लोकेश नवानी:उत्तराखण्ड में भाषा आन्दोलन के भगीरथ।
By – Virendra Panwar
लोकेश नवानी उत्तराखण्ड की अपनी लोकभाषाओँ को मान्यता दिलाने के आन्दोलन के भगीरथ हैं। आज उत्तराखण्ड में राज्य की गढवाली और कुमाऊँनी भाषाओँ के संरक्षण और सँवर्धन के लिये जो आन्दोलन दिखाई देता है,इस भाषाई आन्दोलन की अवधारणा के मूल में जिस सख्शियत का अहम् योगदान है,उनका नाम है लोकेश नवानी।लोकेश नवानी सिर्फ एक नामभर नहीँ हैं,वे स्वयं में एक संस्था हैं।
उन्होंने भाषा-आन्दोलन की शुरुआत गढ़वाली भाषा के साहित्य से की। वास्तव में कहें,तो कविता को
भाषा आन्दोलन का शुरुआती जरिया बनाया। वर्तमान दौर में गढ़वाली भाषा के जितने भी नामी रचनाकार हैं,कहीँ ना कहीं इनको अंकुरित करने में लोकेश नवानी जी का बड़ा योगदान है। गढ़वाली भाषा और साहित्य पर मैं स्वयं भी अगर कुछ लिख सका हूँ,तो इसका श्रेय श्री लोकेश जी के मार्गदर्शन को ही जाता है।उन्होने धाद जैसी पत्रिका को ना केवल स्थापित किया, वरन धाद के जरिए गढ़वाली साहित्य में एक ऐसा वातावरण तैयार किया ,जिससे एक नया कवि, लेखक भी अपने आप को सहजता से ब्यक्त और अभिब्यक्त कर सके।
गढ़वाली भाषा के संवर्धन और संरक्षण की मूल अवधारणा को लोकेश नवानी जी ने जिस तरह से ब्यापक फलक प्रदान किया,वह बेजोड़ है।
राज्य की गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाओं की स्थिति पृथक राज्य बनने के बाद आज भी जस की तस बनी हुईं है।
राज्य की भाषाओँ का जब भी जिक्र होता है,तो स्वाभाविक रूप से एक मूल प्रश्न सामने उभरकर सामने आ जाता है। पहाड़ों में जनसुविधाओँ की कमी के बहाने और कारण लोगों का पलायन।इस कारण से पहाड़ में आई विसंगतियों में सबसे बड़ी विसंगति यह आ रही है कि यहाँ की मूल भाषायें गढ़वाली और कुमाऊँनी कहीं पीछे छूटती चली जा रही हैं। सवाल अकेले भाषा का नहीं है,भाषा से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान के सवाल अलग से हैं। ऐसे में गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाओं को संरक्षित,पल्लवित,पुष्पित करने का अतिरिक्त दबाव यहाँ के लोकसमाज पर आ जाता है। राज्य की ये दोनों प्रमुख भाषाएँ आज के दौर में ही अपने अस्तित्व को खोने के संकट में आई होँ,ऐसा नहीं है।
उत्तराखण्ड की भाषाएँ जिस संकट की स्थिति में आज पहुँची हैं,लोकेश नवानी को इस संकट की आहट अस्सी के दशक से ही सुनाई देने लगी थी। बाद में सन 1996 में यूनेस्को जैसी संस्था की लुप्त होने के कगार वाली भाषाओँ की सूची में जब गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाओँ के नाम आये ,तो फिर भाषाप्रेमियोँ के सजग वर्ग को सोचने समझने और इस बाबत चिन्तन करने पर विवश होना पड़ा।
उत्तराखण्ड में भाषा-आन्दोलन का नामकरण, भाषा-आन्दोलन की परिकल्पना और भाषा आन्दोलन की समग्र अवधारणा लोकेश नवानी जी की देन हैं।
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज के दौर में गढ़वाली भाषा आन्दोलन के नाम पर अलग अलग मंचों के माध्यम से काम किया जा रहा है,वह भाषा के लिए अच्छी बात हो सकती है। लेकिन इस सारे भाषाई अभियान के मूल में प्रेरणा लोकेश नवानी ही हैं।
गढ़वाली भाषा के लिए आज जो भी, जहां भी जैसा काम काम हो रहा है,उसका अवलोकन करने पर एक बात ज्ञात होती है कि भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए ज्यादातर कविता के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गया है।
भाषा के लिए जिस संकल्पना और अवधारणा को लेकर लोकेश नवानी जी आगे बढ़े हैं,उस दिशा में गम्भीर काम उस स्तर पर हो नहीं पा रहा है।
आज के दौर में समान उद्देश्यों को लेकर गढ़वाली भाषा के लिए काम कर रहे ब्यक्ति अथवा संस्थाओं के पास अपना भाषाई रोड़ -मैप हो सकता है, लेकिन भाषा की जो संकल्पना लोकेश नवानी जी की चाह है,वह कहीं ना कहीं अभी धरातल पर आना बाकी है।
इसे लोकेश नवानी का अवगुण कहें या महानता,कि वे कोई भाषाई मंच हो या भाषा के किसी घटक पर श्रेय लेने की बात हो,हमेशा ही दूसरों को आगे बढ़ाने का काम करते रहे,स्वयं पृष्ठभूमि में रहे।
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“अक्सर मैने उनसे जब भी इस बाबत पूछा, उनका जवाब होता, हमें भविष्य के भाषा के आन्दोलनकारी तैयार करनी हैं।” यह बात श्री नवानी ने कवि वीरेंद्र पंवार से कही है।
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