प्रतिशोध की राजनीति : दरअसल राजनीति ही महाभारत है
Govind Prasad Bahuguna

दूसरों को उपदेश देना आसान काम होता है लेकिन यदि उसका पालन स्वयं करना पड़े तो यही काम मुश्किल लगता है I
महाभारत के एक प्रसंग में नीतिज्ञ विदुर बोल रहे थे कि-
“वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति
यैराहतः शोचति रात्र्यहानि ।
परस्परं मर्मसु ते पतन्ति
तान् पण्डितो नापसृजेत्परेषु ॥”-महाभारत
“वचन रूपी बाण से दूसरों के मर्म को चोट पहुँचाने से आहत व्यक्ति दुःख में डूब जाता है I इसलिए ऐसा किसी भी समझदार आदमी को नहीं करना चाहिए जिससे किसी व्यक्ति के स्वाभिमान को चोट पहुंचे I ”
यह पढ़ते समय मुझे श्रीमद्भागवत का एक प्रसंग याद आया जब यही विदुर जी भूतपूर्व सम्राट धृतराष्ट्र को बहुत ही चुभने वाली बात कह गए थे, उसी धृतराष्ट्र को जिसके सारे बेटे युद्ध में मारे गए थे I
दरअसल प्रसंग इस तरह का था कि महाभारत के युद्ध में पराजय के बाद जब पांडवों के हाथ में हस्तिनापुर की सत्ता आ गयी, तो नए सम्राट युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र को राजभवन से बेदखल नहीं किया बल्कि आदरपूर्वक कहा कि -ताऊजी आप हमारे लिए अभी भी राजा हो -आप यहीं हमारे पास बने रहिये और उनका खूब ख्याल रखा लेकिन उनके खान-पान की व्यवस्था भीमसेन देख रहे थे-जो धृतराष्ट्र से खुंदक रखते थे -़…

इसी बीच एक दिन विदुर वहां आ पहुंचे और वहां के हालचाल देखकर धृतराष्ट्र को कुछ ऐसी चुभने वाली बात कह गये कि धृतराष्ट्र को भी सुनकर अपने पर ग्लानि महसूस होने लगी और राजभवन छोड़ने का मन बना लिया- विदुर ने कहा-
“अहो ! इस प्राणी को जीवित रहने की इच्छा कितनी बलवती है जिसकी वजह से यह भीम का दिया हुआ टुकड़ा खाकर कुत्ते का सा जीवन बिता रहे हैं ! !जिसको आपने आग में जलाने की कोशिश की , विष देकर मार डालना चाहा, भरी सभा में जिनकी विवाहिता स्त्री का अपमान हुआ , जिनकी भूमि और संपत्ति को छीना, आज उन्हीं के अन्न से पल रहे हो , धिक्कार है ऐसे जीवन से तो मरना अच्छा है !! —
अहो महीयसी जन्तोर्जीविताशा यया भवान
भीमापवर्जितं पिण्डमादत्ते गृहपालवत ॥२२॥
अग्निर्निसृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दुषिताः ।
हृतं क्षेत्रं धनं येषां तद्दतैरसुभिः कियत ॥२३॥
तस्यापि तव देहोऽयं कॄपणस्य जिजीविषोः ।
परईत्यनिच्छते जीर्णो जरया वाससी इव ॥२४॥-श्रीमद्भागवत
विदुर के द्वारा पूर्व सम्राट धृतराष्ट्र को इतनी कड़वी बात कहते हुए जरा भी संकोच नहीं हुआ , यही विदुर जो कभी धृतराष्ट्र के मंत्री भी थे।
देखिए, राज्य सत्ता चली जाने के बाद कैसी गति होती है, यह दृष्टान्त आपके सामने है। शायद इसीलिये हर शासक किसी तरह सत्ता पर बने रहना चाहते हैं। उनके दिमाग में यही चलता रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि कुर्सी छीन जाने के बाद अगला शासक मुझको जेल में डाल दे –
प्रतिशोध की यह राजनीति सदैव से चली आ रही है। समय महाभारत का हो या आधुनिक काल का , बात एक जैसी हैI आपको याद होगा इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी के राज में श्रीमती इंदिरागांधी को जेल में डाल दिया गया था हालांकि जे०पी० ऐसा नहीं चाहते थे लेकिन चरणसिंह और मोरारजी देसाई ने अपना हिसाब चुकता किया।







