, May 14, 2026
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नवादा: दून की ऐतिहासिक राजधानी थी , महाराजा प्रद्युम्न शाह शाह द्वारा अजब सिंह, अजबपुर और घमंड सिंह, घमंडपुर को जागीर प्रदान की थी

नवादा: दून की ऐतिहासिक राजधानी थी , महाराजा प्रद्युम्न शाह शाह द्वारा अजब सिंह, अजबपुर और घमंड सिंह, घमंडपुर को जागीर प्रदान की थी

By – Sheeshpal Gusai 

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दो सौ वर्ष पूर्व, जब गढ़वाल की पर्वतीय भूमि अपने गौरवशाली इतिहास के स्वर्णिम पन्नों को संजो रही थी, तब दून घाटी की राजधानी नवादा हुआ करती थी। यह वह युग था जब गढ़वाल के राजवंश की शक्ति और वैभव अपने चरम पर था। गढ़वाल के अंतिम महाराजा प्रद्युम्न शाह के पूर्वजों ने इस उपजाऊ घाटी में दो वीर योद्धाओं, अजब सिंह और घमंड सिंह, को जागीर प्रदान की थी। ये दोनों श्रीनगर के राजपरिवार के सम्मानित सदस्य थे, जिनके पराक्रम और निष्ठा ने दून की धरती को गौरवान्वित किया। अजब सिंह के नाम पर अजबपुर गांव का नामकरण हुआ, जो दून के हृदय में बसा था, जबकि घमंड सिंह के नाम पर घमंडपुर, जो आज रानीपोखरी के नाम से जाना जाता है।

नवादा, वह प्राचीन स्थल, जो कभी दून की राजनैतिक और सांस्कृतिक धुरी हुआ करता था, गढ़वाल के शासकों की दूरदर्शिता और सामरिक कुशलता का प्रतीक था। यहाँ की हरियाली, उपजाऊ भूमि और समृद्ध कृषि ने इसे एक समृद्धशाली केंद्र बनाया। अजबपुर, जो नवादा का अभिन्न अंग था, न केवल अपने सामरिक महत्व के लिए जाना जाता था, बल्कि अपनी कृषि समृद्धि के लिए भी विख्यात था। यहाँ गन्ने की खेती प्रचुर मात्रा में होती थी, और बासमती चावल की सुगंध हवाओं में तैरती थी। इस चावल की एक विशेष किस्म, जिसे स्थानीय लोग ‘केशर’ कहते थे, के नाम पर ही केशरवाला गांव अस्तित्व में आया, जो आज भी रायपुर और मालदेवता के बीच अपनी ऐतिहासिक पहचान संजोए हुए है।

खुड़बुड़ा युद्ध: वीरता और बलिदान की गाथा
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वर्ष 1804 में दून की धरती एक ऐतिहासिक युद्ध की साक्षी बनी, जिसे खुड़बुड़ा युद्ध के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध गढ़वाल के अंतिम महाराजा प्रद्युम्न शाह और गोरखाओं के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में अजब सिंह और चंदेल रावत ने प्रद्युम्न शाह का साथ दिया, अपनी वीरता और निष्ठा का परिचय देते हुए। किंतु युद्ध के मैदान में प्रद्युम्न शाह शहीद हो गए, और उनकी शहादत ने गढ़वाल के इतिहास में एक अमिट अध्याय जोड़ दिया। अजब सिंह और चंदेल रावत की वीरता, हालांकि युद्ध के परिणाम को न बदल सकी, किंतु उनकी गाथाएँ आज भी दून की मिट्टी में गूँजती हैं।

अजबपुर: कृषि और संस्कृति का संगम
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अजबपुर केवल एक गाँव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और कृषि धरोहर का प्रतीक था। यहाँ की उपजाऊ भूमि ने न केवल गन्ने और बासमती चावल की खेती को पोषित किया, बल्कि यह क्षेत्र अन्न का भंडार भी रहा। रेसकोर्स, जो आज आधुनिक देहरादून का हिस्सा है, कभी अजबपुर का ही एक हिस्सा था, जहाँ खेतों की हरियाली और अन्न की प्रचुरता इस क्षेत्र की समृद्धि की कहानी कहती थी। अजबपुर को दो भागों में बाँटा गया था—अजबपुर खुर्द और अजबपुर कलां। आज भले ही ये दोनों क्षेत्र आधुनिक कॉलोनियों और शहरीकरण की चपेट में आ चुके हों, किंतु राजस्व रिकॉर्ड में इनका प्राचीन नाम अब भी जीवित है।

चंदेलों की विरासत और सती मंदिर
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अजबपुर की धरती चंदेल वंश की वीरता और बलिदान की साक्षी रही है। चंदेलों के परिवार आज भी इस क्षेत्र में निवास करते हैं, और उनकी सांस्कृतिक धरोहर यहाँ के प्राचीन सती मंदिर में जीवित है। यह मंदिर उन चंदेल महिलाओं की स्मृति में बनाया गया था, जिन्होंने सती प्रथा के अंतर्गत अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह उस युग की सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का भी प्रतीक है। आज चंदेल वंश की आठवीं पीढ़ी इस मंदिर में पूजा-अर्चना करती है, और इस प्रकार अपनी गौरवशाली परंपराओं को जीवित रखती है।

अजबपुर के अंतिम जमींदार: बादाम सिंह रावत
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अजबपुर के अंतिम जमींदार बादाम सिंह रावत थे, जिनके शासनकाल में यह क्षेत्र अपनी समृद्धि और वैभव के शिखर पर था। उनके नेतृत्व में अजबपुर ने न केवल कृषि के क्षेत्र में उन्नति की, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बना रहा। बादाम सिंह रावत की स्मृति आज भी इस क्षेत्र के लोगों के मन में जीवित है, जो उनकी उदारता और दूरदर्शिता को याद करते हैं।

आधुनिक युग में अजबपुर
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आज का अजबपुर, जो कभी नवादा की राजधानी का हिस्सा था, आधुनिक देहरादून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। शहरीकरण की लहर ने इस क्षेत्र की प्राचीन पहचान को भले ही कुछ धूमिल किया हो, किंतु इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर आज भी जीवित है। अजबपुर खुर्द और अजबपुर कलां के खेतों की जगह अब कॉलोनियाँ और आधुनिक इमारतें ले चुकी हैं, किंतु चंदेलों का सती मंदिर, केशरवाला का नाम, और अजब सिंह व घमंड सिंह की गाथाएँ इस धरती की स्मृतियों में बसी हुई हैं।

दून घाटी का अजबपुर न केवल एक गाँव था, बल्कि गढ़वाल के गौरवशाली इतिहास, वीरता, और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। यह वह भूमि है, जहाँ गन्ने की मिठास और बासमती की सुगंध ने कृषि की समृद्धि को परिभाषित किया था; जहाँ खुड़बुड़ा युद्ध की गाथाएँ वीरता और बलिदान की कहानी कहती हैं; और जहाँ चंदेलों का सती मंदिर सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए है। नवादा, जो कभी दून की राजधानी थी, आज भले ही इतिहास के पन्नों में सिमट चुकी हो, किंतु अजबपुर की यह कहानी हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, और हमें उस गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है, जो आज भी हमारी पहचान का हिस्सा है।

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