आजकल गढ़वाल क्षेत्र की अनेक निचली घाटियों – 800 से 1200 मीटर ऊंचाई पर माळू की लताओं की नयनाभिराम छटा देखी जा सकती है।
माळू की लताएं बहु उपयोगी होती हैं। चारा पत्ती तो है ही, इसकी बेल से मजबूत रस्सियां बनाई जाती रही हैं। इसके अलावा शादी ब्याह आदि के अवसर पर दावत के लिए इसके चौड़े पत्तों से “पत्तल” (थालियां) बनाई जाती हैं, जिनमें गरमा गरम दाल भात का स्वाद बढ़ जाता है।
टिहरी की प्रसिद्ध मिठाई “सिंगोरी’ इसी के पत्ते में लपेटी जाती है। कहीं सफर करते हुए आजकल इस तरह की लताएं दिख जाए, तो तनिक रुक कर निहार सकते हैं। आजकल इन पर फूलों की बहार भी आई हुई है।
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फूलचंद नारी शिल्प मंदिर गर्ल्स इंटर कॉलेज में अत्याधुनिक स्टेम लैब का उद्घाटन, विज्ञान एवं नवाचार को मिलेगा नया आयाम।
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पुस्तक लोकार्पण
"मॉं जिसके गोद में सभ्यताएं पलीं"
लेखक - राम प्रकाश अग्रवाल कण, प्रकाशन - समय साक्ष्य (देहरादून)
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‘जातीय जड़ता जाने का जश्न मनायें’।
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