फिर आ गई, मंगसीर की बग्वाळ (दिवाली) अर्थात रिख बग्वाळ।
By – Mahipal Negi
इस बार 19 – 20 नवम्बर को मनाई जा रही है।
गढ़वाल में वह रिखोला लोदी के नाम से जाना गया। उसका पूरा नाम लोदी सिंह रिखोला नेगी था। गढ़वाल राजा से नेगीचारी मिलने से नेगी हुए। वह गढ़वाल रियासत के बदलपुर के बयेली / बयेला गांव में भौसिंह रिखोला नेगी के घर में जन्मा था। यहीं रिखणीखाल भी है। रिखोला योद्धाओं का रिखणीखाल। उसके पिता भी भड़ (योद्धा) हुए। भड़ थे और जागीरदार भी। माल जवाडी़ के जागीरदार।
गढ़वाल के राजा मान शाह ने 1605-1606 के दौरान भौ सिंह को सिरमौर के राजा को पराजित करने के लिए भेजा। क्योंकि सिरमौर की ओर से गढ़वाल रियासत के सीमा क्षेत्र जौनसार व रवांई की तरफ आक्रमण होते रहते थे।
एक बार तपोवन की जीरा बासमती पर सिरमौर के राजा की नजर लग गई तो युद्ध हो गया। भौ सिंह युद्ध जीत गया। लेकिन लौटते हुए धोखे से सिरमौर के राजा ने उन्हें मरवा दिया। बद्रीनाथ के जिस ध्वज और कैलापीर के नगाड़े को लेकर भौ सिंह लौट रहा था, वह सिरमौर का राजा छीन ले गया। रिखोला लोदी तब 16 साल का था।
भौ सिंह ने पहले ही अपनी पत्नी से वचन ले लिया था की युद्ध में उसके मारे जाने पर भी वह सती नहीं होगी और बालक रिखोला की देखभाल करेगी।
गढ़वाली में एक पंवाड़ा लोकगीत है –
” लाड करी प्यार तू रानी रिखोला माल को
तेरो रिखोला छ रानी अबि सोला साल को ………….”
सिरमौर से रिखोला लोदी के युद्ध की दो प्रमुख गाथाएं हैं, एक राजा मान शाह के शासन काल में शायद सन 1605- 1606 के दौरान, जब वह मात्र 16 साल का था और दूसरा राजा महीपत शाह के शासनकाल में 1624-1625 के दोरान, जब वह सेनापति बन गया था।
कहते हैं कि तब के गढ़वाल रियासत के वजीर शंकर डोभाल ने 16 साल के रिखोला को उलाहना दिया था – “हे रिखोला ! कैलावीर का नगाड़ा और बदरीनाथ का निशाण सिरमौर चला गया, तेरा पिता होता तो जीत कर लाता ……”
पंवाडा़ गीत –
“हे भड़, सिरमौर की गद्दी जीतीक आई
दिल्ली दरवाजो उठैक सिरनगर लाई …….”
पहले युद्ध में रिखोला के साथ भिल्लंग के योद्धा भी (टिहरी जिले की भिल्लंगना घाटी) साथ गए थे जिन्हें भिल्लंग्वाळ कहा गया है। दूसरा युद्ध दापा घाट तिब्बत का युद्ध जीतने के बाद हुआ। इस युद्ध में राजा भी साथ गया था। वे संभवत नेलंग – जादुंग होते हुए दापा गढ़ तक पहुंचे थे। इसी रास्ते दापा के सरदार टकनौर, उत्तरकाशी पर आक्रमण करते रहते थे। युद्ध गढ़वाल ने जीत लिया। भीम सिंह बर्त्वाल और उनके भाई दापा के सरदार नियुक्त हुए।
इसके बाद महीपत शाह ने रिखोला को सिरमौर युद्ध पर भेजा जिसमें शेरगढ़, काणीगढ़, कालसी और बैराटगढ़ से सिरमौर के राजा को खदेड़ दिया। लोक गाथाओं में फिर से यहां भी बद्रीनाथ के ध्वज और कैलापीर के नगाड़े का उल्लेख आता है।
वैराटगढ की राजकुमारी मंगलाज्योति ने घोषणा की थी कि जो सिरमौर को जीतेगा उसी योद्धा से विवाह करेगी। तब रिखोला, मंगलाज्योति को ब्याह कर ले आया।
पंवाड़ा गीत –
“जु भड़ जीतलू बांको सिरमौर
वी भीड़ मेरो डोला ली जालो ….”
वे 6 महीने तक वैराटगढ़ जौनसार में रहे। बाद में उनके दो पुत्र हुए। भानू रिखोला और मोती रिखोला। इनके वंशज अब भी बदलपुर क्षेत्र के कुछ गांवों में रहते हैं।
लोक में यह मान्यता भी है कि सिरमौर या तिब्बत युद्ध जीतने के बाद रिखोला के लौटने पर मंगसीर की दिवाली मनाई गई और उसे रिख बग्वाळ कहा गया। अर्थात रिखोला की बग्वाळ। हालांकि इसका संबंध सिरमौर के युद्ध से अधिक जान पड़ता है। क्योंकि तिब्बत के युद्ध में राजा स्वयं साथ था और वहां बर्त्वाल भाई जैसे योद्धा भी थे। जबकि सिरमौर का युद्ध मुख्य रूप से रिखोला के शौर्य से जुड़ा हुआ है।
और आज भी मंगसीर की बग्वाल जौनसार, रवाईं, उत्तरकाशी और कैलापीर के क्षेत्र – बुढ़केदार में ही सबसे ज्यादा उत्साह से मनाई जाती है। अर्थात जिनका मान सम्मान सिरमौर या दापा युद्ध से सीधा जुड़ा हुआ था। कैलापीर का नगाड़ा आज भी थाती, बूढ़ा केदार में मौजूद है। रिखोला के साथ भिल्लंग के भिल्लंग्वाळों का उल्लेख है जहां कि कैलापीर भी है। कैलापीर रिखोला लोदी का कुल देवता भी लोक गाथाओं में बताया गया है।
रिखोला ने गढ़वाल रियासत की पश्चिम और दक्षिण की सीमाओं का भी निर्धारण भी किया। दिल्ली की मुगल सल्तनत के मल्लों को पराजित कर उसने “दिल्ली दर्जा” प्राप्त किया था। वह कोई भी युद्ध नहीं हारा। अपराजेय रहा।
बाद के वर्षों में रिखोला लोदी भी रियासत के एक अंदरूनी षड्यंत्र का शिकार हुआ और धोखे से मारा गया। इतिहास के संदर्भ लिए रिखोला की कहानी लंबी है। पंवाडा़ शैली में लंबी लोक गाथा भी है। बहुत सी किंवदंतियां भी हैं ……..
मंगसीर की इस बग्वाळ का इतिहास कम-से-कम 400 साल का हो गया है।
फोटो – बूढाकेदार में कैलापीर के निशाण और नगाड़ा।
सौजन्य से – साथी हिम्मत रौतेला।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।







