दियाँई का दीवाली से सम्बंध का कोई पुख्ता सबूत नही है.
Dr. Leela Chauhan

महासू क्षेत्र में मनाई जाने वाली बूढ़ी या पुरानी दियाँई का दीवाली अथवा दीपावली से सम्बंध का कोई पुख्ता सबूत नहीं है फिर भी कुछ लोग अपने इन खूबसूरत त्योहारो को बड़े त्योहारों से जोड़ने की पूरी कोशिश में लगे है ।
हमारे बड़े-बुजुर्गों ने कभी भी इसको दिवाली नही कहा. हमारे पास जो शब्द आया वह दियाँई ही था। इसका संबंध दीवाली से जोड़ने की कोशिश को मुश्किल से 30–40 साल भी नहीं हुए हैं। जब दियाँई की शुरुआत होती है, उस से कुछ दिन पहले सभी लोग जब चिवड़ा बनानी शुरू करते तो सबसे पहले महासू के प्रसाद रूप में उसे अलग रखा जाता है। अब सोचिए अगर यह दिवाली थी तो प्रसाद रूप में राम जी के नाम का प्रसाद बनाते। लेकिन ऐसा तो नहीं होता है।
दियाँई में जो भी गाने गाए जाते है, उनका स्वरूप भी बिल्कुल अलग तथा कुछ हद तक अचंभित करने वाला है। खास बात यह है कि बाक़ी सांस्कृतिक पर्वों की भांति उन गानों में या तो महासू का जिक्र होता है या पांडवों का या फिर अपनी संस्कृति, दिनचर्या, घटना इत्यादि का। पूरी दियाँई मे दीपक/दीया/आतिशबाजी जैसा तो कुछ नही जलाया जाता बल्कि यहाँ मशाल जैसी लकड़ियों (होल्ले) का खेल होता है।
कुछ लोग कहते हैं कि हमको राम के अयोध्या वापस आने की खबर देर से पता चली इसलिए हमारे यहां दीवाली देर से मनाते हैं. यह कथन तो और भी बेतुका लगता है। क्या यह संभव है कि राम के अयोध्या वापस आने की ख़बर पूरे देश में सबको एक ही दिन लगी हो और हमे देर से लगी हो? अगर पूरे देश को एक साथ ही खबर हुई और जौनसार या महासू क्षेत्र के लोगो को नही हुई तो तब तो सूचना प्रसारण का माध्यम कोई आकाशवाणी ही हुई होगी, तो ऐसा क्या हुआ कि सिर्फ हमारे क्षेत्र के लोग ही उस आकाशवाणी को नही समझे, जिसको पूरा देश समझ गया था ? अब मान ही लीजिए कि देर से पता चला, मगर जब चल गया फिर अगले वर्षों से तो साथ मनाया जा सकता था?
कुछ लोग तो यह भी कहते है कि हमारा क्षेत्र कृषि प्रधान था तो, हम लोग खेती बाड़ी में व्यस्त रहते हैं और इस त्यौहार को फसल की देरी से पकने के कारण यह देर से मनाई जाती है। अब जिज्ञासा होती है कि जौनसार बावर क्षेत्र की जलवायु बाकी उत्तराखंड या अन्य पहाड़ी क्षेत्र से भिन्न है क्या? मुझे ये सब बेबुनियाद कहानियां लगती है। सच्चाई यह जरूर हो सकती है कि फसल कटाई के उपरांत पहले से कोई मार्गशीर्ष महीने के अमावस्या पर त्यौहार मनाया जा रहा हो, जिसको हम दियाँई कहते है और अब दीवाली में परिवर्तित हो गयी होगी।
आज ही मैंने दिवाली पर बने वीडियो में बोलते हुए सुना कि जो डिमसा (लकड़ी,घास-फूस का ढेर) बनाया जाता है वह रावण के रूप में जलाया जाता होगा ! हाल में अभी जब महासू क्षेत्र में जागड़ा हुआ तब मैंने कुछ लोगों को बोलते हुए सुना कि जांगड़े का संबंध गणेश चतुर्थी से है क्योंकि यह दोनों पर्व एक ही दिन मनाये जाते है ! जो भी परंपरागत, त्योहार है उसको किसी न किसी बड़े अथवा राष्ट्रीय त्योहार से जोड़ने की दौड़ में कुछ लोग शामिल है ! मगर अपने त्योहारों को किसी अन्य से जोड़ने की बजाय, उनको अपनी पहचान के साथ जोड़ना ज्यादा जरूरी है. हमारी विशिष्ट पहचान, हमारे वजूद और संस्कृति के प्रतिनिधि हैं, हमारे ये विशेष त्योहार.
हर त्योहार का संबंध किसी बड़े त्योहार से इस जोड़ने की होड़ में लीन लोगो, पौष (स्थानीय उच्चारण में पूष) में होने वाला त्योहार मरोज, जिसमे एक दिन में लाखो बकरे कटते है,उसको किस त्यौहार से जोडोगे? और दियाँई के अमावस्या की रात्रि में सामूहिक रूप से गाए जाने वाले गीतों के अश्लील भाव का जोड़ कहां खोजोगे ??
हर त्योहार को बड़े त्योहार से जोड़ने की यह बेतुकी दौड़ एकदिन हमें ही कठघरेघरे में इसलिए खड़ा कर देगी क्योंकि यही चीज़ हमारी अलग संस्कृति, पहचान इत्यादि को कमजोर करेगी. जब हमारे पास दियाईं से जुड़े गीत, कथा से लेकर तमाम अन्य ठोस आधार ही नहीं होंगे तो उस वक्त हमारे अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगेगा ! क्या हम तब किसी बाहरी या किसी अज्ञात पर इसका आरोप मढेंगे जैसा अमूमन होता आया है? एक तरफ़ जब हम भाषा, बोली, सभ्यता, संस्कृति की अलग पहचान बनाकर और बचाकर चलना चाहते हैं तो उसी समय हम उसे अन्य कहानियों, पहचानों से जोड़कर, हम उसका संरक्षण कर रहे हैं या क्षरण कर रहे हैं, इसपर भी ध्यान देना जरूरी है। आप राष्ट्रीय त्योहार मनाइए लेकिन अपनी संस्कृति का विलय मत कीजिए। यदि विलय करना है तो फिर अपनी संस्कृति को महान या अलग मत बताईए। हमें एक पक्ष तो शायद तय करना ही होगा!







